45 life changing Sanskrit slokas with meaning in hindi on vidya | विद्या संस्कृत श्लोक

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sanskrit slokas with meaning in hindi on vidya

Sanskrit slokas with meaning in hindi on vidya :- हिन्दू सभ्यता में शिक्षा का महत्व अनादिकाल से है| प्राचीन काल में आज की तरह बड़े बड़े कॉलेज और संस्थान न थे| लेकिन तब भी लोग शिक्षित थे| आखिर डिग्री होल्डर और एक शिक्षित में अंतर क्या है|

शास्त्रों में बताया गया है, ‘सा विद्या या विमुक्तये’अर्थात विद्या वह है , जो मुक्ति प्रदान करे। जिसके द्वारा हम रोग, शोक, द्वेष, पाप, दीनता, दासता, गरीबी, बेकारी, अज्ञान,अभाव, दुर्गुण, कुसंस्कार आदि की दासता से मुक्ति प्राप्त कर सकें वह विद्या है। ऐसी विद्या को प्राप्त करने वाले विद्वान कहे जाते हैं।

आज के संधर्व में बात करें तो आज की शिक्षा सिर्फ किताबों तक ही सिमित है| हम पढ़ते हैं तो सिर्फ मार्कशीट में मार्क्स लाने के लिए| लेकिन practically हम प्रॉब्लम का solution निकालने में असमर्थ हैं

दोस्तों आइये जानते हैं संस्कृत भाषा में छुपे हुए उस ज्ञान को जो आपके बिद्यार्थी जीवन में एक राम बाण साबित हो सकता है

Sanskrit slokas with meaning in hindi on vidya – Education 

sanskrit slokas with meaning in hindi on vidya education
दुर्जन:परिहर्तव्यो विद्यालंकृतो सन ।
मणिना भूषितो सर्प:किमसौ न भयंकर:।।

अर्थात:- दुष्ट व्यक्ति यदि विद्या से सुशोभित भी हो अर्थात वह विद्यावान भी हो तो भी उसका परित्याग कर देना चाहिए।
जैसे मणि से सुशोभित सर्प क्या भयंकर नहीं होता|

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं।
लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।।

अर्थात:- जिस मनुष्य के पास स्वयं का(प्रज्ञा) विवेक नहीं है, उसके शास्त्र किस काम के, जैसे नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं।।

अर्थात:- बड़ों का सम्मान करने वाले और नित्य वृद्धों (बुजुर्गों) की सेवा करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल ये चार चीजें बढ़ती हैं।

हस्तस्य भूषणम दानम, सत्यं कंठस्य भूषणं।
श्रोतस्य भूषणं शास्त्रम,भूषनै:किं प्रयोजनम।।

अर्थात:- हाथ का आभूषण (गहना) दान है, गले का आभूषण सत्य है, कान की शोभा शास्त्र सुनने से है, अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है।

विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो
धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा ।।
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु ॥

अर्थात:- विद्या अनुपम कीर्ति है, भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, कामधेनु है, विरह(अभाव) में रति (आनंद) समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, बगैर रत्न का आभूषण है, इसलिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन|

विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥

अर्थात:- विद्या विनय (विनम्रता) देती है, विनय से पात्रता (योग्यता) आती है, पात्रता से धन आता है, धन से धर्म होता है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है|

ज्ञातिभिर्वण्टयते नैव चोरेणापि न नीयते ।
दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् ॥

अर्थात:- विद्यारुपी (ज्ञान) रत्न महान धन है, जिसका बंटवारा नहीं हो सकता, जिसे चोर चोरी नहीं कर सकता, और दान करने से जिसमें कमी नहीं आती|

हर्तृ र्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता।
कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना॥

अर्थात:- जो चोरों को नजर नहीं आती, देने से जिसका विस्तार होता है, प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहीं होता, वह विद्या के अलावा कौन सा धन हो सकता है ?

श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्टि।।
संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि वुद्धिः किल कामधेनुः ||

अर्थात:- विद्या सचमुच कामधेनु है, क्योंकि वह संपत्ति को दोहती है, विपत्ति(मुसीबत) को रोकती है, यश(प्रसिद्धी)दिलाती है, मलिनता(गरीवी) धो देती है, संस्काररूप पावित्र्य द्वारा अन्य को पावन करती है|

कुत्र विधेयो यत्नः विद्याभ्यासे सदौषधे दाने ।।
अवधीरणा के कार्या खलपरयोषित्परधनेषु ।

अर्थात:- प्रयास कहाँ करना चाहिए? विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार में, त्याग कहाँ करना चाहिए? दुर्जन, परायी स्त्री और परधन में|

विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य ।
कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम् ॥

अर्थात:- विद्यावान और विनयी मनुष्य सभी का चित्त हरण(आकर्षित) कर लेता है|जैसे सुवर्ण और मणि का संयोग सबकी आँखों आँखों को सुख देता है|

विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ।
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ॥

अर्थात:- कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा, कोयल का रुप स्वर, और स्त्री का रुप पातिव्रत्य है|

रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥

अर्थात:- कोई व्यक्ति यदि रुपवान है, जवान है, ऊँचे कुल में पैदा हुआ है, लेकिन यदि वह विद्याहीन है, तो वह सुगंधरहित केसुडे के फूल की तरह शोभा नहीं देता है|

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालों ने पाठितः ।।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥

अर्थात:- जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं, वह माता शत्रु के समान है और पिता बैरी है,  ऐसा मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं देता जैसे हँसों के बीच बगुला|

अजरामरवत् प्राज्ञः विद्यामर्थं च साधयेत् ।
गृहीत एव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥

अर्थात:- बुढापा और मृत्यु नहीं आनेवाले है, ऐसा समझकर मनुष्य को विद्या और धन प्राप्त करना चाहिए| पर मृत्यु ने हमारे बाल पकड़े हैं, यह समझकर धर्माचरण करना चाहिए|

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्।
विद्या राजसु पुज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः॥

अर्थात:- विद्या इन्सान का विशिष्ट रुप है, विद्या गुप्त धन है. वह भोग देनेवाली, यशदेने वाली, और सुखकारी है. विद्या गुरुओं की गुरु है, विदेश में विद्या बंधु है| विद्या बड़ी देवता है, राजाओं में विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं, विद्याविहीन व्यक्ति पशु हीं है|

सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
अहार्यत्वादनध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा॥

अर्थात:- सब धनों में विद्यारुपी धन सर्वोत्तम है, क्योंकि इसे न तो छीना जा सकता है और न यह चोरी की जा सकती है|इसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती है और उसका न इसका कभी नाश होता है|

विद्या शस्त्रं च शास्त्रं च द्वे विद्ये प्रतिपत्तये ।।
आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥

अर्थात:- शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या ये दो प्राप्त करने योग्य विद्या हैं| इनमें से पहली वृद्धावस्था में हास्यास्पद बनाती है और दूसरी सदा आदर दिलाती है|

मातेव रक्षति पितेव हिते नियुक्ते
कान्तेव चापि रमयत्यपनीय खेदम् ।।
लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिम्
किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ।।

अर्थात:- विद्या माता की तरह रक्षा करती है, पिता की तरह हित करती है, पत्नी की तरह थकान दूर करके मन को रिझाती है, शोभा प्राप्त कराती है, और चारों दिशाओं में कीर्ति फैलाती है. सचमुच, कल्पवृक्ष की तरह यह विद्या क्या-क्या नहीं करती है|

नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत् ।।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥

अर्थात:- विद्या जैसा बंधु नहीं है, विद्या जैसा कोई मित्र नहीं है, (और) विद्या के जैसा कोई धन नहीं है और विद्या के जैसा कोई सुख नहीं है|

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सद्विद्या यदि का चिन्ता वराकोदर पूरणे ।।
शुकोऽप्यशनमाप्नोति रामरामेति च ब्रुवन् ।

अर्थात:- सद्विद्या हो तो पेट भरने की चिंता करने का कारण नहीं. तोता भी राम राम” बोलने से खुराक पा हीं लेता है|

अपूर्वः कोऽपि कोशोड्यं विद्यते तव भारति ।
व्ययतो वृद्धि मायाति क्षयमायाति सञ्चयात् ॥

अर्थात:- हे सरस्वती ! तेरा खज़ाना सचमुच अदुभत है; जो खर्च करने से बढ़ता है, और जमा करने से कम होता है|

न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥

अर्थात:- विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहीं सकता, राजा ले नहीं सकता, भाईयों के बीच उसका बंटवारा नहीं होता, न उसका कोई वजन होता है और यह विद्यारुपी धन खर्च करने से बढ़ता है. सचमुच, विद्यारुपी धन सर्वश्रेष्ठ है.

अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥

अर्थात:- अनेक संशयों को दूर करनेवाला, परोक्ष वस्तु को दिखानेवाला, और सबका नेत्ररुप शास्त्र जिसने पढ़ा नहीं, वह व्यक्ति (आँख होने के बावजुद) अंधा है.

कुलं छलं धनं चैव रुपं यौवनमेव च ।
विद्या राज्यं तपश्च एते चाष्टमदाः स्मृताः ॥

अर्थात:- कुल, छल, धन, रुप, यौवन, विद्या, अधिकार, और तपस्या – ये आठ मद हैं.

सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् ।।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥

अर्थात:- सुख चाहने वाले को विद्या प्राप्त नहीं हो सकती, और विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता| सुख चाहने वाले को विद्या पाने की आशा छोड़ देनी चाहिए, और विद्या चाहने वाले को सुख छोड़ देना चाहिए|

ज्ञानवानेन सुखवान् ज्ञानवानेव जीवति ।।
ज्ञानवानेव बलवान् तस्मात् ज्ञानमयो भव ॥

अर्थात:- ज्ञानी व्यक्ति हीं सुखी है, और ज्ञानी हीं सही अर्थों में जीता है. जो ज्ञानी है वही बलवान है, इसलिए तू ज्ञानी बन|

आरोग्य बुद्धि विनयोद्यम शास्त्ररागाः ।
आभ्यन्तराः पठन सिद्धिकराः भवन्ति ।

अर्थात:- आरोग्य, बुद्धि, विनय, उद्यम, और शास्त्र के प्रति अत्यधिक प्रेम – ये पाँच पढ़ने के लिए जरूरी आंतरिक गुण हैं.

विद्या वितर्का विज्ञानं स्मति: तत्परता किया।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥

अर्थात:- विद्या, तर्कशक्ति, विज्ञान, स्मृतिशक्ति, तत्परता, और कार्यशीलता, ये छ: जिसके पास हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है|

आयुः कर्म च विद्या च वित्तं निधनमेव च ।।
पञ्चैतानि विलिख्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ।।

अर्थात:- आयु, कर्म, विद्या, वित्त, और मृत्यु, ये पाँच चीजें व्यक्ति के गर्भ में ही निश्चित हो जाती है|

दुयतं पुस्तकवाद्ये च नाटकेषु च सक्तिता ।।
स्त्रियस्तन्द्रा च निन्द्रा च विद्याविघ्नकराणि षट् ॥

अर्थात:- जुआ, वाद्य, नाट्य (फिल्म) में आसक्ति, स्त्री (या पुरुष), तंद्रा, और निंद्रा – ये छः विद्या पाने में विघ्न होते हैं|

विद्या वितर्का विज्ञानं स्मति: तत्परता किया।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥

अर्थात:- विद्या, तर्कशक्ति, विज्ञान, स्मृतिशक्ति, तत्परता, और कार्यशीलता, ये छ: जिसके पास हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है.

आयुः कर्म च विद्या च वित्तं निधनमेव च ।।
पञ्चैतानि विलिख्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ।।

अर्थात:- आयु, कर्म, विद्या, वित्त, और मृत्यु, ये पाँच चीजें व्यक्ति के गर्भ में ही निश्चित हो जाती है.

दुयतं पुस्तकवाद्ये च नाटकेषु च सक्तिता ।।
स्त्रियस्तन्द्रा च निन्द्रा च विद्याविघ्नकराणि षट् ॥

अर्थात:- जुआ, वाद्य, नाट्य (फिल्म) में आसक्ति, स्त्री (या पुरुष), तंद्रा, और निंद्रा – ये छः विद्या पाने में विघ्न होते हैं.

आरोग्य बुद्धि विनयोद्यम शास्त्ररागाः ।
आभ्यन्तराः पठन सिद्धिकराः भवन्ति ।

अर्थात:- आरोग्य, बुद्धि, विनय, उद्यम, और शास्त्र के प्रति अत्यधिक प्रेम – ये पाँच पढ़ने के लिए जरूरी आंतरिक गुण हैं|

सालस्यो गर्वितो निद्रः परहस्तेन लेखकः ।
अल्पविद्यो विवादी च षडेते आत्मघातकाः ॥

अर्थात:- आलसी होना, झूठा घमंड होना, बहुत ज्यादा सोना, पराये के पास लिखाना, अल्प विद्या, और वाद-विवाद ये छः आत्मघाती हैं.

गीती शीघ्री शिरः कम्पी तथा लिखित पाठकः ।।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ||

अर्थात:- गाकर पढ़ना, जल्दी-जल्दी पढ़ना, पढ़ते हुए सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ़ जाना, अर्थ जाने बिना पढ़ना, और धीमा आवाज होना ये छः पाठक के दोष हैं.

स्वच्छन्दत्वं धनार्थित्वं प्रेमभावोऽथ भोगिता ।।
अविनीतत्वमालस्यं विद्याविघ्नकराणि षट् ॥

अर्थात:- स्वच्छंदता, पैसे का मोह, प्रेमवश होना, भोगाधीन होना, उद्धत होना – ये छः विद्या पाने में बाधा उत्पन्न करते हैं.

माधुर्यं अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।।
धैर्य लयसमर्थं च षडेते पाठके गुणाः ॥

अर्थात:- मधुरता, स्पष्ट उच्चारण, पदच्छेद, मधुर स्वर, धैर्य, और तन्मयता – ये पढ़ने वाले व्यक्ति के छः गुण

आचार्य पुस्तक निवास सहाय वासो ।
बाह्या इमे पठन पञ्चगुणा नराणाम् ॥

अर्थात:- आचार्य, पुस्तक, निवास, मित्र, और वस्त्र – ये पाँच पढ़ने के लिए आवश्यक बहरी गुण हैं.

तैलाद्रक्षेत् जलाद्रक्षेत्रक्षेत् शिथिल बंधनात् ।
मूर्खहस्ते न दातव्यमेवं वदति पुस्तकम् ॥

अर्थात:- पुस्तक कहता है कि, तेल से मेरी रक्षा करो, जल से मेरी रक्षा करो, मेरा बंधन शिथिल न होने दो, और मूर्ख के हाथ में मुझे मत दो

दानानां च समस्तानां चत्वार्यतानि भूतले ।।
श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥

अर्थात:- सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है.

दानं प्रियवाक्सहितं ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम् ।।
वित्तं दानसमेतं दुर्लभमेतत् चतुष्टयम् ॥

अर्थात:- प्रिय वचन के साथ दिया हुआ दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शौर्य, और दान की इच्छावाला धनये चारों दुर्लभ हैं.

गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा ।
अथवा विद्यया विद्या चतुर्थी नोपलभ्यते ॥

अर्थात:- गुरु की सेवा करके, अधिक धन देकर, या विद्या के बदले में विद्या, इन तीन तरीकों से ही विद्या पायी जा सकती है, विद्या पाने का कोई चौथा उपाय नहीं होता है.

अव्याकरणमधीतं भिन्नद्रोण्या तरंगिणी तरणम् ।
भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतम् ॥

अर्थात:- व्याकरण छोड़कर किया हुआ अध्ययन, टूटी हुई नाव से नदी पार करना, और नहीं खाने लायक भोजन के साथ दवाई खाना – ये सब चीजें करने से बेहतर है इन्हें न करना|

दोस्तो, आपको sanskrit slokas with meaning in hindi on vidya जरुर पसंद आया होगा| अगर आपके पास विद्या और education से सम्बंधित संस्कृत slokas/shlokas की और जानकारी है तो आप हमें [email protected] पर भेज सकते हैं|

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