Meera Bai in Hindi | मीरा बाई का जीवन परिचय

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Meera Bai in Hindi
Meera Bai in Hindi

Meera Bai in Hindi :- दोस्तो, आज इस आर्टिकल में हम संत मीरा बाई के बारे में विस्तृत हिंदी में चर्चा करेंगे| संत मीरा बाई, 16वी शताव्दी, की एक महान अध्यात्मिक कवि संत थीं|

मध्यकालीन युग में, संत मीरा बाई (Mira Bai) ने भक्ति आन्दोलन में अहम भूमिका निभाई| मीरा बाई के समकालीन संतों में संत रविदास, संत कवीर दास, संत सूरदास प्रमुख हैं| मीरा बाई भगवान् के कृष्ण स्वरुप की भक्त थी| मीरा बाई, भगवान् श्री कृष्ण को पति के रूप मे मानकर उनकी भक्ति में लीन रहती थी|

मीरा बाई ने भगवान् श्री कृष्ण के स्वरुप का वर्णन करते हुए, कई सुन्दर कविताओं की रचना की|

ये कविताए उत्तर भारत में भजनों के रूप में काफी प्रचलित हैं|

संत मीरा बाई की श्री कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति, उनके द्वारा रचित कविताओं के पदों और छंदों मे साफ़ देखने को मिलती है|

मीरा बाई की श्री कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति और प्रेम, उनके द्वारा रचित इस भजन में स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है| मीरा बाई लिखती हैं|

“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई
जाके सर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई”

संत मीरा बाई कहती हैं, मेरे तो बस ये श्री कृष्ण हैं|

जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठाकर गिरधर नाम पाया है|

जिसके सर पे ये मोर के पंख का मुकुट है, मेरा तो पति सिर्फ यही है|

Biography of Meera Bai in Hindi – मीरा बाई का जीवन परिचय :-

आइये जानते है, महान संत मीरा बाई  का संपूर्ण जीवन परिचय विस्तार से हिंदी में ( History of Meera Bai in Hindi )

क्रमांकबिंदुमीरा बाई जीवन परिचय
1नाममीरा बाई
2अन्य नामMeera Bai, Mira Bai
3जन्म तिथि1498 CE
4जन्म स्थानगाँव कुडकी, जिला पाली, जोधपुर, राजस्थान
5पिता का नामरतन सिंह
6माता का नामवीर कुमारी
7पति का नाममहाराणा कुमार भोजराज
8ससुरालमेवाड़, चित्तोड़
9ससुर का नामराणा सांगा
10म्रत्यु1546 CE द्वारका, 47-48 उम्र

Meera Bai in Hindi
Meera Bai

संत मीरा बाई ( Meera Bai ) के बारे में किसी भी साहित्य में कोई सटीक जानकारी नहीं है| कई साहित्यकारों ने मीरा बाई के बारे में लिखा है| लेकिन भक्तमाल में कुछ प्रमाणिक जानकारी मिलती हैं|

भक्तमाल ब्रज भाषा मे एक कविता है. जिसमे 200 कवि संतों का संछिप्त (short) विवरण दिया गया है. गुरु नभा दास जी ( Guru Nabha Daas Ji ) ने इस कविता का संकलन किया है.

साहित्यकारों के अनुसार संत मीरा बाई का जन्म 1498 CE में राजस्थान के पाली जिला के एक गाँव कुडकी में हुआ था. इनके पिता का नाम राणा रतन सिंह और माता का नाम वीर कुमारी था.

राणा रतन सिंह, राव डूडा सिंह के छोटे पुत्र थे. राव डूडा सिंह जी राव जोधाजी राठोर के वंशज थे, जिन्होंने जोधपुर की स्थापना की थी.

Meera Bai Early Life ( मीरा बाई का प्रारंभिक जीवन ) :- 

Meera Bai in Hindi
Early life of Meera Bai

मीरा बाई (Mira Bai) जब तीन साल की थी| एक साधू घूमते हुए उनके घर आये और एक श्री कृष्ण की मूर्ति मीरा के पिता को भेंट की| राणा रतन सिंह ने कृष्ण भगवान् की मूर्ति भेंट स्वरुप स्वीकार कर ली|

राणा, कृष्णा की मूर्ति मीरा को देने में संकोच कर रहे थे| उन्हें लगा की मीरा को शायद ये भेंट पसंद न आये| लेकिन कृष्ण जी की मूर्ति मीरा के दिल में बस गई थी और जब तक मूर्ति उन्हें मिल नहीं गई मीरा ने खाना तक नहीं खाया|

समय बीतने के साथ, मीरा को श्री कृष्ण जी की मूर्ति से इतना लगाव हो गया की उठते बेठते सोते खाते हमेशा श्री कृष्णा की मूर्ति को प्राणों की तरह सदा अपने साथ रखने लगी| मीरा के लिए अब कृष्णा ही उनकी आत्मा थी|

एक बार महल के पास से एक बारात गुजर रही थी| मीरा ने उत्सुकता बस अपनी माँ से पूछा, माँ मेरे पति कोन हैं| माँ ने मजाकिया लहजे में मीरा से बोल दिया|

अरे तेरे पति तो खुद श्री कृष्णा हैं जिनके साथ आप हमेशा रहती हो| इस बात का मीरा के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और मन ही मन कृष्ण भगवान को अपना पति मान लिया|

मीरा के लिए अब कृष्ण ही मित्र, पति और प्रेम थे| मीरा की माँ उनकी कृष्ण भक्ति का समर्थन करती थी| लेकिन मीरा के भाग्य में अपनी माँ का साथ ज्यादा समय के लिए नहीं था| जब मीरा छोटी थी, इनकी माँ का देहांत हो गया|

मीरा बाई का वैवाहिक जीवन ( Married life of Meera Bai )

Mira Bai in Hindi

मीरा के पिता ने कम उम्र में ही इनका विवाह राणा भोज राज (जो की राणा कुम्भा के नाम से भी जाने जाते थे) से तय कर दिया| राणा भोज राज, मेवाड़ चित्तोड़ के महाराजा राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र थे| अब मीरा एक शक्तिशाली राज्य की रानी थी|

लेकिन इनको राजसी ठाठ बाठ में कोई ख़ास रूचि नहीं थी| हालांकि मीरा एक आज्ञाकारी पत्नी थी और अपने पति की हर आज्ञा का पालन करती थी| लेकिन शाम होते ही श्री कृष्ण की भक्ति में लग जाती थी|

ससुराल वालों का विरोध :- 

मीरा बाई (Meera Bai) की अध्यात्मिक दिनचर्या और हमेशा भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति अब मीरा के ससुराल  को अखरने लगी| ससुराल वालों का तर्क था|

रानी मीरा, मेवाड़ की महारानी है, उसे राजसी ठाठ वाठ के साथ संज संवर कर रहना चाहिए और राजवंश कुल की मर्यादा का ध्यान रखना चाचिए|

ससुराल वालों से रिश्ते और खराब हो गए जब मीरा ने कुल देवी दुर्गा की पूजा करने से मन कर दिया| मीरा कहती थी, मेरे तो सिर्फ गिरघर गोपाल हैं, किसी और भगवान् की पूजा में मेरा मन नहीं लगता|

जल्द ही, मीरा की श्री कृष्ण के प्रति भक्ति की चर्चा आस पास के क्षेत्र में होने लगी| अक्सर मीरा साधू संतों के साथ अध्यात्मिक विचार विमर्श किया करती थी| और घंटों कृष्णा के भजन सत्संग में व्यस्त रहती थी|

एक बार उनकी ननद उदा बाई ( uda Bai ) ने अफवाह उड़ा दी, की मीरा के गेर मर्दों के साथ नाजायज़ संबंध है|

कई बार उन्होंने दुसरे मर्दों को उनके कमरे में जाते देखा है| जब राणा कुम्भा ( राजा भोज ) को ये बात पता लगी और मीरा बाई को रंगे हाथों पकड़ने के लिए जब मीरा के कमरे में प्रवेश किया |

तो मीरा को हमेशा कृष्णा की मूर्ति से बाते करते और उनके साथ खेलते हुए पाया, कोई मर्द वहां नहीं था| लेकिन मीरा बाई कभी भी आलोचनाओं और प्रसंशा से विचलित नहीं हुईं|

मीरा बाई के पति का देहांत   :-

राणा कुम्भा ( राणा भोज ) का मुगलों से लड़ाई में देहांत हो गया| अब राणा सांगा मीरा बाई से छुटकारा पाना चाहते थे|

मीरा बाई को अपने पति के साथ सती होने के लिए बोला गया| हम आपको बता दें पुराने समय में ये एक कुप्रथा थी, जिसमे पति के मरने के बाद पत्नी को भी उसकी जलती हुई चिता में बिठा कर जान देनी होती थी|

लेकिन मीरा बाई ने सती होने से मना कर दिया| मीरा का तर्क था, उनके पति तो श्री कृष्णा हैं, और श्री कृष्णा हमेशा उनके साथ रहते हैं|

मीरा बाई और जहर का प्याला एक घटना :-

Meera Bai in Hindi
Meera Bai with Poison Cup

कुछ समय बाद उनके ससुर राणा सांगा का भी मुगलों के साथ एक युद्ध में देहांत हो गया| राणा विक्रमादित्य को चित्तोड़ गढ़ का महाराणा बनाया गया| राणा विक्रम ने मीरा बाई को मारने के कई असफल प्रयास किये|

एक बार जहर का प्याला मीरा बाई को मारने के लिए भेजा गया| मीरा ने अपने भगवान् श्री कृष्णा को जहर के प्याले का प्रसाद भोग लगाया और भगवान् का प्रसाद स्वरुप ग्रहण कर लिया| लेकिन वो जहर का प्याला अमृत में बदल गया|

कुछ किवदंतियों के अनुसार, एक फूलों की टोकरी में सांप रख कर मीरा के पास भेजा गया| लेकिन जैसे ही मीरा ने फूलों की टोकरी खोली, सांप फूलों की माला में रूपांतरित हो गया|

ऐसी ही एक और कथा के अनुसार, राणा विक्रम ने काँटों की सेज ( बिस्तर ) मीरा को भेजी| लेकीन काटों का बिस्तर भी फूलों के बिस्तर में बदल गया|

लोगों का मानना है, भगवान् श्री कृष्णा स्वयं उनकी रक्षा करते थे| मीरा बाई को कई बार भगवान् ने स्वयं प्रकट हो कर दर्शन दिए|

मीरा बाई और तुलसीदास :-

Mira Bai in Hindi
Mira Bai or Tulsi Das

मीरा बाईजी ने, ससुराल वालों द्वारा दी जाने वाली प्रताड़ना से परेशान हो कर तुलसीदास जी को एक पत्र लिखा| तुलसीदासजी मुझे अपने सगे संबंधियों द्वारा परेशान किया जा रहा है| लेकिन में श्री कृष्ण की भक्ति को नहीं छोड सकती|

कृष्ण मेरे रोम रोम और आत्मा में समाये हुए है| नंदलाल को छोड़ना मेरे लिए जेसे अपना शरीर त्यागने के सामान है| आप मुझे कुछ सलाह दें, में क्या करूं में असमंजस में हूँ|

तुलसी दासजी ने जवाब दिया, उन लोगों को छोड दो जो आपको नहीं समझ सकते और जो राम और श्याम को नहीं पूजते| चाहे वो आपके कितने भी करीवी रिश्तेदार ही क्यों न हों|

उदहारण के तोर पर तुसिदास जी ने कहा| प्रहलाद ने अपने पिता को छोड़ा, विभीषण ने अपने भाई को छोड़ा, बाली ने अपने गुरु को छोड़ा, गोपियों ने अपने पति को छोड़ा, इश्वर और भक्त का रिश्ता ही एक ऐसा रिश्ता है जो अजर अमर है| और बाकि सारे सांसारिक रिश्ते नाते मिथ्या (झूठ) हैं|

History of Meera Bai in Hindi ( मीरा बाई और गुरु रविदासजी ) :-

Mira Bai in HIndi
Mira Bai or Ravidasji

मीरा बाई और गुरु रविदास जी की मुलाक़ात हुई या नहीं, इसके बारे में कोई ठोस प्रमाण नहीं है| लेकिन इतिहासकार मानते हैं, की संत रैदासजी मीरा बाई के अध्यात्मिक गुरु थे|

अक्सर मीरा बाई अपने गुरु रविदासजी से मिलने बनारस आया करती थी| ऐसा कहा जाता है की मीरा अपने दादा के साथ संत रैदास जी से मिली| गुरूजी के साथ मीरा कई बार सत्संग में शामिल हुई|

मीरा बाई और अकबर :-

मीरा बाई को उनकी कृष्ण भक्ति के लिए दूर दूर तक जाना जाने लगा| उत्तर भारत में मीरा के पद कविताए भजनों के रूप में गाये जाने लगे|

संत मीरा बाई की अध्यात्मिक रूचि और उनका कृष्ण के प्रति प्रेम और मीरा के साथ हुई चमत्कारी घटनाओ की कहानिया अकबर के कानों तक भी पहुंची| अकबर की भी मीरा से मिलने की इच्छा हुई| क्योंकि वह भी दुसरे धर्मों को जानने और समझने में रूचि रखता था|

लेकिन मीरा से मिलने में एक अड़चन थी| मीरा के परिवार और अकबर में राजनेतिक दुश्मनी थी| और अकबर का मीरा बाई से मिलना एक और युद्ध का कारण बन सकता था|

इसलिए अकबर एक भिखारी का रूप बनाकर मीरा से मिलने गए| कहानियों में ऐसा कहा जाता है की तानसेन भी अकबर के साथ भेष बदलकर गए थे| लेकिन इतिहासकार कहते हैं, की मीरा की म्रत्यु के कई साल के बाद तानसेन अकबर के दरबार में आये थे|

अकबर ने भिखारी के भेष में, मीरा से मुलाकात की| अकबर मीरा के भक्ति और उनके मंत्र मुग्ध कृष्ण भजनों से इतने प्रभावित हुए, जाते समय मीरा बाई के चरणों में एक वेशकीमती हीरे का हार भेट किया|

मीरा बाई और भगवान् कृष्ण का आदेश :-

Mira Bai in Hindi
Mira Bai or Krishna

समय बीतने के साथ मेवाड़ में यह खबर आग की तरह फेल गई की अकबर ने मीरा से मुलाकात की है| क्रोधित होकर राणा कुम्भा ने मीरा बाई को आदेश दिया , पत्र मिलते ही किसी नदी में कूद कर अपने प्राण त्याग दो| अपने पति की आज्ञा का पालन करते हुए मीरा ने नदी की और प्रस्थान किया|

तभी भगवान् श्री कृष्णा साक्षात् प्रकट हुए, और मीरा बाई को आदेश दिया, की मेवाड़ को छोड वृन्दावन को प्रस्थान करो| वृन्दावन मेरी तपो भूमि है, वहां आप शांति पूर्वक भगवान् का अनुसरण कर सकेंगी|

ऐसा कहानियों में लिखा गया है, उसके बाद मीरा ने मेवाड़ को छोड बृज वृन्दावन की और प्रस्थान किया| और अपने जीवन का एक बड़ा समय वृन्दावन में बिताया

मीरा बाई और वृन्दावन :-

Mira Bai in Hindi
Mira Bai Mandir in Vrindavan

मीरा ने भगवान् कृष्ण के आदेश पर वृन्दावन को नंगे पैर ही प्रस्थान किया| रास्ते भर बच्चों, बड़ों, और संतों ने मीरा का आदर सत्कार के साथ स्वागत किया और अपनी सेवा दी| वृन्दावन पहुँच कर मीरा ने अपने गुरु संत रविदास जी से मुलाकात की| मीरा ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा वृन्दावन में गोविंदा मंदिर में बिताया|

कुछ समय के बाद, राणा कुम्भा को अपनी गलती का एहसास हुआ| राणा वृन्दावन पहुचे और मीरा को वापस चित्तोड़ आने के लिए आग्रह किया| लेकिन मीरा बाई ने कहा उन्हें किसी भी तरह के राज पाठ में कोई रूचि नहीं है| उन्होंने अब नंदलाल कृष्ण को अपने दिल और आत्मा में बसा लिया है|

अब कृष्ण ही उनके सब कुछ हैं| राणा कुम्भा भी मीरा बाई की कृष्ण के प्रति परम और निस्वार्थ भक्ति देख कर भाव भिवोर हो उठे| मीरा को उन्होंने वादा किया, की वो उनके सत्संग और भजन कीर्तन में कोई व्यवधान नहीं डालेंगे और दोनों घुटनों पर बेठ कर वापस आने की प्रार्थना करने लगे| इस बार मीरा उन्हें मना न कर सकी और राणा भोज ( राणा कुम्भा) के साथ मेवाड़ चित्तोढ़ वापस आ गई|

लेकिन राणा भोज की म्रत्यु के बाद परिस्थितिया बदल गई और उन्हें ससुराल में प्रताड़ित किया जाने लगा|

Meera Bai or Jeeva gosain ( goswami ) – मीरा बाई और जीवा गोसाईं(गोस्वामी) एक कथा :-

जीवा गोसाईं वृन्दावन में वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख थे| मीरा बाई एक बार जीवा गोसाईं के दर्शन करना चाहती थी| लेकिन गोसाईं जी ने ये कह कर मना कर दिया की वो किसी स्त्री की परछाई भी अपने ऊपर नहीं पड़ने देते|

मीरा कहती हैं, मुझे तो आज ही पता चला है की इस पूरे वृन्दावन में श्री कृष्ण के अलावा कोई और भी पुरुष है| मेरे लिए तो हर कोई इस वृन्दावन में स्त्री स्वरुप है|

मुझे तो नंदलाल के अलावा कोई और पुरुष नज़र ही नहीं आता| ये सुनकर जीवा गोसाईं को अपनी गलती का एहसास हुआ और मीरा से मुलाकात की|

Meera Bai disappear in Krishna Idol in Dwarka :-

Mira Bai in Hindi
Sant Mira Bai reunion with Shri Krishna

पोराणिक किवदंतियों में ये कहा जाता है, अपना आखरी समय मीरा बाई ने द्वारका में बिताया| एक बार की बात है, मीरा बाई द्वारका स्थित द्वारकाधीश मंदिर में भजन कीर्तन कर रही थी| उस समय मीरा भावनात्मक रूप से इतना कृष्ण से जुड़ गई और नंदलाल से प्रार्थना करने लगी की उसे अपने में समा लो|

मीरा मंदिर के गर्भ गृह में गई, कपाट बंद किये| और जब लोगों ने कपाट खोले मीरा वहां नहीं थी| इस घटना के बाद कभी मीरा को नहीं देखा गया| ऐसा पुरानी लोक कथाओं में माना जाता है की मीरा द्वारकाधीश मंदिर की कृष्णा मूर्ति में समा गई|

Meera Bai Jayanti 2018 :-

मीरा बाई की जन्म तिथि के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है| फिर भी हिन्दू कलेंडर के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन मीरा बाई जयंती मनाई जाती है|

मीरा बाई जयंती बुधवार 24th अक्टूबर 2018

इस दिन लगभग मीरा बाई की 520वी जयंती मनाई जाएगी

पूर्णिमा तिथि प्रारंभ :- 10:36 PM 23rd अक्टूबर 2018

पूर्णिमा तिथि समाप्त :-   10:14 PM 24th अक्टूबर 2018

मीरा बाई द्वारा रचित ग्रन्थ – Meera Bai Books :-

संत मीरा बाई ने चार ग्रंथों की रचना की:

  • नरसी का मायरा
  • गीत गोविंद टीका
  • राग गोविंद
  • राग सोरठ के पद

इसके अलावा भी मीराबाई के गीतों का संकलन “मीरांबाई की पदावली‘ नामक ग्रन्थ में किया गया है।

Mira Bai एक प्रेरणा :-

दोस्तों मीरा बाई का जीवन हमारे लिए एक प्रेरणा है| मीरा ने एकाग्र होकर श्री कृष्णा को चाहा, उन्हें श्री कृष्णा के अलावा कुछ नज़र ही नहीं आता था|

श्री कृष्णा की छाप उनके दिलो दिमाग पर ही नहीं, उनकी आत्मा भी श्री कृष्ण के साथ एकाग्र हो गई थी| और आखिर एक ऐसा समय आया वो श्री कृष्ण में ही समा गई|

दोस्तों अगर हम अपने जीवन में सफल होना चाहते हैं| हमें एक लक्ष्य निश्चित करना होगा| और लक्ष्य निर्धारित करने के बाद उस लक्ष्य को जीना होगा|

हमें अपने उस लक्ष्य में ऐसे डूव जाना हैं वो लक्ष्य ही हमें अपने अन्दर समा ले| अर्थार्थ हमें काबिल बनना है| अगर आप काबिल हैं, तो लक्ष्य (Opportunity) अपने आप आपको तलाश लेगा|

Note :-

बंधुओ,  आपको ये आर्टिकल (life History of  Meera Bai in Hindi) कैसा लगा अपने विचारों और सुझावों से हमें comment में अवगत करायें| यदि आपको इस आर्टिकल में कुछ त्रुटी नज़र आये तो सूचित करने में संकोच न करें|

If you have any short , essay और story about history meera bai in hindi , then let us know.

 

आपके अमूल्य सुझाब ही Viral Facts India की सफलता की कुंजी है|

1 COMMENT

  1. Meera bai ki life History ko aapne iss articles me bahut hi sandar rupp se parchhuutt Kiya Hai Sir Ji, Yaise Hi Kaam Karte Rahiya Aapne blog website me, Mai 1st time yeha aaya hu mujhe aacha laga!

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