नवरात्री पूजा विधि और सामग्री की सम्पूर्ण जानकारी |How to do Navratri Pooja in Hindi

चैत्र नवरात्री पूजा (पूजन) विधि और हवन सामग्री की सम्पूर्ण जानकारी | Navratri ki puja kaise kare | navratri pooja vidhi or samagri information in hindi | How to do Navratri pooja in Hindi

नवरात्री हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्यौहार है| हिन्दू पंचांग के अनुसार वैसे तो साल में 2 बार नवरात्रे आते हैं| लेकिन चैत्र और अश्विन माह के नवरात्रों का ज्यादा महत्त्व है|

अश्विन माह के नवरात्रों को महानवरात्रे भी कहा जाता है| दोनों नवरात्री की पूजा विधि और सामग्री एक जैसी ही है|

आइये सक्षिप्त में आपको बताये देते हैं| नवरात्री की पूजा विधि और प्रक्रिया क्या है और घर पर कैसे करें और इसकी सम्पूर्ण पूजा सामग्री की लिस्ट भी आपको देय देते हैं|

नवरात्री पूजा विधि

नवरात्री पूजा प्रतिपदा (प्रथम दिन) से ही शुरू हो जाती है| सम्मुखी प्रतिपदा शुभ होती है| अमायुक्त प्रतिपदा में पूजन नहीं करना चाहिए|

सर्वप्रथम स्नान करके पवित्र वस्त्र पहन लें|

गाय के गोबर से पूजा स्थान का लेपन कर उसे पवित्र कर लेना चाहिए|

इसके बाद घटस्थापन करना चाहिए|

घाट स्थापन प्रातःकाल ही करें|

क्या नवरात्री स्त्री पुरुष दोनों कर सकते हैं

जी हाँ, नवरात्रे स्त्री पुरुष दोनों कर सकते हैं| यदि स्वयं न कर सकें तो पति, पत्नी या ब्राहमण को प्रतिनिधि बनाकर व्रत पूर्ण कराया जा सकता है|

व्रत में उपवास, बिना मांगे प्राप्त भोजन, दिन में एक बार भोजन, या रात में एक बार भोजन जो उचित लगे वो करें|

नवरात्री घट – स्थापना की विधि

घटस्थापन में कुछ साबधानियां रखनी जरुरी हैं

घट-स्थापन प्रातः काल ही करना चाहिए| लेकिन चित्रा या वैध्रतियोग हो तो उस समय घट – स्थापन न करके मध्पंयानह में अभिजित मुहूर्त में स्थापना कर करें या पंडितजी से पूछ कर किसी शुभ मुहूर्त में घट – स्थापन करें|

यदि घट – स्थापन से पहले सूतक लग जाएँ तो स्वयं पूजा न करें, किसी परिवार से बाहर के व्यक्ति या किसी पंडितजी को बुलाकर पूजा करवाएं|

लेकिन घट – स्थापना के बाद सूतक लगते हैं तो कोई परेशानी नहीं है, आप खुद पूजन कर सकते हैं|

नवरात्री पूजा सामग्री सूचि

  • एक चोडा, खुला हुआ मिटटी का गमला या बर्तन
  • गेहूँ और जौ बोने के लिए साफ मिटटी
  • कलश के लिए ताम्बे, पीतल सोने चाँदी का लौटा
  • गंगा जल या कोई भी साफ पानी
  • मोली
  • इत्र
  • सुपारी
  • सिक्के
  • 5 केले
  • अशोक या आम के पत्ते
  • अक्षत (चावल)
  • नारियल
  • लाल कपडा, नारियल लपेटने के लिए
  • फूल या माला
  • दूर्वा

नवरात्री कलश स्थापना विधि

  • घट – स्थापना के लिए पवित्र मिटटी से वेदी का निर्माण करें| या फिर आप एक चोडा गोल या चोकोर मिटटी का वर्तन लें|
  • सबसे पहले इस पर एक मिटटी की परत बनाए| फिर इसमें जौ और गेंहू के बीज डालें|
  • फिर एक और मिटटी की परत बनाएं और फिर कुछ बीज डालें| आपक इसपर आगे एक और मिटटी की परत बनाकर एक बार और बीज डाल सकते हैं|
  • अब इस पर थोडा सा पानी छिड़क दें जिससे मिटटी के साथ बीज सही से बेठ जाएँ|
  • अब एक ताबें, स्टील या सोने चांदी का कलश लें, इसके मुख पर मोली बाँध दें|
  • इसमें पानी भरकर एक दो बूंद गंगा जल की डाल दें| अब इसमें सवा रूपया, दूर्वा, अक्षत और इत्र डालें|
  • कलश के मुख पर अशोक और आम के पत्ते चारों तरफ रख कर मुख पर एक सुखा नारियल स्थापित करें|
  • लेकिन नारियल स्थापित करने से पहले इसको एक लाल कपड़े से लपेट लें|
  • यदि पूर्ण विधि पूर्वक करना हैं तो पंडितजी को बुलाकर पंचांग पूजन ( गणेशाम्बिका, वरुण, षोडशमातृका, सप्तघृतमातृका, नवग्रह आदि का देवों का पूजन कराएं|
  • इसके बाद श्रीदुर्गासप्तशती का सम्पुट अथवा साधारण पाठ भी करने का प्रावधान है|

विशेष:- वैसे तो कलश के साथ ही यहाँ हमने जौ और गेहूं के जवारे बोकर घट स्थापना कर दी है| लेकिन कई जगह अलग से मिटटी के चोडे गोल बर्तनों में मिटटी डाल कर जौ बोने की भी परम्परा है| अलग से जो जवारे बोये गए हैं उनको कई स्थान पर घट स्थापना बोला जाता है|

कलश के साथ जो ज्वारे बोये गए हैं वह भी घट स्थापना है| अब यह जो ज्वारे बोये गए हैं इनका नौ दिन तक विशेष ध्यान रखा जाता है|

नवरात्री पर दीपक स्थापना की विधि

पूजा के समय घृत (घी) भी जलाना चाहिए तथा इसकी गंध, अक्षत, पुष्प आदि से पूजा करें|

दीपक स्थापना मन्त्र इस प्रकार है|

भो दीप ब्रह्मरूपस्त्वं ह्यन्धकारनिवारक।
इमां मया कृतां पूजां गृह्णंस्तेज: प्रवर्धय।।

वैसे तो हमें नौ दिन तक अखंड ज्योत जलानी चाहिए| एक पीतल का बड़ा दिया लेकर उसमें देशी धी डाले और एक सूती धागे की बड़ी सी ज्योत इसमें लगाए जिससे यह नौ दिन तक चले|

बराबर माँ की ज्योत का ध्यान रखें और इसे बुझने न दें|

अष्टमी नवमी पूजन विधि और महत्त्व

Ashtmi Navami Pujan vidhi or Importance in Hindi

भारत के अलग अलग क्षेत्रों और जाति के हिसाब से हिन्दू अष्टमी और नवमी पर देवी माँ की आखिरी पूजा करते हैं| जैसे मेरा जहाँ तक अनुभव है बनिया समाज अष्टमी पूजता है, ब्राहमण समाज ज्यादातर नवमी पर आखिरी पूजन करता है और कन्या भोज कराता है|

बाकी ऐसा कोई नियम नहीं है, सभी लोग अपने घर परिवार में चली आ रही परम्परा के अनुसार अष्टमी और नवमी पूजते हैं|

पूजन सामग्री

  • 8 से 10 पुरियां
  • काले चने
  • रोली (कुमकुम)
  • अक्षत (चावल)
  • बतासे
  • लोंग
  • हवन सामग्री
  • पानी वाला नारियल
  • सूजी का हलुवा
  • कपूर
  • धूप
  • बत्ती
  • जायफल
  • कलावा
  • माता की चुन्नी
  • मेहंदी
  • सिंदूर
  • देसी घी
  • फूल, माला
  • लोटे में जल
  • फल
  • मिठाई

पूजन विधि

नवरात्री पूजा विधि

सबसे पहले गाय के गोबर का एक छोटा सा टुकड़ा ले कर उसे गेस की आंच पर जला लें| गोबर के टुकड़े तो तब तक जलाएं जब तक उसका धुआं बंद न हो जाए|

अब इसे एक थाली में रखकर जहाँ आप माता का भवन बनायेंगे वहां रख लें

घर के जिस स्थान पर आपने कलश और घट स्थापना की है, वहां दीवार पर सिंदूर में घी डालकर माता का भवन बनाएं

भवन बनाने के बाद अपने हाथों से सिंदूर के 2 छापे माता के भवन में लगाएं|

अब 2 बतासे लें उन्हें घी में डालकर उनके नीचे के भाग पर सूजी का हलुवा लगाकर दोनों हाथों के छाप पर चिपका दें|

अब आपने जो कंडे का टुकड़ा लिया है, उस पर हवन सामग्री और कपूर डालें| अब पूजा के लिए एक घी की दिया जलाकर इस दिए से गोबर की कंडी पर आग प्रज्वल्लित करें|

जब ज्वाला प्रज्वल्लित हो जाए अब पूजा प्रारंभ करें| ध्यान रखें गोबर की कंडी की अग्नि बुझे न जब तक

अब माँ दुर्गा और अपनी कुल देवी की तस्वीर लगाकर पूजा की शुरुआत कर सकते हैं|

सबसे पहले एक गेंदे का फूल लें और पानी के लोटे में फूल से पानी लेकर माता के भवन पर छिडकें|

अब ऊपर दी गई पूजा की सामग्री को एक स्टील की थाली में सजा कर रख लें|

अब थाली में से रोली लेकर माता के भवन पर बनाये हुए हाथ के छापों और माता की तस्वीर पर लगाएं|

अब चावल लगाएं|

अब पूरी और हलुवे से माता का भोग लगायें

अब गोबर के कंडे पर जो अग्नि प्रज्वल्लित की है उसमें हवन सामग्री डालें| बतासे पर लोंग और घी लगाकर अग्नि में समर्पित करें|

फल फूल चढ़ावें और माता के आगे दंडवत करके आशीर्वाद लें| पूजन करने के बाद अब बारी आती है कन्या भोज और पूजन की|

नवरात्री कन्या पूजन विधि और महत्त्व

पूजा करने बाद 9 कुंवारी कन्या और कम से कम एक लांगुर (लड़का) को भोजन कराने का धार्मिक प्रावधान है|

कुमारी – पूजन नवरात्र का अनिवार्य अंग है| कुमारिकाएं जगजन्ननी जगदम्बा प्रत्यक्ष विग्रह हैं| सामर्थ्य के अनुसार हो सके तो नौ दिन तक नौ, अन्यथा साथ, पांच, तीन या एक कन्या को देवी मानकर पूजा करके भोजन कराना चाहिए|

इसमें ब्राह्मण कन्या को श्रेष्ठ माना गया है|

आसन बिछाकर गणेश, वटुक तथा कुमारियों को एक पंक्ति में बिठाकर पहले ‘ॐ गं गणपतये नमः’ से गणेशजी का पंचोपचार पूजन करें, फिर ‘ॐ वं वटुकाय नमः’ से वटुकका तथा ‘ॐ कुमायै नमः’ से कुमारियों का पंचोपचार पूजन करें|

इसके बाद हाथ में पुष्प लेकर अधोलिखित मन्त्र से कुमारियों की प्रार्थना करें|

मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्।
नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम्।।
जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरुपिणि।
पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोस्तु ते।।

अर्थ : मंत्राक्षरमय, लक्ष्मीस्वरूप, मातृकाओंका रूप धारण करनेवाली एवं साक्षात् नवदुर्गात्मिका, ऐसी कन्याका मैं आवाहन करता हूं ।

इन्हें विधिवत भरपेट भोजन कराएं और भोजन उपरान्त कुंवारी कन्याओं और लांगुर को माता की चुन्नी पहनाकर पैर छुए और उचित उपहार देकर विदा करें| उपहार के स्थान पर रूपए भी दे सकते हैं|

विसर्जन

नौ रात्रि व्यतीत होनेपर दसवें दिन विसर्जन करना चाहिये। विसर्जनसे पूर्व भगवती दुर्गाका गन्ध, अक्षत, पुष्प आदिसे उत्तर-पूजनकर निम्न प्रार्थना करनी चाहिये

रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवति देहि मे।।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे॥
महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं देहि देवि नमोऽस्तु ते॥

इस प्रकार प्रार्थना करनेके बाद हाथमें अक्षत एवं पुष्प न लेकर भगवतीका निम्न मन्त्रसे विसर्जन करना चाहिये

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानं परमेश्वरि।
पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च॥

शक्तिधरकी उपासना- चैत्र नवरात्रमें शक्तिके साथ शक्तिधरकी भी उपासना की जाती है।

एक ओर जहाँ देवीभागवत, कालिकापुराण और मार्कण्डेयपुराणका पाठ होता है, वहीं दूसरी ओर श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण एवं अध्यात्मरामायणका भी पाठ होता है।

इसलिये यह नवरात्र देवी-नवरात्र के साथ-साथ राम-नवरात्रके नाम से भी प्रसिद्ध है।

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