जलियांवाला बाग हत्याकांड की कहानी | Jallianwala Bagh Massacre History in Hindi

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Jallianwala bagh massacre in hindi

Jallianwala Bagh Massacre Hatyakand story History facts in Hindi | जलियांवाला बाग हत्याकांड की कहानी इतिहास, कब हुआ था, कारण, परिणाम 

दोस्तो जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh) हत्याकांड, भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था|

इसी हत्याकांड के बाद, भारत की जनता, स्वतंत्रता आन्दोलनकारियों और भारतीय राजनेतिक नेताओं को यकीन हो गया, की ब्रिटिश राज से पूर्ण स्वतंत्रता ही अंग्रेजों के अत्याचारों से छुटकारा पाने का एक मात्र रास्ता है|

जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh) हत्याकांड के बाद गांधीजी ने भी पूर्ण समर्पण के साथ भारत की जनता को अंग्रेजों से आजादी पाने के लिए प्रेरित किया|

गांधीजी का मानना था, भारतियों के सहयोग से ही अंग्रेज भारत पर राज कर पा रहे हैं, जलियांवाला बाग में भारतियों पर गोली चलाने वाले अंग्रेज नहीं थे, उस सेना की टुकड़ी में भी भारत के ही लोग थे जिन्होंने एक अंग्रेज अफसर के आर्डर पर निहत्थे निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाई थी|

कुछ महीनों के बाद 1 अगस्त 1920 को गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया, जिसमें पूरे भारत से अंग्रेजी सरकार के साथ सहयोग न करने का आव्हान किया गया|

दोस्तो आज इस आर्टिकल में हम चर्चा करेंगे, जलियांवाला हत्याकांड क्या था, कहाँ हुआ था, कब हुआ था और जलियांवाला हत्याकांड के कारण और प्रष्ठभूमि क्या थी|

ऐसी क्या घटनाएं भूतकाल में हुई थे, जिसके आधार पर अंग्रेजों ने इतना निर्दयी और नीच कृत्य किया|

Jallianwala bagh massacre in hindi

जलियांवाला बाग हत्याकांड इन हिंदी

नाम जलियांवाला हत्याकांड
अन्य नाम अमृतसर हत्याकांड
कहाँ हुआ था अमृतसार, जलियांवाला बाग, स्वर्ण मंदी के पास
कब हुआ था 13 अप्रैल 1919
किसने करवाया कर्नल रेजिनाल्ड डायर
ब्रिटिश मिलिट्री की रेजिमेंट 29th गोरखा, 54th सिख, 59th सिंध रायफल्स
कितने लोग मरे अग्रेज सरकार के अनुसार 379 मृत, और 1100 घायल
कांग्रेस के अनुसार 1000 मृत और 1500 घायल
जनरल डायर की हत्या किसने की उधम सिंह
कहाँ मारा 13 मार्च 1940, caxton हॉल इन लन्दन
शहीद स्मारक 13 अप्रैल 1961

 

Reaons of Jallianwala Bagh Massacre In Hindi

जलियांवाला बाग हत्याकांड के कारण और प्रष्ठभूमि

भारतीय सुरक्षा अधिनियम कानून 2015 का निर्माण

28 जुलाई 1914 को प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ हो चुका था और ब्रिटेन इस युद्ध में प्रमुख भूमिका में था| ब्रिटिश आर्मी में भारतीय लड़ाके हर एक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे|

लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों ने पंजाब और बंगाल में अपने क्रांतिकारी और उग्र आंदोलनों से ब्रिटिश प्रशासन की लगभग कमर ही तोड़ दी थी|

इसी बीच भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने फरबरी 1917 में एक षड्यंत्र रचा| इस षड्यंत्र के मुताबिक पूरे भारतीय ब्रिटिश फौज में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध विद्रोह करवाना था|

इसका मकसद ब्रिटिश राज को भारत में कमजोर करना था और आजादी प्राप्त करना एक मात्र लक्ष्य| यह षड्यंत्र ग़दर राज्य क्रांती और ग़दर विद्रोह के नाम से जाना जाता है|

इस ग़दर विद्रोह में अमेरका, कनाडा और ब्रिटेन में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के अलावा भारत में रहने वाले क्रांतिकारी भी शामिल थे|

हालाँकि अंग्रेज सरकार ने समय रहते यह विद्रोह कुचल दिया| और ब्रिटिश सरकार ने अपने खिलाफ उग्र आंदोलनों और षड्यंत्रों को कुचलने के लिए एक नया कानून बनाया जिसे ‘भारतीय सुरक्षा अधिनियम 1915’ कहा जाता है|

रोलेट एक्ट 1918 (Rowlett Act 1918)

अंग्रेजों ने भारतीय सुरक्षा अधिनियम के माध्यम से कुछ हद तक उग्र आंदोलनों को नियंत्रित करने में सफलता पाई|

लेकिन प्रथम विश्व युद्ध में अनगिनत भारतीयों की मौत, युद्ध के खर्चों को पूरा करने के लिए किसानों और व्यापारियों पर भारी टैक्स और युद्ध के कारण व्यापार के ठप्प हो जाने जैसी परिस्थितयों से भारत की जनता में बहुत रोष था|

लखनऊ संधि में इंडियन नेशनल कांग्रेस और इंडियन मुस्लिम लीग ने अपने मतभेद ख़त्म करके एक साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में सहयोग करने का निर्णय लिया|

गांधीजी ने भी भारत वापस आकर सत्याग्रह आन्दोलन के माध्यम से अंग्रेजों की नींद हराम कर रखी थी|

इसके अलावा पंजाब और बंगाल में ग़दर विद्रोह का प्रभाव दुवारा से दिखने लगा था| पंजाब में आन्दोलनकारियों ने ब्रिटिश राज की नांक में दम किया हुआ था|

हालाँकि भारत की सेना ने अंग्रेजों की प्रथम विश्व युद्ध में दिल खोलकर मदद की थी, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद दुवारा से अंग्रेज सरकार का रवैया भारत की तरफ पहले जैसा ही था|

कुछ सुधार प्रशासनिक व्यवस्था में किये गए लेकिन वो न काफी थे|

अंग्रेजों को शक था की इतने वादे पैमाने पर पंजाब में आन्दोलन ग़दर विद्रोह का प्रभाव हो सकता है और इसके सदस्य अभी भी पंजाब और बंगाल में शक्रिय हो सकते हैं|

अंग्रेजों को यह भी शक था इन आन्दोलनकारियों को मदद जर्मनी और रूस से मिल रही है| इसी षड्यंत्र की जांच करने के लिए अंग्रेज सरकार ने सिडनी रोलेट की सदस्यता में 1918 में एक समिति का गठन किया जिसे रोलेट समिति कहा गया|

इस समिति ने 4 से 5 महीने तक गहन जांच की और इस नतीजे पर पहुंची की भारत में उत्पन्न आन्दोलन भविष्य में और तीव्र और हिंसक हो सकते हैं|

वर्तमान कानून भारतीय सुरक्षा अधिनियम इन आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए प्रयाप्त नहीं है| इस कानून की स्थान पर और शख्त कानून से ही इसे नियंत्रित किया जा सकता है|

रोलेट समिति के प्रस्ताव पर ही रोलेट एक्ट (Rowlett Act) को पास किया गया|

यह एक्ट बहुत ही सख्त कानून था, इस एक्ट के आने से भारत की जनता में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध रोष और गुस्सा सांतवें आसमान पर था|

जलियांवाला हत्याकांड (Jallianwala Bagh) से कुछ दिन पहले पंजाब में हुई घटनाएं

उस समय की भारतीय फौज के अनुसार इस समय 1857 जैसे विद्रोह के हालात बने हुए थे|

उस समय के पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर और IAS ऑफिसर Houssemayane Du Boulay के अनुसार ग़दर विद्रोह का प्रभाव पंजाब और बंगाल में चरम सीमा पर था| और इस ग़दर को दवाने के लिए ही यह हत्याकांड किया गया था|

अंग्रेज सरकार ने सत्याग्रह आन्दोलन के दो नेताओं सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया था| इन्ही की गिरफ्तारी का विरोध प्रदर्शन करने के लिए अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर के बाहर लोग इकठ्ठा हुए थे| लेकिन पुलिस वालों ने इन पर गोलियां चला दी, जिससे कई लोग मारे गए|

इसके विरोध में आन्दोलनकारियों ने बैंक, टेलीग्राम विभाग, डांक घर और सरकारी इमारतों में तोड़फोड़ और आग लगा दी|

इसके अलावा कई जानकारों का मानना है कई अंग्रेज नागरिकों की हत्या भी कर दी थी|

मिसनरी मर्सल्ला शेरवूड (Marcella Sherwood) के साथ बदसुलूकी

जानकार बताते हैं 11 अप्रैल 1919 को मर्सेल्ला शेरवूड एक स्कूल टीचर अपने स्कूल की छुट्टी कर अपने घर वापस आ रही थी| तब ही आन्दोलनकारियों ने उसे रास्ते में पकड़ लिया, मारा पीटा और कपडे फाड़ कर नग्न कर दिया| लेकिन कुछ स्थानीय लोगों ने उसे बचा कर एक सुरक्षित जगह पर पहुंचा दिया|

अन्य घटनाएं

बड़े पैमाने पर पंजाब में तोड़फोड़ आगजनी और कई अंग्रेज नागरिकों की हत्या के बाद 13 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश सरकार ने मार्सल लॉ लगा दिया जिसके तहत बड़े पैमाने पर मीटिंग करना, गेरक़ानूनी था|

12 अप्रैल को हिन्दू कॉलेज में हुई एक मीटिंग में यह निश्चित हुआ की कल 4.30 बजे जलियांवाला बाग में, सत्याग्रह आन्दोलन के नेताओं की गिरफ्तारी और रोलेट एक्ट के विरोध में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा|

जिसमें कांग्रेस पार्टी के नेता लाल कन्हैया भाटिया और मुहम्मद बशीर के अलावा अन्य नेता भी सभा को सम्भोदित करेंगे|

क्या हुआ था 13 अप्रैल 1919 को (जलियांवाला हत्याकांड का दिन)

Jallianwala bagh hatyakand in hindi

13 अप्रैल 1919 सुबह 9 बजे कर्नल रेजिनाल्ड डायर ने पूरे अमृतसर का दौरा किया और रात को 8 बजे लगाए गए कर्फ्यू और मार्सल लॉ के वारे में लोगों को अवगत कराया |

लेकिन यह दिन वैशाखी का दिन था और वैशाखी मेले को देखने के लिए आस पास के गाँव से भी लोग अमृतसर आये थे|

12.40 पर अमृतसर की CID ने डायर को सूचना दी थी की एक बहुत बड़ी तादात में जलियांवाला बाग़ (Jallianwala Bagh) में आन्दोलनकारियों की मीटिंग होने वाली है|

दोपहर तक आस पास के गाँव के लोग हरमिंदर साहिब के दर्शन करने के बाद जलियांवाला बाग़ में एकत्रित हो रहे थे| इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे थे जो सभा को सुनने के लिए नहीं आये थे| ऐसे ही कुछ देर बेठने के लिए बाग में आ गए थे|

कर्नल डायर ने भीड़ की समीक्षा करने के लिए एक हवाईजहाज़ भेजा, इसने जलियांवाला बाग़ (Jallianwala Bagh) के ऊपर उड़ते हुए भीड़ का अंदाजा लगाया वो करीब 6 से 7000 था|

सही 4.30 बजे मीटिंग शुरू हुई और आधे घंटे के बाद कर्नल डायर अपनी सेना की टुकड़ी के साथ जलियांवाला पहुँच गया| इस समय तक करीब 10 से 20000 की भीड़ इकट्ठी हो गई थी|

जनरल डायर अपने साथ मशीन गन लेके भी आया था| लेकिन संकरे प्रवेश द्वार की वजह से उसे मशीन गन बाहर ही छोडनी पड़ी|

अपने 90 सेनिकों के साथ डायर बाग के अन्दर पहुंचा| इनमें से 50 के पास .303 lee Enfield bolt action rifles थी|

डायर के साथ गई टुकड़ी में सिख, गोरखा और बलूच रेजिमेंट के सेनिक थे| जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के भीड़ पर गोली चलाने के आदेश दे दिए|

करीब 10 मिनट तक गोलियां चलाई गई जिसमें 1650 राउंड फायर किये गए| गोलियां तब तक चलाई गई जब तक ख़त्म नहीं हो गई|

जलियांवाला बाग हत्याकांड इन हिंदी

बहुत सारे लोग बाग में मोजूद कुए में कूद गए, जानकारों के मुताबिक 120 लोगों की लाश इस कुए से निकाली गई थी

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस हत्याकांड में करीब 337 लोगों की मौत हुई थी और 1500 लोग घायल हुए थे|

लेकिन इंडियन नेशनल कांग्रेस के अनुसार करीब 1000 लोग मारे गए थे और 1500 के आसपास घायल थे|

गुजरांवाला का प्रदर्शन और हत्याकांड

दो दिन उपरान्त 15 अप्रैल को अमृतसर हत्याकांड के विरोध में गुजरांवाला में विरोध प्रदर्शन हुआ| लेकिन इस प्रदर्शन को भी बेरहमी से कुचल दिया गया|

पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर करीब 12 लोगों को जान से मार दिया और करीब 27 को घायल कर दिया| जानकार बताते हैं यहाँ हवाईजहाज की भी मदद ली गई थी|

हंटर कमीशन

एडविन मोंतागु जो की इंडिया के सेक्रेटरी थे इनके आर्डर पर 14 अक्टूबर 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए एक समिति बनाई गई|

इस समिति के विलियम लार्ड हंटर अध्यक्ष थे| इन्ही के नामे पर इसे हंटर कमीशन कहा गया|

इस कमीशन का कार्य बॉम्बे, दिल्ली और पंजाब में हुए उपद्रव की जांच करना था|

इसके निम्नलिखित प्रमुख सदस्य थे|

  1. अध्यक्ष लार्ड हंटर
  2. कलकत्ता के जज जॉर्ज सी रंकिन
  3. सर चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड़, बॉम्बे यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर
  4. डब्लू. ऍफ़ राइस,
  5. मेजर जनरल सर जॉर्ज बैरो
  6. पंडी जगत नारायण
  7. थॉमस स्मिथ
  8. सरदार साहिबजादा सुल्तान अहमद खान,
  9. एच.सी स्टोक्स

इस कमीशन ने कई महीने छान बीन करने के बाद जनरल डायर को दोषी पाया और उसे नौकरी से निकाल दिया गया और वापस इंग्लैंड भेज दिया गया|

डायर को कोई सजा नहीं दी गई क्योंकि बहुत सारे वरिष्ठ अधिकारी इसके साथ थे|

कर्नल रेजिनोल्ड डायर का बयान

डायर को कमीशन के सामने बयान देने के लिए बुलाया गया| उसने साफ बयान दिया, की वह भीड़ को हवाई फायर करके भी तितर बितर कर सकता है, लेकिन ऐसा करने पर भीड़ वहां से चली जाती लेकिन फिर वापस आ जाती और मुझ पर हंसती|

मैंने गोली चलाकर पंजाब को आतंकवाद से बचाया है और मेरे द्वारा किया गया कार्य तर्क संगत है|

यह पूछे जाने पर अगर आप मशीनगन अन्दर ले जाते तो उसका प्रयोग करते, डायर ने हाँ में जवाब दिया|  कमीशन ने अंत में दायर को दोषी करार दिया, लेकिन सिर्फ नौकरी से हटाया ज्यादा कुछ नहीं|

 

माइकल ओ डायर की हत्या

यहाँ आपको बता दें माइकल ओ डायर और कर्नल रेजिनाल्ड डायर दोनों अलग व्यक्ति थे| ओ डायर पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था और रेजिनेल्ड डायर अमृतसर का मिलिट्री कमांडर था|

रेजिनेल्ड दायर की म्रत्यु प्राकर्तिक कारणों से 1927 में हो गई थी|

जलियांवाला बाग हत्याकांड का मुख्य दोषी माइकल ओ डायर को माना जाता है क्योंकि इसी ने रेजिनेल्ड डायर को गोली चलाने का आर्डर दिया था|

13 मार्च 1940 को लन्दन के Caxton hall में उधम सिंह से गोली मार कर हत्या कर दी थी|

बताते हैं जलियांवाला हत्याकांड के समय उधम सिंह बाग में ही थे इन्हें भी गोली लगी थी और इस गोली बारी में उनके पिता की भी म्रत्यु हो गई थी|

उधम सिंह पर लन्दन में ही मुक़दमा चलाया गया और 31 जुलाई 1940 को इन्हें फांसी दे दी गई|

जलियांवाला बाग स्मारक

इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 1920 में एक प्रस्ताव पास किया और एक ट्रस्ट बनाई गई| इस प्रस्ताव के अनुसार जलियांवाला बाग में एक स्मारक बनाना था|

1923 में ट्रस्ट ने जमीन खरीदी और अमेरिकन वास्तुकार बेंजामिन पोल्क के डिजाईन के आधार पर एक स्मारक बनाया गया|

इस स्मारक का उद्घाटन 13 अप्रैल 1961 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने किया था| बाद में इस स्थल पर एक आग की लो की भी स्थापना की गई|

आज भी हैं दीवारों पर गोलियों के निशान

Jallianwala bagh hatyakand ka itihas

यह स्थल देश विदेश के सेलानियों के लिए एक पर्यटन स्थल बन गया है| हज़ारों की तादात में लोग यहाँ आते हैं| इसकी दीवारों पर आज भी गोलियों
के निशाँ मोजूद हैं| जो इस दर्दनाक नरसंहार की याद ताजा कर देता है|

पर्यटकों को जब गाइड उस समय की घटना बताता है तो पर्यटकों का ह्रदय घटना की भयावहता को सोचकर ही सिंहर उठता है|

इस स्थान पर वह कुआं भी मोजूद है जिसमे कूदकर लोगों ने पानी जान बचाने की कोशिश की| इस कुए में से करीब 120 लाशें निकली गई थी|

ब्रिटिश सरकार से माफ़ी की मांग

ब्रिटिश सरकार ने कई बार इस हत्याकांड पर दुःख प्रकट किया लेकिन सार्वजनिक रूप से कभी माफी नहीं मागी|

1997 में महारानी एलिजाबेथ 2 भारत आई और जलियांवाला बाग गई, श्रधांजलि दी और स्मारक पर कुछ देर का मौन भी रखा| और पत्रकारों के सामने दुःख भी प्रकट किया लेकिन माफी नहीं मागी|

उनसे माफी की मांग के लिए अमृतसर में प्रदर्शन भी हुए लेकिन उस समय के प्रधानमंत्री माननीय गुजराल ने रानी का बचाव किया की रानी घटना के समय पैदा भी नहीं हुई थी, उन्हें माफी मागने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है|

साल 2016 में भारत के दौरे पर आए इंग्लॅण्ड के प्रिन्स विलियम और केट मिडलटन ने इस मुद्दे से दूरी बना के राखी और जलियांवाला बाग नहीं गए|

जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh) से जुडी अन्य घटनाएं

सुभद्रा कुमारी चौहान ने 1932 में अपनी कविताओं के संकलन बिखरे मोती में एक कविता ‘जलियांवाला बाग में बसंत’ लिखी|

1977 में इस घटना पर एक एक फिल्म जलियांवाला बाग बनाई गई जिसमें विनोद खन्ना, परीक्षित साहनी, शबाना आज़मी, सम्पूर्ण सिंह गुलज़ार और दीप्ति नवल प्रमुख भूमिका में थे| यह फिल्म बलराज तह ने डायरेक्ट की थी|

1981 सलमान रुश्दी ने एक नोवल लिखा ‘Midnight children’ जिसमें एक डोक्टर की कहानी बताई गई थी जो जलियावाला बाग में बाल बाल बच जाता है|

1982 में रिचर्ड अत्तेंबरो ने फिल्म गाँधी बनाई जिसमें एडवर्ड फॉक्स ने जनरल डायर की भूमिका निभाई थी|

1984

2002 में राजकुमार संतोषी ने लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह फिल्म जिसमें भी इस घटना को दिखाया गया था|

2006 में रंग दे बसंती फिल्म में भी इस घटना को दिखाया गया था|

2009 बाली राय ने एक नोवल लिखा ‘सिटी ऑफ़ घोस्ट’ जिसकी कहानी इसी घटना के चारों तरफ थी

2012

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