Bhakti Movement in Hindi | भक्ति आन्दोलन का इतिहास और इसके कारण

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Bhakti Movement complete information causes teachings in hindi and famous saints | भक्ति आन्दोलन का इतिहास कारण विशेषताएँ और प्रमुख संतों के नाम 

भक्ति आन्दोलन (Bhakti Movement) का भारत में प्रारंभ, मध्यकालीन भारत की एक महत्वपूर्ण घटना थी| इस आन्दोलन की शुरुआत कब हुई इसके बारे में इतिहासकारों में विभिन्न मत हैं|

कई इतिहासकार इसकी शुरुआत 6ठी शताव्दी बताते हैं तो कई इतिहासकार कहते हैं की इस आन्दोलन की शुरुआत 8वी शताव्दी में हुई|

आज हम चर्चा करेंगे भक्ति आन्दोलन के क्या कारण थे और इस आन्दोलन का धार्मिक आधार क्या था| इसके अलावा इस आन्दोलन को आगे बढ़ाने वाले संतों की भी विस्तार से चर्चा करेंगे|

जैसा की हमने बताया की भक्ति आन्दोलन की शुरुआत करीब 6ठी शताव्दी से शुरू हो गई थी| अपनी प्रारंभिक अवस्था में यह आन्दोलन सिर्फ दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित था|

15वी शताव्दी में यह आन्दोलन (Bhakti Andolan) उत्तर भारत में भी फेल गया और 15 से 17वीं शताव्दी तक यह आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था|

What were the Reasons of Bhakti Movement in Hindi

क्या कारण थे भक्ति आन्दोलन के 

यदि हम भक्ति आन्दोलन (Bhakti Movement) के कुछ मुख्य कारणों की बात करें तो 6ठी शताव्दी में बोद्ध धर्म और जैन धर्म का बहुत प्रभाव था| बोद्ध धर्म और जैन धर्म में भगवत प्राप्ति के जो रास्ते बताये गए थे वो बड़े कठिन थे, जो आम जन की समझ से परे थे|

इसके अलावा वैदिक धर्म, धार्मिक क्रियाकलापों जैसे हवन अनुष्ठान और तप पर आधारित था ये भी आम जन को संगठित नहीं कर पा रहा था और समझने में मुश्किल था|

यह समय एक ऐसा समय था जहाँ जातीवाद चरम सीमा पर था और मंदिर देवालों पर सिर्फ ऊँची जाती के लोगों का ही जाना स्वीकृत था और नीची जाती के लोगों को मंदिरों और धार्मिक क्रियाकलापों में बेठने और प्रवेश नहीं दिया जाता था|

इसके अलावा इसी समय के आस पास उत्तर भारत में मुस्लिमों का प्रवेश भारत में हो चूका था और नीची जाती के लोग हिन्दू धर्म को छोड़कर इस्लाम धर्म अपनाते जा रहे थे| जिससे हिन्दू धर्म कमजोर और अल्पसंख्यक होता जा रहा था|

हिन्दुओं का सामाजिक रूप से पतन होता जा रहा था| वल्कि हिन्दू धर्म के वेदों और धार्मिक ग्रंथों में जाती वाद का कहीं भी जिक्र नहीं था| इनमें कर्म के आधार पर मनुष्य को उपाधि देने का प्रावधान था|

उधाहरण स्वरुप वेदों में ब्राह्मण का अर्थ एक जीवन शेली से है| वेदों में बताया गया कोई भी ब्राह्मण हो सकता है| यहाँ लिखा है ब्राह्मण को न मारा जा सकता है, ब्राह्मण न जन्म लेता है और न ही इसकी म्रत्यु होती है|

अर्थार्थ ब्राह्मण का तात्पर्य ज्ञान से है, ऐसा व्यक्ति जिसे आत्मा परमात्मा और ब्रह्म का ज्ञान हो वह ब्राहमण है

लेकिन सामजिक कुरीतियों ने इसे जाती से जोड़ दिया और अब कर्म के आधार पर न होकर जन्म के आधार पर जाती मानी जाने लगी|

संछिप्त रूप में भक्ति मूवमेंट (Bhakti Movement) के कारणों को जाना जाए तो हिन्दू धर्म में उपस्थित सामाजिक कुरीतियों (मुख्यतः जातीगत भेद भाव) , बोद्ध और जैन धर्म की जटिलताओं और उत्तर भारत में इस्लाम के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए, भारत में विभिन्न संतों ने भक्ति आन्दोलन के माध्यम से हिन्दू धर्म को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया|

What was the belief of the Bhakti Movement in hindi

क्या था आधार और मान्यताएं भक्ति आन्दोलन की 

भक्ति आन्दोलन (Bhakti Movement)के संतों का मानना था की भगवान् और भक्त के बीच का सम्बन्ध प्यार, भक्ति और समर्पण का है| भगवान् को पाने का सिर्फ एक ही रास्ता है, परमात्मा का संकीर्तन, और भजन के माध्यम से परमात्मा का बार बार नाम उच्चारण करके ही भगवत प्राप्ति हो सकती है|

धार्मिक कर्म काण्ड, तीर्थ यात्रा, अन्य तंत्र मन्त्र धार्मिक आडम्बर को सिरे से नकार दिया और भगवत प्राप्ति को संकीर्तन भजन के माध्यम से सरल बनाने की कोशिश की|

भक्ति आन्दोलन में ह्रदय की पवित्रता, मानवता और समर्पण पर महत्व दिया गया| और जातीपाती के भेदभाव को सिरे से नकार दिया|

इस आन्दोलन में एकेश्वरवाद पर जोर दिया गया| अलग अलग संतों ने सिर्फ एक भगवान् के स्वरुप की भक्ति पर जोर दिया|

भगवान् को सगुण (form) और निर्गुण (Formless) दोनों ही स्वरुप में माना, कुछ संतों जैसे कबीर, गुरु नानक ने भगवान् के किसी भी स्वरुप को न मानकर उन्हें निराकार बताया और कई संतों ने जैसे मीराबाई ने भगवान् को श्री कृष्ण के स्वरुप में रामानंद ने भगवान् की राम के स्वरुप में व्याख्या की|

यानि भक्ति आन्दोलन (Bhakti Movement) में भगवान् के हर स्वरुप को स्वीकार किया और सिर्फ भजन और भक्ति का सरल मार्ग बताकर हिन्दू धर्म को सहज और आसान बनाकर जन जन तक पहुचाया|

ज्ञान प्राप्त करते रहना भी इस मार्ग का एक सिद्धांत है|

यह आन्दोलन सामान अधिकार पर आधारित था| समाज में हरेक व्यक्ति को संगत में बेठने का, मंदिर जाने का, भक्ति करने का समान अधिकार हो, इस सिद्धांत पर यह आन्दोलन आधारित था|

इस आन्दोलन में ब्राह्मणवाद को सिरे से नकार दिया|

भक्ति आन्दोलन के संतों ने क्षेत्रीय भाषाओँ का प्रयोग किया जिससे ये अपने विचारों और मान्यतों को बेहतर तरीके से जन जन तक पहुंचा पाए|

How Bhakti Movement Started in Hindi

कैसे शुरुआत हुई भक्ति आन्दोलन की

भक्ति आन्दोलन (Bhakti Movement) की शुरुआत 6ठी से 8वी शताव्दी में दक्षिण भारत से हुई| आन्दोलन का प्रादुर्भाव तमिलनाडु से हुआ और धीरे धीरे कर्णाटक और महाराष्ट्र में फेला|

15वी से 18वी शताव्दी में यह आन्दोलन पूरे भारत में फेल गया और अपनी चरम सीमा पर था|

दक्षिण भारत में भक्ति आन्दोलन (Bhakti Andolan) की शुरुआत 12 वैष्णव अलवार और 63 शैव नयनार संतों ने की | वैष्णव अलवार संत जो की विष्णु को ईष्ट देवता मानते थे, विष्णु की महिमा का गुणगान करते हुए कई कविता और भजन लिखे और इन भजनों को गाते हुए यह एक स्थान से दुसरे स्थान पर भ्रमण करके अपने विचारों का प्रचार किया करते थे|

इन्होने ही प्रसिद्ध मंदिर श्रीरंगम की स्थापना की और इनके द्वारा लिखी गई कविताओं और भजनों के संग्रह को दिव्या प्रभनधम (Divya Prabhandham) और “अलवार अरुलीचेअलगल” कहाँ जाता है|

इसके अलावा शैव संप्रदाय के संतों ,जिन्हें नयनार के नाम से जाना जाता है, ने भी शिव की महिमा का गुणगान करते हुए कविताएँ और भजन लिखे|

नयनार संतों के द्वारा लिखे गए भजन का संग्रह तिरुमुरई नाम के ग्रन्थ में देखने को मिलता है|

Contribution of Adi Shankaracharya in Bhakti Movement

अदि शंकराचार्य का भक्ति आन्दोलन में योगदान

हालाँकि भक्ति आन्दोलन (Bhakti Movement) के संतों में आदि शंकराचार्य को नहीं गिना जाता है| लेकिन शंकराचार्य के अद्वैत वाद के सिधांत को ही और सरल बनाकर भक्ति आन्दोलन के संतों ने जन जन तक पहुचाया|

अदि शंकर का जन्म 8वी शताव्दी में केरल के कलड़ी स्थान पर हुआ था| इन्होने ही अंधकार में जीते हुए हिन्दू धर्म की पुनह स्थापना की|

इन्होने भारत के चरों कोनों में शंकारचार्य मठ की स्थापना की और पूरे भारत में घूमते हुए हिन्दू धर्म के वास्तविक मूल्यों को जन जन तक पहुचाया|

यह पंडितों प्रकांडों से शास्त्रार्थ करते थे और सामने वाले को हारने पर शंकराचार्य का धर्म स्वीकार करना होता था|

शंकर की हिन्दू धर्म की व्याख्या अद्वैत वाद के सिद्धआंत पर आधारित थी| इनके अनुसार जीव और ब्रह्म एक ही हैं दो नहीं हैं हम सभी ब्रह्म ही है बस हमें अपने आपको जानना है ध्यान और योग के माध्यम से|

लेकिन यह धर्म की यह व्याख्या भी साधारण जन मानस के समझ से परे थी| लेकिन शंकर के अद्वैत वाद के सिद्धांत को और सरल बनाकर भक्ति आन्दोलन के संतों ने साधारण जन मानस के लिए व्याख्या की|

इस तरह चार नए मतों का प्रतिपादन हुआ

दक्षिण में वैष्णव संतों द्वारा स्थापित चार मत

श्री संप्रदायरामानुजाचार्यविशिष्टाद्वैतवाद
ब्रह्म संप्रदायमाधवाचार्यद्वैतवाद
रूद्र सम्प्रदायविष्णुस्वामीशुद्धद्वैतवाद
सनकादि सम्प्रदायनिम्बार्कआचार्यद्वैताद्वैतवाद

अद्वैतवाद:- आदि शंकराचार्य ने अद्वैतवाद में बताया की जीव आत्मा और ब्रह्म (परमात्मा) में कोई अंतर नहीं है हम सभी ब्रह्म है बस हमें ध्यान और योग के माध्यम से जानना है की हम भी वाही ब्रह्म का ही अंश है| लेकिन इस तर्क को ज्ञानी और जानकार लोगों ने तो माना लेकिन साधारण जनमानस को यह सिद्धांत समझ नहीं आया|

द्वैतवाद:- इसकी व्याख्या माधवाचार्यजी ने की जहाँ द्वैतवाद में बताया गया की की जिव और ब्रह्म दो अलग अलग हैं| और इन दोनों में बहुत अंतर है| यानि आत्मा और परमात्मा दो अलग है यानि दो है| आप यानि जीव और आत्मा सत्कर्म ज्ञान भक्ति के माध्यम से परमात्मा के स्वरुप में बदल सकते हो लेकिन अभी जब तक ज्ञान नहीं है आप सिर्फ जीव हो ब्रह्म नहीं हो|

यह तर्क थोडा साधारण जनमानस को समझने में आसान था| यहाँ माधवाचार्य जी ने बात शंकर के द्वारा किय गए तर्क की ही की है लेकिन यहाँ कहने और समझाने का ढंग थोडा आसान है|

विशिष्टद्वैतवाद:- यह सिधांत रामानुजाचार्य ले के आये क्योंकि उस समय कुछ लोग अद्वैतवाद और द्वैतवाद को मानकर एक दुसरे के विरोधी हो गए थे और दो गुटों में बटने लगे थे|

रामानुजाचार्य ने अद्वैतवाद और द्वैतवाद के बीच का रास्ता अपनाया और दोनों मतों को जोड़ने का प्रयास किया| इन्होने कहा हालाँकि ब्रह्म अलग है और जीवात्मा अलग है लेकिन पतले से धागे के सामान इन दोनों में सम्बन्ध है|

जैसे आग ब्रह्म है और आग से निकली हुई चिंगारी जीवात्मा है|

Layman Traslation:-

अद्वैतवाद:- जीवात्मा एक नदी के सामान है जो ब्रह्म सामान समुद्र में मिल चुकी है

द्वैतवाद:- जीवात्मा एक नदी के सामान है जो अभी समुद्र (ब्रह्म) से बहुत दूर है लेकिन समुद्र में मिलने की और जा रही है|

विशिष्टाद्वैतवाद:- जीवात्मा एक नदी के सामान है जिसका एक छोर समुद्र (ब्रह्म) से मिला हुआ है और एक दूसरा छोर मुक्त है|

हालाँकि जितने भी मत आये उनका सिर्फ एक ही आधार था अद्वैतवाद उसको ही सरल भाषा में साधारण जनमानस तक भक्ति आन्दोलन के संतों ने पहुँचाने का प्रयास किया|

Complete List of Bhakti Movement saints in Hindi

भक्ति आन्दोलन के सभी संतों का संक्षिप्त विवरण

list of all famous saints of bhakti movement in hindi

रामानुज (Ramanuja) :- (1017 – 1137) यह दक्षिण भारत के वैष्णव संत थे, इन्होने ही विशिष्टद्वैतवाद के नाम से अपना एक नया धार्मिक मत दिया|

माधवाचार्य (Madhvacharya):- (1238-1317) माधवाचार्य भी दक्षिण भारत के वैष्णव संत थे इन्होने द्वैतवाद के नाम से अपना मत प्रतिपादित किया|

निम्बार्काचार्य (NimbarkAcharya):- इनके जन्म के बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं है| ये भी लगभग 12वी शताव्दी दक्षिण भारत में जन्मे थे| और द्वैताद्वैतवाद का मत इन्होने ही प्रतिपादित किया था|

जंनेश्वारा (जंनदेवा) Jnanesvara:- (1271-1296) यह महाराष्ट्र के भक्ति आन्दोलन के प्रसिद्ध संत थे| इन्हें मराठी भाषा और साहित्य के पितामह कहे जाते हैं| इन्होने भगवत गीता का मराठी में अनुवाद(Commentry) लिखी थी जिसे ‘Jnaneshvari’ के नाम से जाना जाता है|

नामदेव (Namdev):- (1270-1350) नामदेव, जंनेश्वारा के समकालीन थे| ये जाती से दर्जी थे और विठोबा और विठल (विष्णु) पंढरपुर के उपासक थे| इन्होने ही वर्करी संप्रदाय की स्थापना की|

बसवा (Basava):- 12वि शताव्दी के भक्ति आन्दोलन के संत थे| लिंगायत सम्प्रदाय की स्थापना की, वचना साहित्य कन्नड़ भाषा में लिखा| शक्ति विशिष्टाअद्वैत मत के संस्थापक थे|

रामानंदा (Ramananda):- (14-15 शताव्दी) रामानंदा जी ही भक्ति आन्दोलन को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लेके आये और वैष्णव मत का प्रचार किया| इन इन्होने राम और सीता को अपना आदर्श माना|

रामानन्दजी ने ही सभी जातियों के लिए धर्म के द्वार खोलने में मदद की| इन्ही के प्रयासों से दलितों को भी मंदिर जाने का मौका मिला|

कबीर (Kabir):- (1440 – 1510) कबीर रामानंद के शिष्य थे| इन्होने ही हिन्दू धर्म के जातीवाद का विरोध किया| और हिन्दू और मुस्लिम के बीच का अंतर कम किया| इनके शिष्यों में हिन्दू मुस्लिम दोनों थे| इसके आलावा इन्होने मूर्ति पूजा का भी विरोध किया और भगवान् के निर्गुण (Formless) रूप की आराधना को बढ़ावा दिया|

रविदास (Ravidas):- (1450-1520) रविदास का जन्म उत्तर भारत में बनारस के पास हुआ था| रैदास के पिता जाति से चमार थे और जूते चप्पल बनाने के काम करते थे| यह जातिवाद के घोर विरोधी थे| और इसको मिटाने
के लिए जीवन भर प्रयास रत रहे| इन्होने भक्ति पर आधारित कई कविताओं की भी रचना की|

गुरुनानक (Guru Nanak):- (1469-1538) गुरुनानक जी ने ही निर्गुण भक्ति का ही समर्थन किया| ये ही सिख धर्म के प्रवर्तक थे

चैतन्य महाप्रभु (Chaitanya):- (1486 – 1533) चैतन्य महाप्रभु कृष्णा भक्ति सम्प्रदाय गौडीय मठ (बंगाली वैष्णविस्म) के संस्थापक थे| इन्होने केवल कृष्णा भक्ति को ही मोक्ष और धर्म का माध्यम माना|

विद्यापति (Vidyapati):- (14-15 शताव्दी) विद्यापति मैथली संत कवी थे| इन्होने राधा कृष्ण के ऊपर ऊपर बहुत सारी  प्रेम और श्रृंगार के ऊपर कथाएँ लिखी जिन्हें पदावली के नाम से जाना जाता है|

पुरंदर दास (Purandar Daas):- (1480 – 1564) इनका जन्म कर्णाटक में हुआ था| इन्हें कर्णाटक संगीत का पितामह भी कहा जाता है|

मीराबाई (Mirabai):- (1498-1546) राजस्थान मेड़ता की राजकुमारी और राणा सांगा मेवाड़ चित्तोडगढ की कुलबधू भी भक्ति आन्दोलन की एक प्रमुख संत थी| ये सगुण भक्ति में विश्वास करती थी इन्होने कृष्ण को अपना आदिदेव माना|

वल्लभाचार्य (Vallabhacharya):- (1479-1531) ये कृष्ण भक्ति के महान वैष्णव संत थे | इन्होने पुष्टि मार्ग (Pushti Marg) का प्रादुर्भाव किया|

सूरदास (Surdas):- (1483-1563) ये आगरा के कवि संत और कृष्ण के परम भक्त थे| इन्होने अपने महाकाव्य सुरसागर में कृष्ण के बाल स्वरूप का गुणगान किया है|

स्वामी हरिदास (Swami Haridas):- (1512-1575) हरिदास जी का जन्म खैर उत्तर प्रदेश में हुआ था| यह भक्ति आन्दोलन के एक
प्रमुख संत थे| महान संगीतज्ञ, इन्होने कृष्ण और राधा के स्वरुप और श्रृंगार का वर्णन करते हुए भक्तिमय कई भजन और कवितायेँ लिखी थी|

एकनाथ (Eknaath):- (1533-1599) यह महाराष्ट्र के भक्ति आन्दोलन के एक महान संत थे| इन्होने रामायण का अनुवाद किया था जिसे ‘भावार्थ रामायण’ के नाम से जाना जाता है| इसके अलावा भगवत पुराण के 11वे
संस्करण का भी अनुवाद किया था|

तुकाराम (Tukaram):- (1598-1650) यह भी महाराष्ट्र के एक महँ संत थे| इन्होने अभंगास (Abhangas) के नाम से भक्ति कवितायेँ लिखी हैं|

तुलसीदास (Tuslidas):- (1552-1623) तुलसीदास भी वैष्णव संत थे और सगुण भक्ति में विशवास करते थे| इनके आराध्य श्री राम थे| इन्होने कई काव्य की रचना की जिनमे रामचरित मानस, कवितावली, गीतावली प्रमुख हैं|

शंकर देवा (Shankara Deva):- (1449-1568) इन्होने वैष्णव भक्ति आन्दोलन को असम क्षेत्र में आगे बढाया|

दादू दयाल (Dadu Dayal):- (1544-1603) दादू दयाल निर्गुण भक्ति संत थे इनका जन्म गुजरात में हुआ था लेकिन बाद में राजस्थान में अपना जीवन व्यतीत किया| ये दादू पंथ के संस्थापक थे|

रामदास (Ramdas):- (1608 – 1681) महाराष्ट्र के भक्ति आन्दोलन के ये आखिरी संत थे| इन्होने दसाबोधा (Dasabodha) के नाम से भक्ति के महत्व के बताते हुए उपदेस लिखे हैं|

त्यागराज (Thyagaraja):- (1767-1847) यह तमिलनाडु के महान संत और संगीतज्ञ थे| कर्णाटक संगीत के एक महान संगीतज्ञ के रूप में इन्हें जाना जाता है| इन्होने ईष्ट देव के रूप में भगवान् राम को माना| ये भगवान् राम को विष्णु का अवतार मानते थे|

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