Tulsidas ke Dohe-That Disclosed Truth of Life | तुलसी दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित

0
89
Tulsidas ke dohe hindi arth sahit

Goswami Tulsidas ji ke Famous and Best Dohe Hindi Arth Sahit | गोस्वामी तुलसी दास जी के प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित

गोस्वामी तुलसीदास जी भक्ति आन्दोलन के एक प्रसिद्ध कवि संत थे| तुलसीदास जी का सम्बन्ध वैष्णव सम्प्रदाय के रामानंदी सम्प्रदाय से ताल्लुक रखते थे|

भगवान् राम के परम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी ने कई ग्रंथों की रचना की जिसमें रामचरित मानस और हनुमान चालीस प्रमुख अनुपम कृति हैं|

यदि आप तुलसीदास जी के बारे में और जानना चाहते है तो यह आर्टिकल पढ़ लें|

> तुलसीदास जी का जीवन परिचय और इतिहास

Tulsidas ji ke Dohe Hindi Arth Sahit

तुलसीदास जी ने मानव जीवन को समझाने के लिए कई दोहे लिखे| यह दोहे ज्यादातर अवधि, और ब्रज भाषा में थे

“तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए ।
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए ।

तुलसीदास जी कहते हैं, बिना किसी भय के इस दुनिया मे मजे से जियो, कुछ भी इस दुनिया में भगवान् की इच्छा के बिना नहीं होता है| यदि
कुछ अनिष्ट होगा भी वो तो घटकर ही रहेगा, इसलिए परेशानी छोड़ और इस जीवन का आनंद ले

“जनम मरन सब दुख सुख भोगा।
हानि लाभ प्रिय मिलन वियोगा।

काल करम बस होहिं गोसाईं।
बरबस राति दिवस की नाईं।

तुलसीदास जी कहते हैं, जन्म म्रत्यु, सुख दुःख, लाभ हानि, अपने करीबी लोगों से मिलना बिछड़ना समय और कर्म के आधार पर स्वतः होते रहते हैं, यह मनुष्य के जीवन का हिस्सा है अकारण ही दुखी न हो

“तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर ।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ।

तुलसीदास जी कहते हैं, हमेशा मीठी वाणी का प्रयोग कर, मीठे बोल वशीकरण मन्त्र की तरह कार्य करते हैं और सभी को आपकी तरफ आकर्षित करते हैं, इसलिए कठोर और कडवे वचन छोड़ और अपनी वाणी में मिठास ला|

“सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं।
दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।

धीरज धरहुं विवेक विचारी।
छाड़िअ सोच सकल हितकारी।

तुलसीदास जी कहते हैं अज्ञानी और मुर्ख व्यक्ति सुख में सुखी होते हैं और दुःख में दुखी, लेकिन विवेकी व्यक्ति हमेशा सम रहता है, और
धीरज रखकर शोक का परित्याग कर देता हैं|

“नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु ।
जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास ।

तुलसीदास जी कहते हैं, यह राम का नाम कल्पतरु वृक्ष (हर मनोकामना को पूरी करने वाला) की तरह है, सबका कल्याण करने वाला है| जो इस राम नाम का जप करने से तुलसीदास भी तुलसी की तरह पवन और पवित्र हो गया है|

“काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान ।
तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान ।

तुलसी दास जी कहते हैं जब मनुष्य के मन में काम क्रोध लोभ मोह के ये चार दोष हैं| तब तक पंडित और मुर्ख में कोई अंतर नहीं है, दोनों एक
समान हैं|

“तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग ।
सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग ।

तुलसीदास जी कहते हैं, इस संसार में तरह तरह के लोग हैं, हमें सभी से प्यार और सम्मान से व्यवहार करना चाहिए| जैसे एक नौका एक ही स्वाभाव से सफ़र करके एक किनारे से दुसरे किनारे पहुँच जाती है, ठीक वैसे ही मनुष्य भी इस सौम्य व्यवहार से ही भाव सागर से पार हो जाएगा|

“तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर ।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ।

तुलसीदास जी कहते हैं खूबसूरत मनुष्य और उसके वस्त्रों की देखकर बुद्धिमान व्यक्ति भी धोखा का जाता है, जैसे मोर देखने में बहुत खूबसूरत
लगता है लेकिन उसका भोजन सर्प है|

“तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान ।
भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण ।

तुलसीदास जी कहते हैं, मनुष्य बलवान नहीं है, यह समय उसे बनवान बनाता है, तुलसी उदहारण देते हैं की एक समय था जब अर्जुन ने अपने कौशल से महाभारत का युद्ध जीता था, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब अर्जुन सधारण भीलों से भी हार गया था| और गोपियों की रक्षा भी न कर पाया

“बचन वेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि ।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि ।

तुलसीदास जी कहते हैं, किसी के सुशोभित परिधान और मीठी वाणी से यह निश्चित नहीं होता की वह मनुष्य सज्जन है, जैसे शुपर्णखान, मरीचि और
रावण के परिधान अच्छे थे लेकिन मन गन्दा

“तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक ।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक ।

तुलसीदास जी कहते हैं, आपकी विधा, विनय, साहस, आपकी बुद्धि, आपके भले कर्म, आपकी सत्यनिष्ठा, और आपकी भगवान् के प्रति निष्ठा आपके
यह 7 गुण आपको किसी भी विपदा से बचा लेंगे

“तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोई ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोई ।

तुलसीदास जी कहते हैं, हमेशा दूसरों की निंदा करने वाले लोग मुर्ख हैं, ऐसे लोगों के मुख पर एक दिन ऐसी कालिख पुतेगी, जो मरने तक नहीं
मिटने वाली|

“आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह ।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ।

तुलसीदास जी कहते हैं जिस स्थान और जगह पर आपका सम्मान नहीं है और आपके लिए लोगों की नज़रों में स्नेह नहीं है, ऐसी जगह पर बिलकुल
नहीं जाना चाहिए, चाहे वहां सोना ही क्यों न बरस रहा हो|

“तनु गुण धन धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान ।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहू गत जान ।

तुलसीदास जी कहते हैं ऐसे लोग जिनके पास सुन्दरता, अच्छे गुण, सम्पति, शोहरत और धर्म नहीं है फिर भी इन्हें अहंकार है, ऐसे लोगों का जीवन
कष्टप्रद और दुखदाई ही होता है|

“ग्यान मान जहॅ एकउ नाहीं।
देख ब्रह्म समान सब माॅही।

कहिअ तात सो परम विरागी।
तन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।

तुलसीदास जी कहते हैं जहाँ ज्ञान है, वहां एक भी दोष नहीं हो सकता , वह सभी एक ही व्रह्म को देखता है
उसी को वैरागी कहना चाहिए जो समस्त सिद्धियों और सभी गुणों को तिनका के जैसा त्याग दिया हो|

“दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान ।
तुलसी दया न छांड़िए जब लग घट में प्राण ।

तुलसीदास जी कहते हैं, दया, और करुणा धर्म का मूल है, और घमंड और अहंकार पाप का मूल है| तुलसी कहते हैं मनुष्य को दया और करुणा
का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए|

“सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ।

तुलसीदास जी कहते हैं, एक सच्चा वीर अपनी वीरता हमेशा युद्ध के मैदान में शत्रु के सामने दिखता है लेकिन एक कायर हमेशा सिर्फ बातों में
ही वीरता दिखता है और शत्रु को सामने देखते ही भाग जाता है|

“सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि ।

तुलसीदास जी कहते हैं, जो व्यक्ति अपनी शरण में आये हुए शरणार्थी को पर संदेह करके उसे शरण नहीं देता, ऐसे व्यक्ति से हमेशा दूरी बनाये रखे

“सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ।
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ।

तुलसीदास जी कहते हैं जो व्यक्ति अपने स्वामी और गुरु की नसीहत और हितकारी बातों को ठुकरा देता है, वह ग्लानी से भर जाता है, और उसे
जीवन में नुक्सान भुगतना ही पड़ता है|

“सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ।

तुलसीदास जी कहते हैं, यदि किसी देश का मंत्री, हकीम और गुरु अपने लाभ और भय के कारण ऐसे कार्य करें जिससे देश और देश के लोगों का
अहित हो ऐसा राष्ट्र, देह, और मज़हब का अवश्य ही विनाश हो जाता है

“राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ।

तुलसीदास जी कहते हैं, यदि मनुष्य अपने जीवन में उजाला चाहता है, तो उसे मुखरूपी प्रवेशद्वार की जिह्वारूपी चौखट पर राम नाम की मणि रखनी चाहिए|

“मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ।

तुलसीदास जी कहते हैं, किसी देश का लीडर(नेता), जीव के मुख के समान होना चाहिए| मुख खान पान तो अकेला करता है, लेकिन शारीर के सभी अंगों का लालन पालन और पोषण भी करता है|

“सोचिअ विप्र जो वेद विहीना।
तजि निज धरमु विसय लय लीना।

सोचिअ नृपति जो नीति न जाना।
जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।

तुलसीदास जी कहते हैं, ऐसे ब्राह्मण को दुखी रहना चाहिए, जिसे वेद का ज्ञान नहीं है और हमेशा कर्त्तव्य विहीन होकर विषय विकारों में लिप्त रहता है और उस राजा को भी दुख होना चाहिए, जिसे निति का ज्ञान नहीं है और अपनी प्रजा को प्राणों के समान प्रेम नहीं करता है

“सोचिअ पुनि पति बंचक नारी।
कुटिल कलह प्रिय इच्छाचारी।

सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई।
जो नहि गुर आयसु अनुसरई।

तुलसीदास जी कहते हैं की ऐसी स्त्री को दुःख होना चाहिए जी अपने पति से छलावा करती है, कुटिल और झगलाडू है और मनमानी करने वाली है| और ऐसे ब्रह्चारी को भी दुःख होने चाहिए जो ब्रहचर्य को छोड़कर गुरु के आदेशानुसार नहीं चलता|

“सोचिअ गृही जो मोहवस करइ करम पथ त्याग
सोचिअ जती प्रपंच रत विगत विवेक विराग।

तुलसीदास जी कहते हैं, ऐसे गृहस्थ को भी सोचविचार और दुखी होना चाहिए जिसने मोहवश अपने कर्म को छोड़ दिया है
और ऐसे सन्यासी को भी दुखी होना चाहिए जो सांसारिक जंजाल में फंसकर ज्ञान वैराग्य से विरक्त हो गया है|

आशा करते हैं आपको तुलसीदास जी के दोहे (Tulsidas ji ke dohe) का संकलन पसंद आया होगा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here