9 देवियों के नाम फोटो सहित | Nav Durga Names in Hindi with Images

9 देवी के नाम फोटो सहित | माँ दुर्गा के 9 रूप के नाम इन हिंदी | Maa Durga ke 9 (Nav) roop name in Hindi with images (photos) | Nav Durga Names in Hindi with photo | Navratri 9 Devi Names in Hindi

हिन्दू धर्म की अपनी कई शाखाएं हैं| इन्हें मुख्यतः हिन्दू सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है| इनमे प्रमुख हैं

वैष्णव, शैव, और शक्ति

वैष्णव, विष्णुजी को अपना प्रमुख अराध्य मानते हैं और इन्ही के अवतारों की पूजा करते हैं| शैव सम्प्रदाय के लोग शिव और इनके अवतारों की पूजा करते हैं|

शक्ति सम्प्रदाय के लोग माँ शक्ति और इनके अवतारों को अपना अराध्य इष्ट मानते हैं|

माँ शक्ति के कई रूप हैं जैसे, पार्वती, काली, माँ दुर्गा इत्यादि|

लेकिन अब सभी हिन्दू धर्म के लोग सारे इष्ट देवों की पूजा करते हैं अब सब कुछ मिक्स हो गया है|

खेर, जो भी है ठीक है| आगे चर्नचा करते हैं|

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नवरात्रों का पर्व भारत में एक प्रमुख त्यौहार है| इस नौ दिन के महोत्सव में लोग व्रत रखते हैं और माता शक्ति के नौ प्रमुख रूपों की पूजा करते हैं|

आइये आज हम माता के नवरात्री के त्यौहार में पूजे जाने वाले माता दुर्गा (पारवती) के 9 देवी के नाम के बारे में संक्षिप्त में बताते हैं

9 देवी के नाम फोटो सहित

Navratri 9 Durga Names in Hindi with Images

मुख्यतः पुरे साल में दो नवरात्रे आते हैं| एक चैत्र माह में है और एक अश्विन माह में| लेकिन हिंदी कैलेंडर के अनुसार साल में चार नवरात्रे आते हैं|

चैत्र, आषाढ़, अश्विन और माघ माह में इन चार नवरात्रों का वर्णन है|

लेकिन आषाढ़ और माघ माह के नवरात्रों को गुप्त नवरात्रे माना जाता है|

चैत्र और अश्विन माह के नवराते बहुत लोकप्रिय हैं|

अश्विन माह के नवरात्रों को माह नवरात्र के नाम से जाना जाता है| यह दशहरे से ठीक पहले आते हैं| इन नवरात्रों में माता के 9 रूपों की पूजा की जाती है| हर एक रूप का अपना अलग महत्त्व है|

दुर्गा सप्तशती ग्रन्थ के अंतर्गत देवी कवच स्तोत्र में निम्नांकित श्लोक में नवदुर्गा के नाम क्रमश: दिये गए हैं–

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।

1. शैलपुत्री

9 देवी के नाम फोटो सहित

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशंस्विनिम।।

नवरात्री के प्रथम दिन माँ दुर्गा के शैलपुत्री स्वरुप की पूजा की जाती है|

पर्वतराज के यहाँ जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है|

माता का स्वरुप

इनका वाहन वृषभ है, दाहिने हाथ में त्रिशूल, बाएं हाथ में कमल सुशोभित है| माथे पर चन्द्रमा सुशोभित है| इनका वाहन नंदी (बैल) है|

मन्त्र:- Oṃ Devī Śailaputryai Namaḥ ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः

माँ शैल पुत्री की पूजन विधि

नवरात्र पूजन में प्रथम दिन माँ दुर्गा के स्वरुप शैलपुत्री की पूजा और उपासना की जाती है। इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं।

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यहीं से उनकी योगसाधना का आरम्भ होता है। आवाहन, स्थापन और विसर्जन ये तीनों आज प्रात:काल ही होंगे।

किसी एकान्त स्थान पर बालू या मिटटी से वेदी बनाकर उसमें जौ गेंहू बोये जाते हैं। उस पर कलश स्थापित किया जाता है। कलश पर मूर्ति की स्थापना होती है।

मूर्ति किसी भी धातु या मिट्टी की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। शैलपुत्री के पूजन करने से ‘मूलाधार चक्र’ जाग्रत होता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं।

ध्यान

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।
वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

कवच

ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥
श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।
फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

2. ब्रह्मचारिणी

माँ दुर्गा के 9 रूप के नाम इन हिंदी

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

माँ दुर्गा का दूसरा स्वरुप ब्रह्मचारिणी है| यहाँ ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली|

माता का स्वरुप

माँ दुर्गा का दूसरा स्वरुप शांत और ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है| इनके बाएं हाथ में कमंडल और दायें हाथ में जप की माला रहती है|

माता शक्ति के दुसरे स्वरुप की पूजा करने से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है|

माँ ब्रह्चारिणी के स्वरुप का वर्णन इस श्लोक में देखने को मिलता है|

Mantra: Oṃ Devī Brahmacāriṇyai Namaḥ ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम:

ब्रह्मचारिणी स्वरुप की पूजा का महत्त्व

माँ दुर्गा का यह दूसरा स्वरूप अनन्त फल देने वाला है । इनकी सच्चे मन से भक्ति करने से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य,
सदाचार व संयम की वृद्धि होती है।

दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में होता है।

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इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन
कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।

माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है।

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

त्रिपुरा में ह्रदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

3. चंद्रघंटा

Maa Durga ke Nav roop name in Hindi with images

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।

माता शक्ति के तीसरे स्वरुप के माथे पर आधा चन्द्रमा है जो की एक घंटे (Bell) की तरह नजर आता है| इसीलिए इनका
नाम चंद्रघंटा पड़ा है|

माता का चंद्रघंटा स्वरुप सुहागन स्त्री की स्वरुप है|

माता का स्वरुप

माँ दुर्गा के तीसरे स्वरुप चंद्रघंटा की सवारी शेर है| इनके माथे पर आधा चन्द्रमा सुशोभित है| इनके 10 हाथ हैं|

इनके बाएं हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार और कमंडल हैं| और पांचवा हात वरदमुद्रा में है|

इनके दाहिने हाथों में कमल का फूल, धनुष बाण, और जप माला है और पांचवा हात अभय मुद्रा में है|

माता का स्वरुप का महत्त्व

माता का यह स्वरुप बुराई का नाश करने वाला है| बुराई के प्रतिक राक्षसों से हमेशा ही लड़ने के तैयार रहता है|

माता के सी स्वरुप की पूजा करने से शत्रुओं का नाश होता है और जीवन में शांति और खुशहाली आती है|

Mantra: Oṃ Devī Candraghaṇṭāyai Namaḥ ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नम:

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ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

कवच

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

भगवती चन्द्रघन्टा का ध्यान, स्तोत्र और कवच का पाठ करने से मणिपुर चक्र जाग्रत हो जाता है और सांसारिक परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है।

4. कुष्मांडा

सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तुमे।।

कु का अर्थ है थोडा, ऊष्मा का अर्थ है गर्म (उर्जा) और अंड का अर्थ है ब्रह्माण्ड|

अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा ब्रह्मांड को रचने के कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से जाना गया |

जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है।

माता का स्वरुप

माता कुष्मांडा अष्ट भुजाओं के स्वरुप में हैं, इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत कलश,
चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में जप माला है।

इस देवी का वाहन सिंह है|

माता के स्वरुप का महत्त्व

कुष्मांडा देवी का वास सूर्य है, इसलिए इनका शरीर भी सूर्य के समान कान्तिमान है| संसार के सभी जीवों में इन्ही का तेज है|

शुभ और पवित्र मन से नवरात्री के चौथे दिन कुष्मांडा देवी की पूजा आराधना करने से भक्तों को सभी रोगों और दुखों से मुक्ति मिलती है|

आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है और जीवन में ऊँचे पद और सम्मान की प्राप्ति होती है|

विधि-विधान से पूजा करने पर श्रधालुओं को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है।

माँ कुष्मांडा देवी सभी आधियों-व्याधियों से मुक्त कर, उसे सुख समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं।

Mantra: Oṃ Devī Kūṣmāṇḍāyai Namaḥ ॐ देवी कूष्माण्डायै नम:

ध्यान

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

कवच

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिगिव्दिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजं सर्वदावतु॥

5. स्कंदमाता

Nav Durga Names in Hindi with photo

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

भगवान् शिव के पुत्र कार्तिकेय की माता के रूप में यह माँ दुर्गा का पांचवा स्वरुप है| कार्तिकेय का दूसरा नाम स्कन्द है|
इसलिए माता का पांचवा स्वरुप स्कंदमाता कहलाता है|

माता का स्वरुप

माँ स्कंदमाता की चार भुजाधारी हैं। यह दायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद (कार्तिकेय) को गोद में पकड़े हुए हैं।

माँ स्कंदमाता का स्वरुप अलोकिक है| माता चार भुजा धारी हैं| यह दायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में
पकड़े हुए हैं।

नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बायीं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में
कमल पुष्प है।

यह कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है।

माता के स्वरुप का महत्त्व

इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। माना जाता है माता स्वयं सूर्य में निवाश करती हैं| माता के इस स्वरुप की सच्चे मन से पूजा करने पर आत्मविश्वाश में वृद्धि होती है|

व्यक्ति की ख्याति समाज में बढती है और व्यक्तित्व सूर्य के समान आकर्षक और प्रभावशाली हो जाता है|

सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कांतिमय हो जाता है।

अतः मन को एकाग्र रखकर और पवित्र रखकर इस देवी की आराधना करने वाले साधक या भक्त को भवसागर पार करने
में कठिनाई नहीं आती है।

Mantra: Oṃ Devī Skandamātāyai Namaḥ ॐ देवी स्कन्दमातायै नम:

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
वलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥

कवच

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।
ह्रदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारूणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥

शास्त्रों में कहा गया है कि इस चक्र में अवस्थित साधक के मन में समस्त बाह्य क्रियाओं और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है और उसका ध्यान चैतन्य स्वरूप की ओर होता है, समस्त लौकिक, सांसारिक, मायाविक बन्धनों को त्याग कर वह पद्मासन माँ स्कन्धमाता के रूप में पूर्णतः समाहित होता है।

6. कात्यायनी

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर राक्षस के संहार के लिए माता कात्यायनी ने अवतार लिया था| इनका जन्म कात्यायन ऋषि के यहाँ हुआ था इसलिए इन्हें कात्यायनी के नाम से जाना जाता है|

माता का स्वरुप

इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और लुभावना है। इनकी चार भुजाएं हैं। दायीं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में।

मां के बाँयी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है।

माता के स्वरुप का महत्त्व

माता कात्यायनी की सच्चे मन से उपासना और आराधना से भक्तों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है।

रोग, शोक, संताप और भय का नाश होता है। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं और समाज में सम्मान और उच्च पद की प्राप्ति होती है।

Mantra: Oṃ Devī Kālarātryai Namaḥ ॐ देवी कालरात्र्यै नम:

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

कवच

कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी ह्रदयं पातु जया भगमालिनी॥

आज के दिन साधक का मन आज्ञाचक्र में स्थित होता है। योगसाधना में आज्ञाचक्र का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि आज्ञा चक्र सिद्ध हो जाए तो मनवांक्षित फल की प्राप्ति होती है|

7. कालरात्रि

Navratri 9 Devi Names in Hindi

एक वेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरणी।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयड्करी।।

कालरात्रि का अर्थ है म्रत्यु की रात| कालरात्रि, समय रोशनी, जीवन और सब तरह के जीवन के रूप का मिश्रण है| माना जाता है काल से भी बड़ा है माँ दुर्गा का स्वरुप कालरात्रि

कालरात्रि माँ दुर्गा का सबसे भयंकर रूप है| इन्होने 2 राक्षस शुम्भ और निशुम्भ का वध करने के लिए कालरात्रि का रूप
धारण किया था|

नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है।

नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है।

अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है।

माता का स्वरुप

इस देवी के तीन नेत्र हैं। यह तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। यह गर्दभ की सवारी करती हैं।

ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी
भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो।

बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन यह सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं।

इसीलिए यह शुभंकरी कहलाईं। अर्थात इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं। उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है।

माता के स्वरुप का महत्त्व

कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों प्राप्ति होती हैं और सभी असुरी शक्तियां का नाश होता है|

इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं।

यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

Mantra: Oṃ Devī Kālarātryai Namaḥ ॐ देवी कालरात्र्यै नम:

ध्यान

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

स्तोत्र पाठ

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

कवच

ऊँ क्लीं मे ह्रदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

8. महागौरी

श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

माता गौरी का आठवां स्वरुप महागौरी है| यह पवित्रता और स्वक्षता का प्रतीक है| पौराणिक कथाओं के अनुसार हिमालय
की पुत्री शैलपुत्री जब 16 साल की बेहद सुन्दर और भव्य हो गई|

इनके इसी स्वरुप को महागौरी कहा गया|

माता का स्वरुप

नाम से प्रकट है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है।

इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए इन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। इनकी 4 भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा गया है।

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इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुआ है। ऊपर वाले बांए हाथ में डमरू धारण कर रखा है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है।

माता के स्वरुप का महत्त्व

यह अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है।

इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं।

Mantra: Om Devi Mahagauryai Namah ॐ देवी महागौर्यै नम

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, ह्रदयो।
क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥

देवी महागौरी का ध्यान, स्त्रोत पाठ और कवच का पाठ करने से ‘सोमचक्र’ जाग्रत होता है जिससे संकट से मुक्ति मिलती है और धन, सम्पत्ति और श्री की वृध्दि होती है। इनका वाहन वृषभ है।

9. सिद्धिधात्री

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यामाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

माता गौरी का यह स्वरुप सभी तरह की सिद्धियाँ प्रदान करने वाला है| पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान्इ शिव ने स श्रष्टि की रचना के लिए माता आदि पराशक्ति की उपासना की थी|

आदि पराशक्ति को हिन्दू धर्म में शुद्ध उर्जा के रूप में माना जाता है| जिससे इस स्रष्टि का सृजन हुआ है|

माना जाता है यही आदि पराशक्ति भगवान् शिव के दाहिने भाग से उत्पन्न हुई| इसलिए शंकर को अर्ध नारीश्वर भी कहा जाता है|

माता का स्वरुप

इस देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। इनका वाहन सिंह है और यह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं।

माता के स्वरुप का महत्त्व

इस देवी की पूजा नौंवे दिन की जाती है। यह देवी सर्व सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी हैं। सच्चे मन से भक्ति करने पर श्रद्धालु की सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती है|

हिमाचल के नंदापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां होती हैं।

इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से यह सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।

Mantra: Om Devi Siddhidatryai Namah ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नम

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिध्दीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिध्दीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिध्दीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिध्दीदायिनी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

कवच

ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां ह्रदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥

माँ भगवती सिध्दिदात्री का ध्यान, स्तोत्र व कवच का पाठ करने से ‘निर्वाण चक्र’ जाग्रत हो जाता है।

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आशा करते हैं, आपको नवरात्री की 9 देवी के नाम (Navratri 9 devi names in hindi with images) की जानकारी से आपका ज्ञानवर्धन जरुर हुआ होगा|

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