Sant Kabir das ke dohe with meaning in Hindi | संत कबीर दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित

0
631
kabir das ke dohe

Sant siromani kabir das ji ke famous best dohe in Hindi with meaning | संत सिरोमणि कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित 

संत कबीर दास के दोहे

1.

पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी न संसै सूल।
कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल ॥

कबीर दास जी कहते हैं धर्म और ज्ञान की किताबें पढ़ पढ़ कर भी मन का भ्रम और संशय नहीं मिट रहा है अर्थार्थ मनुष्य का असली धर्म क्या है अभी तक पता ही नहीं चला| कबीर कहते हैं किससे कहूं यही इस मनुष्य के दुःख का कारण है ऐसी पोथी पन्ने पढने से क्या लाभ|

2.

मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी।
जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति॥

कबीर दास जी कहते हैं मन को मार दिया ममता और आसक्ति भी नहीं रही, मानों यह संसार भी छूट गया, एक जोगी इस संसार में होते हुए भी इस संसार में नहीं है, ऐसा मानों की उसके आसन पर उसकी बिभूति और उसके शरीर की राख राखी हुई है|

कबीर दास जी का तात्पर्य है, यह संसार बस मन और ममता में बसा हुआ है, यदि आपने अपने मन काबू कर लिया तो आप एक ऐसे जोगी के सामान हो इस संसार में होते हुए भी इस संसार में नहीं है|

3.

कबीर सो धन संचिए जो आगे कूं होइ।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ॥

कबीर दास जी का इस दोहे के माध्यम से कहना है को उतना ही धन कमाने में समय कमायें जितना आपको भविष्य में जरुरत है| लोभ मोह के वशीभूत धन के लालच में न पड़ो, कबीर कहते हैं मेने आज तक किसी को भी अपने आखिरी समय में सर पर धन की पोटली बाँध का ले जाते हुए नहीं देखा है|

4.

कबीर यह तनु जात है सकै तो लेहू बहोरि ।
नंगे हाथूं ते गए जिनके लाख करोडि॥

कबीर दास जी कहते हैं, यह शरीर नष्ट होने वाला है, अभी संभल जाओ ज्यादा धन कमाने में अपना समय नष्ट मत करो, कुछ मानवता और परोपकार के कार्य भी करो, जिसके पास लाख करोड़ भी हैं वो भी मरने के बाद नंगे और खाली हाथ ही जाता है|

5.

इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव।
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव॥

कबीर दास जी कहते हैं, इस तन को मैंने दीपक बना लिया है और अपने प्राणों की बत्ती बना कर इसे रक्त के तेल से जला लिया है, हे प्रभु इस तरह आपकी भक्ति में अपने आपको आपको समर्पित कर दिया है, प्रभु आपके दर्शन कब होंगे|

6.

इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह।
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय॥

कबीर दास जी कहते हैं, एक दिन सभी को ये दुनिया, संसार छोड़ के जाना होगा, हे राजाओ छत्रपतियों अहंकार छोडो और अभी से साबधान हो जाओ|

7.

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

कबीर दास जी कहते हैं, जब मैं, मैं के अहम्(अहंकार) में डूबा था तब प्रभु नहीं थे, लेकिन जब ज्ञान का दीपक जला अहंकार मिट गया अब केवल प्रभु हैं में हूँ ही नहीं|

8.

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास।
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास।

कबीर दास जी कहते हैं, यह मानव शारीर अंत समय में लकड़ी की तरह जल जाता है और यह बाल घास की तरह जल जाते हैं, इस तरह मानव की व्यथा को देख कर कबीर का मन उदास हो जाता है|

9.

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

कबीर दास जी कहते हैं, जरुरत से ज्यादा बोलना ठीक नहीं है, और अत्यधिक चुप रहना भी ठीक नहीं है, जैसे ज्यादा बारिश भी हानिकारक है और अधिक धूप भी नुक्सान ही करती है|

10.

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

कबीर दास जी कहते हैं, इस संसार में बुरे लोगों को खोजने के लिए निकला लेकिन कोई भी बुरा व्यक्ति न मिला| लेकिन जब मैंने अपने दिल में झाँककर देखा तो लता मुझसे बुरा इस दुनिया में कोई नहीं|

अर्थार्थ, इस दुनिया में कोई बुरा नहीं है बुरे हमारे अन्दर है हमारा लोगों को देखने का नज़रिया गलत है इसी कारण से लोग हमें गलत नज़र आते हैं|

11.

प्रेम न बाडी उपजे प्रेम न हाट बिकाई ।
राजा परजा जेहि रुचे सीस देहि ले जाई ॥

अर्थ: प्रेम न तो किसी खेत अथवा क्यारी में उगता है और न ही यह किसी बाज़ार में बिकता है, यह तो वो खजाना है जो यदि किसी के मन को भा गया तो भले ही वह व्यक्ति राजा हो या कोई प्रजा, वो अपने प्राणों के मोल पर भी इसे प्राप्त करने के लिए तत्पर रहता है ।

12.

तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत ।
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत ॥

कबीर दास जी कहते हैं ऐसे पेड़ के निचे विश्राम करो जो बारह महीने फल देता हो, जिसकी छायाँ ठंडी हो और जहाँ हर समय पंछी क्रीडा (खेलते) रहते हों|

कबीर दास जी का तात्पर्य है हमेशा सज्जन लोगों की ही संगत करो|

13.

झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह
झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह ॥

कबीर दास जी कहते हैं, झूठे आदमी को दूसरा झूठा आदमी मिलता है तो दूना प्रेम बढ़ता है। पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तभी प्रेम टूट जाता है।

14.

हू तन तो सब बन भया करम भए कुहांडि ।
आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि॥

कबीर दास जी कहते हैं, यह तन बन के सामान है, और हमारे कर्म कुल्हाड़ी के समान, इस कर्म रुपी कुल्हाड़ी से यह बन रुपी तन को हम काट रहे हैं, कबीर दास जी इस भाष्य को बहुत ही सोच समझ कर कर रहे हैं|

कबीर दास जी का यहाँ तात्पर्य है की मनुष्य यदि अच्छे कर्म करेगा तो इस मानव शारीर में किसी प्रकार के रोग नहीं होंगे और यदि बुरे कर्म करोगे तो तरह तरह के रोगों से यह शरीर प्रताड़ित रहेगा|

15.

नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ।
ना हौं देखूं और को न तुझ देखन देऊँ॥

कबीर दास जी कहते हैं जैसे ही में अपने आँखों को खोलू प्रभु आप इनमे प्रवेश कर जाओ आपके प्रवेश करते ही में इन नेनों को बंद कर लूं| बस में आपको देखता रहूँ और आपको भी में किसी और को न देखने दूं|

कबीर दास जी यहाँ अपने प्रभु की तरफ अपनी भक्ति को बता रहे हैं की प्रभु को पाने की इनकी कितनी प्रवाल इच्छा है|

16.

कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव।
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव॥

कबीर दास जी कहते हैं जिसने प्रेम को चखा नहीं और चख कर स्वाद नहीं लिया| वह उस सूने और वीरान घर के समान है जिसमे आप ने प्रवेश तो किया लेकिन कुछ भी पाए बिना बाहर आ गए|

कबीर दास जी का तात्पर्य है की मानव जन्म प्रभु ने आपको इस संसार में प्रेम का प्रचार करने के लिए दिया है|

17.

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी ।
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।।

कबीर दास जी कहते हैं, हे मनुष्य अज्ञान की नींद में कब तक सोया रहेगा, जाग कर प्रभु की भक्ति कर, एक दिन ऐसा आएगा ये तेरा शरीर निर्जीव होकर हमेशा के लिए लम्बे पाँव करके सो जाएगा| समय रहते जाग जा|

18.

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

कबीर दास जी कहते हैं जो उगा है एक दिन निश्चित ही अस्त होगा, जो खिला है वो एक दिन मुरझा जाएगा, जो बनाया गया है वो एक दिन ढह जाएगा, और जो इस संसार में आया है वो एक दिन चला भी जाएगा|

19.

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

कबीर दास जी कहते हैं, निंदा करने वाले को हमेशा अपने आस पास ही रखना चाहिए, क्योंकि निंदक बिना साबुन पानी के आपके स्वाभाव को निर्मल और साफ़ करते रहते हैं|

20.

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

कबीर दास जी कहते हैं, बड़े बड़े ग्रन्थ और किताबों को पढ़ कर कोई पंडित और ज्ञानी न हो सका, लेकिन यदि कोई प्रेम के ढाई अक्षर का मतलब समझ जाए तो वह पंडित बन जाएगा|

कबीर दास जी का यहाँ कहने का मतलब है मानव जन्म प्यार और मोहब्बत करने के लिए मिला है इसे नफरत और लड़ झगड़ कर व्यर्थ न करो|

Sant Kabir das ki sakhiyan with meaning in hindi

21.

कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर ।
जो पर पीर न जानई सो काफिर बेपीर ॥

कबीर दास जी कहते हैं, पीर और साधू वाही है जो दुसरे के दुःख दर्द को समझता है, जो दूसरों की पीड़ा और दर्द को नहीं समझता मेरी नज़र में वाही काफ़िर है|

22.

काची काया मन अथिर थिर थिर काम करंत ।
ज्यूं ज्यूं नर निधड़क फिरै त्यूं त्यूं काल हसन्त ॥

कबीर दास जी कहते हैं यह मानव शरीर एक दिन नष्ट हो जाएगा, यह मन चंचल है लेकिन मनुष्य इस संसार में ऐसे जीता है और कर्म करके साधन इकट्ठे करता है जैसे ये शारीर नष्ट हो नहीं होगा, मनुष्य की इस दशा को देखकर काल भी हंसता है|

23.

करता केरे गुन बहुत औगुन कोई नाहिं।
दिल खोजों आपना, सब औगुन मुझ माहिं ॥

कबीर दास जी कहते हैं उस कर्ता(प्रभु) में कोई भी अवगुण नहीं है, लेकिन जब हम अपने दिल के अन्दर खोजते हैं तो सारे अवगुण अपने ही अन्दर दिखाई देते हैं|

यहाँ कबीर दास जी कहते हैं सभी अवगुण हमारे अन्दर ही हैं, यदि हम अपने अवगुणों को दूर कर दे तो यह संसार भी हमें अच्छा दिखने लगेगा|

24.

तेरा संगी कोई नहीं सब स्वारथ बंधी लोइ ।
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ ॥

कबीर दास जी कहते हैं यह जगत स्वार्थ का है तेरा कोई संगी साथी यहाँ नहीं है, सब एक दुसरे से सिर्फ स्वार्थ से बंधे हुए हैं, लेकिन जब आप इस रहस्य को जान जाते हो, तब ही आपका मन अध्यात्म और प्रभु की तरफ झुकता है|

25.

कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई।
नैनूं रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाई ॥

कबीर दास जी कहते हैं जहाँ सिन्दूर की रखा है वहां काजल नहीं लगाया जा सकता, ऐसे ही जिन नैनों में राम बसे हैं वहां किसी और की मूरत और भाव कहाँ से आएगा|

26.

मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह।
ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह॥

कबीर दास जी कहते हैं, मान, महत्त्व, प्रेम रस, गौरव गुण तथा स्नेह – सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है.

27.

आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत ।
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ।।

कबीर दास जी कहते हैं, हे मानव यह समय बीतता जा रहा है,और यह शरीर कमजोर होता जा रहा है, जब समय सारा निकल  जाएगा फिर प्रभु की भक्ति करके क्या करेगा| जैसे किसान अपने खेत की रखवाली नहीं करता और साड़ी फसल चिड़िया खा जाती है, तो किसान के पास पछताने के अलावा कोई और चारा नहीं होता|

28.

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।

कबीर दास जी कहते हैं, मनुष्य तू जिसे सुख समझता है वो झूठा सुख है, और तू मन ही मन खुश होता है, यह झूठा सुख उसी प्रकार है जैसे यह संसार म्रत्यु के लिए ऐसे भोजन के सामान है जो आधा उसके मुंह में है और आधा उसके गोद में|

29.

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

कबीर दास जी कहते हैं, यह मानव शरीर बार बार नहीं मिलता, यह मानव जन्म दुर्लभ है, इसे व्यर्थ न कर, यह ऐसे ही है जैसे पेड़ से पत्ते झड जाने के बाद उसे आप दुवारा नहीं लगा सकते|

30.

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

कबीर दास ही कहते हैं, इस संसार में ऐसे सज्जनों (साधू) की जरुरत है, जो इस जगत में सार्थक परिवर्तन ला सकें| कबीर कहते हैं साधू का कार्य एक सूप के सामान होना चाहिए जो सही अनाज को तो रख लेता है और थोथे और बेकार अनान को अलग कर देता है|

31.

हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार ।
कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार ॥

कबीर कहते हैं अपने अंत समय पर यह शरीर भी जल जाता है और शरीर को जलाने वाली लकड़ी भी जल जाती है, और शारीर को चिता पर रखने वाला और जलाने वाला भी एक दिन इसी तरह जला दिया जाएगा| जब सभी की एक जैसी नियति है तो मैं किस्से अपनी गुहार लुगाऊ और क्यों व्यर्थ दुखी हूँ|

32.

जल में कुम्भ कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी ।
फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कह्यौ गयानी ॥

कबीर कहते हैं जब नदी से घड़े में पानी भरा जाता है तो घडा जल में होता है, और जल घड़े में होता है, जब घडा फूटता है तो पुनः घड़े में रखा हुआ जल नदी में मिल जाता है,

33.

बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय ।
जो घर देखा आपना मुझसे बुरा णा कोय॥

कबीर दास जी कहते हैं हम दूसरों में हमेशा दोष निकालते हैं लेकिन जब अपने अन्दर झांककर देखते हैं तो हमसे बुरा हमें कोई दिखाई नही देता| कबीर कहते हैं पहले हमें अपने अंदर के दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए|

34.

मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास ।
मेरी पग का पैषणा मेरी गल की पास ॥

कबीर दास जी कहते हैं अहंकार और स्वार्थ में मत फंसो, ये विनाश की जड़ है, यह पैरों की बेडी है और गले की फांसी है|

35.

कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास ।
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस ॥

कबीर दास जी कहते हैं समुद्र की सीपी को एक पानी की बूँद भी नहीं मिल पाती, और वह प्यास प्यास रटती रहती है
उसे तो सिर्फ स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा रहती है, समुद्र का अपार जल सीप के लिए तिनके के समान है| अर्थार्थ जो हमारी आशाएं हैं वाही हमारे जीने के आधार है, सपनों और उद्देश्य के बिना यह जीवन व्यर्थ है|

36.

जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ।
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ॥

कबीर दास जी कहते हैं जो जा रहा है उसे जाने दो लेकिन तुम अपनी दशा और मनोस्थिति को जाने दो, तुम्हे जीवन में अनेक लोग आकर खुद मिलेंगे जैसे खेवटिया की नाव एक ही जगह रहती है लेकिन हजारों नए यात्री उस नाव पर सवार होकर नदी पार करते हैं|

37.

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥

कबीर दास जी कहते हैं मनुष्य रात को सोने में निकल देता है और दिन को खाने में, कबीर कहते हैं यह जीवन हीरे के समान अनमोल है इसे व्यर्थ न जाने दो कुछ सार्थक करो|

38.

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस।
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस।

कबीर दास जी दुखी मन से कहते हैं की संसार के इन प्राणियों को ऐसा कोई न मिला जो इन्हें इस संसार रुपी सागर में डूबने से बचा ले और बाल पकड़कर इन्हें इस संसार रुपी सागर से बचा ले|

39.

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

कबीर दास जी कहते हैं, कबीर इस संसार रुपी बाज़ार में खड़ा है और सबका भला चाहता है मेरा न कोई दोस्त है और न ही मेरा कोई दुश्मन|

40.

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

कबीर दास जी कहते हैं कभी आपके पेरों के निचे आये हुए तिनके की भी निंदा न करो यदि वह तिनका उड़कर आपकी आँखों में आ गिरा तो कितनी पीड़ा होगी|

kabir das dohawali 

42.

तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी ।
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे ॥

कबीर दास जी कहते हैं तुम कागज पे लिखी हुई बात को मानते हो लेकिन में आँखों देखी हुई बात को सच मानता हूँ| कबीर कहते हैं में जितना आसान और सुलझी हुई भाषा में बात करता हूँ आप उतना ही उसे उलझा रहे हो|

43.

कबीर चन्दन के निडै नींव भी चन्दन होइ।
बूडा बंस बड़ाइता यों जिनी बूड़े कोइ ॥

कबीर दास जी कहते हैं, चन्दन के पेड़ के पास नींम का पेड़ भी हो तो वो भी चन्दन के कुछ गुण ग्रहण कर लेता है| लेकिन वहीँ बांस का पेड़ अपनी लम्बाई और बडेपन के कारन झुक कर टूट जाता है| कबीर कहते हैं हमेशा सुसंगति के अच्छे गुण और प्रभाव ग्रहण कर लेने चाहिए|

44.

कबीर नाव जर्जरी कूड़े खेवनहार ।
हलके हलके तिरि गए बूड़े तिनि सर भार॥

कबीर कहते हैं, ये जीवन की नौका टूटी फूटी है जर्जर है लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में कुछ भी करने के लिए तैयार हैं और अपने आपको इन सांसारिक उद्देश्यों से भरी कर लिया है| लेकिन जिनके कोई सांसारिक उद्देश्य नहीं हैं वो हलके हैं वो इन संसार से जल्दी पार हो जाते हैं लेकिन भरे हुए रह जाते हैं|

45.

सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग ।
ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग ॥

कबीर दास जी कहते हैं जिन घरों में कभी सप्त स्वर गूंजते थे, उत्सव मनाये जाते थे| वे घर भी खली पड़े हैं| इस संसार में कभी समय एक जैसा नहीं रहता| जहाँ कल खुशियाँ थी आज वहां गम का माहोल है यह संसार है इसका यही रूप है

46.

मानुष जन्म दुलभ है, देह न बारम्बार।
तरवर थे फल झड़ी पड्या,बहुरि न लागे डारि॥

कबीर दास जी कहते हैं, यह मानव शरीर दुर्लभ है यह देह बार बार नहीं मिलती| जैसे एक बार पेड़ से फल टूटने के बाद कभी दुबारा डाल पर नहीं लगाया जा सकता इसी प्रकार मानव देह बार नहीं मिलती इस अवसर को व्यर्थ न जाने दो कुछ सकरात्मक करो|

47.

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥

कबीर कहते हैं, खजूर के पेड़ की तरह ऊँचा और लम्बा होने का क्या फायदा जो न तो छाया दे पता है न इसके फल आसानी से उपलव्ध हो पाते हैं|

48.

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।

कबीर दास जी कहते हैं, संत और सज्जन को कितने भी दुर्जन लोगों की संगती मिल जाए लेकिन सज्जन कभी अपनी सज्जनता नाची छोड़ता| जैसे चन्दन के पेड़ पर कितने भी सांप लिपट जाएँ और जहर छोड़ दे लेकिन कभी भी अपनी सीतलता नहीं छोड़ता|

49.

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

कबीर कहते हैं हिन्दू कहते हैं हमें राम प्यारे हैं और मुस्लिम को रहमान| इन्ही बातों पर दोनों लड़ रहे हैं लेकिन किसी ने एक दुसरे की न तो पीड़ा जानी और न ही सत्य तक पहुँच पाए|

50.

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

कबीर कहते हैं इस संसार में सभी घटनाओं का समय निर्धारित है, सभी कार्य अपने सही समय पर ही होंगे| माली पोधे को चाहे 100 घड़ों से पोधे को सींचे लेकिन फल और फूल जब ऋतू आएगी तब ही लगेंगे|

51.

मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग ।
तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग ॥

कबीर कहते हैं बगुला का ताल गोरा है लेकिन मन काला, इससे अच्छा तो कौआ जो तन से भी और मन से दोनों से काला है| कम से कम यह अपने चरित्र को छुपाता तो नहीं है|

52.

मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत ॥

कबीर कहते हैं, व्यक्ति तब तक नहीं हारता जब तक मन से नहीं हारता| जीत और हार मन की है| यदि आपने मन से हार मान ली तो आप हार गए| इसी प्रकार भगवान् को पाना एक मन का संकल्प है यदि आप मन से द्रण संकल्पित हैं तो आप जरूर इश्वर को पा लेंगे|

53.

काजल केरी कोठारी, मसि के कर्म कपाट।
पांहनि बोई पृथमीं,पंडित पाड़ी बात॥

 

54.

मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै ।
काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े ॥

कबीर दास जी कहते हैं, मन सब बातें जानता है और जानते हुए भी अवगुण को ग्रहण करता है और गलत कार्य करता है | ऐसे मनुष्य का भला असंभव है|

55.

कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास ।
काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास॥

कबीर कहते हैं ऊँचे भवनों को बना कर क्यों गर्व करते हो एक दिन ये गिर कर मिटटी में मिल जायेंगे और इन पर घास उग आएगी| आज सब कुछ अच्छा है तो इस पर अभिमान न कर समय बदलने में समय नहीं लगता यह संसार परिवर्तन शील है|

56.

यह तन काचा कुम्भ है,लिया फिरे था साथ।
ढबका लागा फूटिगा, कछू न आया हाथ॥

कबीर कहते हैं यह शरीर कच्चे घड़े की तरह है, जरा सी चोट लगते ही फूट जाएगा, और कुछ हाथ नहीं आएगा|

57.

हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह।
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह॥

कबीर दास जी कहते हैं हरा वृक्ष ही पानी के महत्व और स्नेह को जानता है सुखा पेड़ क्या जाने, उसे क्या पता कब पानी बरसा और कब नहीं| इसी प्रकार सज्जन व्यक्ति ही परोपकार और मदद का महत्व समझता है दुष्ट क्या जाने इसका मोल

58.

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

कबीर दास जी कहते हैं मनुष्य का तन पंछी की भांति हो गया है जहाँ इसका मन जाता है इसका तन वहीँ चला जाता है| इसी प्रकार कबीर कहते हैं जैसी संगती होती है वैसा ही कर्म होता है और इसके अनुसार ही फल प्राप्त होता है

59.

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।

कबीर कहते हैं कितना इस मन को समझाया कितना इसको कहा लेकिन तब भी यह मन उलझा ही हुआ है| यह मन कभी चेतता ही नहीं है, आज भी इस मन की वही दशा है|

60.

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

कबीर दास जी कहते हैं, माला फेरते फेरते युग बीत गया लेकिन मन की दशा में कोई परिवर्तन नहीं आया| कबीर कहते हैं ये मोतियों की माला छोड़ और अपने मन की माला फेर|

Sant kabir das couplets with hindi Meaning

61.

कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं ।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं ॥

कबीर दास जी कहते हैं इस जगत में न मेरा कोई है और न ही में किसी का हूँ| जैसे नदी पार करने के बाद नाव में बेठे हुए सभी लोग बिछुड़ जाते हैं, वैसे ही इस संसार में भी सभी बिछुड़ने वाले हैं, सार रिश्ते नाते यहीं रह जाएंगे|

62.

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं ।
प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं ॥

कबीर दास जी कहते हैं, जब मन में अहंकार था तो प्रभु के दर्शन नहीं हुए| जब अहंकार मिटा तो केवल प्रभु हैं में कहीं पर नहीं हूँ, यह प्रेम की गली बहुत संकरी है, जहाँ सिर्फ केवल एक ही जा सकता है, आप दो बनके इस गली में जा ही नहीं सकते| अर्थार्थ जब, प्रभु के दर्शन हो जाते हैं, तो में और तुम में कोई अंतर नहीं है, सब एक है, पूरा संसार एक परिवार की तरह लगने लगता है|

63.

मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई।
कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई ॥

कबीर दास जी कहते हैं, की मूर्ख का संग कभी मत करो, मूर्ख लोहे के समान है, वह पानी में तैरता नहीं है डूब जाता है, संगती का प्रभाव कुछ ऐसा है, की आकाश से एक बूँद केले के पत्ते पर गिर कर कपूर, सीप के अन्दर गिर कर मोती और सांप के मुख में पड़कर विष बन जाती है|

64.

हिरदा भीतर आरसी मुख देखा नहीं जाई ।
मुख तो तौ परि देखिए जे मन की दुविधा जाई ॥

कबीर दास जी कहते हैं, की यह ह्रदय ही दर्पण है, लेकिन वासनाओं के परदे की वजह से हमें अपने मुख का वास्तविक स्वरुप दिखाई ही नहीं देता, जब मन का संशय और मिटेगा तब ही हम अपने वास्तविक स्वरुप को प्राप्त कर सकते हैं

65.
जांमण मरण बिचारि करि कूड़े काम निबारि ।
जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि ॥

कबीर दास जी कहते हैं जन्म और मरण के विचार अपने अन्दर से त्याग कर बुरे कर्मों को छोड़, और जो मानव धर्म है उससे जुड़ उसे ही याद रख उसे ही संवार सुन्दर बना|

66.

मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि।
कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि॥

कबीर दास जी कहते हैं अहंकार रुई में लिपटी हुई आग की तरह है, हो सके तो इससे निकल कर भाग जा कब तक इसे अपने पास रखेगा|

67.

झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह।
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥

कबीर दास जी कहते हैं अहंकार छोड़, अहंकार व्यक्ति में कभी बदलाव नहीं आते जैसे बारिश के पड़ने से मिटटी गीली और नरम हो जाती है लेकिन पत्थर पर कोई फर्क नहीं पड़ता|

68.

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।

कबीर दास जी कहते हैं, शरीर पर भगवा वस्त्र पहनना तो आसान है, लेकिन मन को विरला और साफ़ करना बहुत ही मुश्किल, यदि मन योगी हो जाए तो साड़ी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती है|

69.

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।

कबीर दास जी कहते हैं, जब समुद्र की लहरों में आकर मोती दूसरी और चीजों के साथ किनारे पर बिखर जाते हैं,
लेकिन बगुला मोती और अन्य चीजों में भेद नहीं कर पाता, लेकिन हंस इन्हें चुन चुन कर खा जाता है, अर्थार्थ किसी भी वस्तु की कीमत सिर्फ जानकार ही समझ पाता है|

70.

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

कबीर दास जी कहते हैं, सज्जन और ज्ञानी की जाती न पूछ जैसे तलवार की कीमत होती है उसकी म्यान की नहीं

71.

देह धरे का दंड है सब काहू को होय ।
ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय॥

 

72.

पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया लिख लिख भया जू ईंट ।
कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट॥

73.

ऊंचे कुल क्या जनमिया जे करनी ऊंच न होय।
सुबरन कलस सुरा भरा साधू निन्दै सोय ॥

74.

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय ।
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय ॥

75.

बिन रखवाले बाहिरा चिड़िये खाया खेत ।
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत ॥

76.

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई ।
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥

77.

कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन।
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन॥

78.

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।

79.

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।

कबीर दास जी कहते हैं, जब गुण को परखने वाला ग्राहक मिल जाता है, तो गुण की कीमत लगती है, पर जब ऐसा ग्राहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव ही बिकता है|

80.

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

कबीर दास जी कहते हैं मनुष्य दूसरों के दोषों को देखकर हँसता है उस समय उसे अपने दोष दिखाई नहीं देते है जिनका न आदि है और न अंत

81.

हीरा परखै जौहरी शब्दहि परखै साध ।
कबीर परखै साध को ताका मता अगाध ॥

यहाँ कबीर दास जी कहते हैं हीरे असली है या नकली यह तो जोहरी ही बता सकता है, इसी प्रकार शब्द के सार और असार को केवल विवेकी साधू ही समझ सकता है, कबीर आगे कहते हैं जो साधू, असाधु को जान लेता है उसका मत अधिक गहन और गंभीर है|

82.

जाति न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तरवार को पडा रहन दो म्यान ॥

कबीर दास जी कहते हैं साधू से उसकी जाती न पूछ, साधू का ज्ञान ही उसकी जाती है, साधू की पहचान उसके ज्ञान से होती है, कबीर कहते हैं,  साधू की जाती तलवार की म्यान के सामान है, और ज्ञान तलवार की धार के सामान, तलवार की धार का मूल्य होता है, उसकी म्यान तलवार की कीमत को नहीं बढाती|

83.

कबीर संगति साध की , कड़े न निर्फल होई ।
चन्दन होसी बावना , नीब न कहसी कोई ॥

कबीर दास जी कहते हैं, हमेशा संत संगती ही करो, साधुओं की संगत कभी निष्फल नहीं जाती, कबीर कहते हैं, जैसे चन्दन का वृक्ष यदि छोटा भी हो, तो भी उसे नीम का वृक्ष नहीं कहता| वह हमेशा खुशबू हो देता है|

84.

मनहिं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होइ ।
पाणी मैं घीव नीकसै, तो रूखा खाई न कोइ ॥

कबीर कहते हैं मन की बातों में न पड़, मन की इच्छाओं को अपने बल पर भी कभी पूरा नहीं किया जा सकता है, यदि जल में से घी निकल आता तो रुखी रोटी कोन खाता|

85.

कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार ।
करी चिजारा सौं प्रीतड़ी ज्यूं ढहे न दूजी बार॥

कबीर दास जी कहते हैं यह मानव मिटटी का शरीर नष्ट हो गया है, इसकी एक एक ईंट (शरीर के अंग) काई में बदल गए हैं, तू इस शारीर रूपी देवालय बनाने वाले प्रभु का भजन कर जिससे यह शरीर मंदिर दुवारा नष्ट न हो|

86.

जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम।
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम ॥

कबीर दास जी कहते हैं जिनके जीवन में प्रेम और प्रीटी का स्वाद नहीं है और न ही जिव्हा पर राम का नाम है| ऐसे लोग इस संसार में उत्पन्न होकर भी व्यर्थ हैं| कबीर कहते हैं प्रेम ही जीवन का आधार है|

87.

कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण।
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण॥

कबीर कहते हैं अपने जीवन से कठोरता को हटा दो तब ही अपने जीवन को बदल पाओगे| जैसे वरिश के पड़ने पर मिटटी नरम हो जाती है लेकिन पत्थर वैसे का वैसे ही बना रहता है|

88.

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर ।

कबीर दास जी कहते हैं, इस संसार में रहते हुए न मन मरता है और न ही माया, शरीर न जाने कितनी बार मर चूका है पर इंसान की आशा, तृष्णा कभी नहीं मरती|

89.
कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस।
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस।

कबीर दास जी कहते हैं, की हे मानुष तेरे बाल काल ने पकड़ रखे हैं, पता नहीं घर या बाहर कहाँ वह तुझे मार डाले|

90.

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

कबीर दास जी कहते हैं, जो कोशिश करता है, वो जीवन में कुछ न कुछ पा ही लेता है, जैसे गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ न कुछ लेके ही आता है, लेकिन कुछ लोग डूबने के दर से किनारे पर ही बैठे रहते हैं और कुछ नहीं कर पाते|

91.

एक ही बार परखिये ना वा बारम्बार ।
बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार॥

कबीर दास जी कहते हैं किसी को एक बार ही परख लो बार परखने की जरुरत नहीं जिसका जैसा स्वाभाव और भाव है बदलता नहीं, जैसे रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर न होगी,

92.

साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं ।
धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहीं ॥

कबीर दास जी कहते हैं साधू केवल भाव को जानता है यदि आप उनका आदर करोगे उतने से हो वो गदगद हो जाएंगे| धन दिखा कर साधू का मन नहीं जीता जा सकता है, और जो धन का लोभी है वह साधू नहीं हो सकता है|

93.

जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह ।
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ॥

कबीर दास जी कहते हैं जो जान बूझकर असत्य का साथ देते हैं ऐसे लोगों की संगती कभी स्वप्न में भी न दे

94.

माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर ।
आसा त्रिष्णा णा मुई यों कहि गया कबीर ॥

 

95.

कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि ।
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि ॥

कबीर दास जी कहते हैं यह शरीर लाख का बना हुआ है जिसमें हीरे जवाहरात जेड हुए हैं, यह चार दिन का खिलौना है कल कभी न कभी नष्ट होगा ही, शरीर नश्वर है|

96.

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार।
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार॥

कबीर दास जी कहते हैं, घर दूर है मार्ग लम्बा है रास्ता भयंकर है, और रास्ते में अनेक ठग हैं, भगवान् का दर्शन दुर्लभ है, अनेक बाधाएं और  विपत्ति है|

97.

झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह।
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥

कबीर दास जी कहते हैं, जीवन की अवधि बहुत कम है, इसके लिए भी मनुष्य ना ना प्रकार के प्रवंध करता है, चाहे वो राजा और या निर्धन, लेकिन सब खड़े खड़े ही नष्ट हो जाते हैं|

98.

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।

 

99.

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।
एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।

कबीर दास जी कहते हैं जैसे पानी का बुलबुला अपने आप ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार यह शरीर भी भी एक दिन नष्ट होना ही है, जैसे सुबह होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी|

100.

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

कबीर दास जी कहते हैं जिसे वाणी का मूल्य पता है वह नाप तौल कर ही बोलता है, वाणी एक अमूल्य रत्न है|

101

पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत ।
सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत ॥

कबीर दास जी कहते हैं पतिव्रता पत्नी तन से मेली भी हो तब भी शुद्ध है, चाहे उसके गले में कांच की माला ही क्यों न हो, फिर भी वह अपनी सखियों के बीच सूर्य के समान चमकती है|

यह भी पढ़ें

दोस्तो संत कबीर दास जी के दोहे (kabir das ke dohe) पढ़कर आपके जीवन में जरूर बदलाव आएगा और एक सकारात्मक उर्जा का आपके जीवन में प्रवेश होगा ऐसी हमारी मंगल कामना है|

संत कबीर दास का जीवन परिचय

 

 

Loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here