घमंड पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas on pride in Hindi and English

घमंड पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas on pride in Hindi | अहंकार पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

दोस्तो, हमारे धर्म ग्रन्थ ज्ञान का भण्डार हैं| इन ग्रंथों में जीने की कला के हज़ारों सूत्र दिए गए हैं| आज हम बात करेंगे मानव के एक बहुत बड़े अबगुण अहंकार की| यदि व्यक्ति अपना अहंकार छोड़ दे तो इसे जीवन में आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता है|

आज, हमने इन्ही धर्म ग्रंथों से खोजकर कुछ अहंकार और घमंड पर संस्कृत श्लोक का कलेक्शन बनाया और इनका अर्थ भी हम हिंदी में दे रहे हैं| आशा करते हैं इन श्लोकों से आपने जीवन में अवश्य की सकारात्मक परिवर्तन आएगा|

अहंकार पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

अश्रुतश्च समुत्रद्धो दरिद्रश्य महामनाः।
अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः ॥

हिंदी अर्थ:- बिना पढ़े ही स्वयं को ज्ञानी समझकर अहंकार करने वाला, दरिद्र होकर भी बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाने वाला तथा बैठे-बिठाए धन पाने की कामना करने वाला व्यक्ति मूर्ख कहलाता है ।

मानं हित्वा प्रियो भवति। क्रोधं हित्वा न सोचति।।
कामं हित्वा अर्थवान् भवति। लोभं हित्वा सुखी भवेत्।।

हिंदी अर्थ:- अहंकार को त्याग कर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोध ऐसी चीज है जो किसी का हित नहीं सोचती। कामेच्छा को त्याग कर व्यक्ति धनवान होता है तथा लोभ को त्याग कर व्यक्ति सुखी होता है।

यदा किञ्चिज्ञोहं द्विप इव मदान्धः समभवम्।
तदा सर्वज्ञोस्मित्यभवदवलिप्तं मम मनः।।
यदा किञ्चित् किञ्चित् बुधजनशकाशादवगतम्।
तदा मूर्खोस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः।।

हिंदी अर्थ – जब मैं थोड़ा थोड़ा जानता था तब मैं उन्मत्त हाथी की तरह अपने आप को समझता था और मैं सोचता था कि मैं तो सब कुछ जानता हूँ, मेरे से ज्यादा कौन जानता है? पर जब मैं धीरे धीरे विद्वान लोगों के सम्पर्क आया तब मैंने देखा और जाना कि अरे! मैं तो कुछ भी नहीं जानता हूँ। तब मेरा घमण्ड ऐसे उतर गया जैसे कि बुखार उतर जाता है।

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥

हिंदी अर्थ:- वे अहंकार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोध का आश्रय लेने वाले मनुष्य अपने और दूसरों के शरीर में (रहने वाले) मुझ अन्तर्यामी के साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरों के गुणों में) दोष दृष्टि रखते हैं।

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥

हिंदी अर्थ:- जब मनुष्य के भीतर अहंकार और लिप्तता रहती है, तब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय-इस त्रिपुटी से “कर्मप्रेरणा” अर्थात् कर्म करने में प्रवृत्ति होती है कि मैं अमुक कार्य करूँगा तो मुझे अमुक फल मिलेगा। कर्म प्रेरणा होने से कर्ता, करण और कर्म-इनसे “कर्मसंग्रह” अर्थात् पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्म का संग्रह होता है। यदि कर्म संग्रह न हो तो कर्म बाँधने वाला नहीं होता, केवल क्रिया मात्र होती है।

क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
यमर्थान् नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥

हिंदी अर्थ:- जो व्यक्ति क्रोध, अहंकार, दुष्कर्म, अति-उत्साह, स्वार्थ, उद्दंडता इत्यादि दुर्गुणों की और आकर्षित नहीं होते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं ।

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये।
विस्मयो न हि कत्त्व्योन बहुरत्ना वसुधरा॥

हिंदी अर्थ:- व्यक्ति को अपनी दानशीलत, तप, शूरता, विद्व्तता, सुशीलता व नीतिनिपुणता का कभी भी अहंकार नहीँ करना चाहिये क्योँकि यह धरा बहुत शूरोँ से भरी पड़ी है अर्थात सेर का सवा सेर कहीँ न कहीँ होता अवश्य है।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

हिंदी अर्थ:- सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला अज्ञानी मनुष्य मैं कर्ता हूं-ऐसा मान लेता है।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥

हिंदी अर्थ:- जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहंकार से अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठ से युक्त हैं; जो शरीर में स्थित पाँच भूतों को अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीर को तथा अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुर निष्ठा वाले (आसुरी सम्पत्ति वाले) समझ।

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥

हिंदी अर्थ:- जब मनुष्य के भीतर अहंकार और लिप्तता रहती है, तब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय-इस त्रिपुटी से “कर्मप्रेरणा” अर्थात् कर्म करने में प्रवृत्ति होती है कि मैं अमुक कार्य करूँगा तो मुझे अमुक फल मिलेगा। कर्म प्रेरणा होने से कर्ता, करण और कर्म-इनसे “कर्मसंग्रह” अर्थात् पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्म का संग्रह होता है। यदि कर्म संग्रह न हो तो कर्म बाँधने वाला नहीं होता, केवल क्रिया मात्र होती है।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थ:- रन्तु जो कर्म भोगों की इच्छा से अथवा अहंकार से और परिश्रम पूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है।

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

हिंदी अर्थ:- जो सहिष्णु (सहनशील) नहीं है, वह “अतपस्वी” है। जो भक्ति का विरोध अथवा खण्डन करने वाला है, वह “अभक्त” है। जो अहंकार के कारण सुनना नहीं चाहता, वह “अशुश्रूषवे” है। जो भगवान् में दोष दृष्टि रखता है, वह “अभ्यसूयति” है। जिसकी भगवान् पर तथा उनके वचनों पर श्रद्धा नहीं है, जो भगवान् को मनुष्यों की तरह स्वार्थी तथा अभिमानी समझता है, वह भगवान् पर दोषारोपण करके पतन की तरफ न चला जाय, इसलिये उसे पूर्व श्लोक में कहे गये गोपनीय वचन को कहने का
निषेध किया गया है।

मान सहित विष खाय के , शम्भु भये जगदीश ।
बिना मान अमृत पिये , राहु कटायो शीश ॥

मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा।
क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः।।

अर्थ – एक मुर्ख के पांच लक्षण होते है घमण्ड, दुष्ट वार्तालाप, क्रोध, जिद्दी तर्क और अन्य लोगों के लिए सम्मान में कमी।

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च |
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् || 4||

हिंदी अर्थ:- हे, पार्थ, दंभ, घमंड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी – ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं|

अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम् ॥

हिंदी अर्थ:- मैं तो कुछ भी नहीं जानता हूँ। तब मेरा घमण्ड ऐसे उतर गया जैसे कि बुखार उतर जाता है।

न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
गाङ्गो ह्रद ईवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥

हिंदी अर्थ:- जो व्यक्ति न तो सम्मान पाकर अहंकार करता है और न अपमान से पीड़ित होता है । जो जलाशय की भाँति सदैव क्षोभरहित और शांत रहता है, वही ज्ञानी है।

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