Niti slokas in sanskrit with meaning in hindi | नीति श्लोक अर्थ सहित

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Niti Slokas in sanskrit with meaning in hindi

Niti slokas in Sanskrit with meaning in Hindi | नीति श्लोक अर्थ सहित

दोस्तो, इस संसार में जीवन जीने के भी अपने नियम है| मनुष्य एक सामाजिक व्यक्ति है| और जीवन को सुगम बनाने के लिए नितिगत लोक व्यवहार की हमें जानकारी होनी चाहिए|

हमारे वेद और शास्त्र ज्ञान का भंडार हैं, इन्ही scripture से आपके लिए कुछ निति गत श्लोक शेयर कर रहे हैं| आशा करते हैं यह ज्ञान आपके जीवन में निश्चित ही एक पॉजिटिव बदलाव लेके जरूर आएगा|

Niti slokas in Sanskrit with meaning in Hindi

Niti Slokas (1-10)

श्रिय: प्रसूते विपदः रुणद्धि, यशांसि दुग्धे मलिनं प्रमार्टि।
संस्कार सौधेन परं पुनीते, शुद्धा हि बुद्धिः किलकामधेनुः ।।

पवित्र और शुद्ध बुद्धि (समझ) कामधेनु के सामान है, यह धन-धान्य पैदा करती है; विपत्तियों से बचाती है; यश और कीर्ति रूपी दूध से मलिनता को धो डालती है; और निकटतम लोगों को अपने पवित्र संस्कारों से पवित्र करती है।

दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि |
एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते ||

दयाभाव के बिना किया गया कर्म का फलरहित होता है, ऐसे काम में धर्म(सत्य) नहीं होता| जहाँ दया नही है वहां वेद (धर्म) भी अवेद (अधर्म) बन जाते हैं|

उपाध्यात् दश आचार्यः आचार्याणां शतं पिता |
सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेण अतिरिच्यते ||

अर्थात- व्यक्ति के निर्माण में, एक आचार्य (आध्यात्मिक गुरु और वेदों-शास्त्रों का मर्मज्ञ) उपाध्याय (वेदों को जानने वाला) से दस गुना श्रेष्ठ होता है। पिता सौ आचार्यों के बराबर, और माता हज़ार पिताओं से श्रेष्ठ होती है।

एकेन अपि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम् |
सह एव दशभिः पुत्रैः भारं वहति गर्दभी ||

सिंही एक ही पुत्र को जन्म देकर उसके बल पर निर्भीक होकर सोती है, गदही दस पुत्रों की माँ होकर भी उनके साथ बोझ ढोती है| तात्पर्य हिया की कई अगुणी या मुर्ख संतानों की अपेक्षा विधासंपन्न एक ही संतान श्रेष्ठ है|

वासः प्रसूतिः खलु योग्यताया वासोविहीनं विजहाति लक्ष्मीः |
पीताम्बरं वीक्ष्य ददौ तनूजां दिगम्बरं वीक्ष्य विषं समुदः ||

परिधान योग्यता का परिचायक होता है। वस्त्रहीन को तो लक्ष्मी भी त्याग देती है। समुद्र ने पीले सुंदर वस्त्र धारण करनेवाले विष्णु को अपनी पुत्री लक्ष्मी दे दी जबकि नग्न शिव को विष मिला। अतः समय और स्थान के अनुसार परिधान धारण करना चाहिए।

स्वभावं न जहात्येव साधुरापद्गतोऽपि सन् |
कर्पूरः पावकस्पृष्टः सौरभं लभतेतराम् ||

सज्जन व्यक्ति अपना नैसर्गिक अच्छा स्वभाव किसी बडी आपदा में भी उसी  प्रकार नहीं छोड़ता हैं जिस प्रकार आग के संपर्क में भी आकर कपूर अपना मूल स्वाभाव(सुगंध) नहीं छोड़ता है बल्कि और भी अधिक सुगंध फैलाता है।

शोको नाशयते धैर्य, शोको नाशयते श्रृतम् ।।
शोको नाशयते सर्वं, नास्ति शोकसमो रिपुः ॥

शोक धैर्य को नष्ट करता है, शोक ज्ञान को नष्ट करता है, शोक सर्वस्व का नाश करता है । इस लिए शोक जैसा कोइ शत्रू नही है।

चन्दनं शीतलं लोके,चन्दनादपि चन्द्रमाः |
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः ||

संसार में चन्दन को सबसे ज्यादा शीतल है लेकिन चन्द्रमा चन्दन से भी ज्यादा शीतल है| अच्छे मित्रों और सत्संग का साथ चन्द्र और चन्दन दोनों की तुलना में अधिक शीतलता देने वाला होता है|

सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा |
शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ||

सत्य मेरी माता, ज्ञान मेरे पिता, धर्म मेरा बन्धु, दया मेरा सखा, शांति मेरी पत्नी तथा क्षमा मेरा पुत्र है, यह मेरे रिश्तेदार हैं|

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् |
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||

महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं | पहली –परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी —
पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना |

Niti Slokas (10-20)

न अन्नोदकसमं दानं न तिथिद्वादशीसमा ।
न गायत्रयाः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम् ॥

अन्नदान जैसा दान नही है। द्वादशी जैसी पवित्र तिथी नही है। गायत्री मन्त्र सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है तथा माता सब देवताओं से भी श्रेष्ठ है।

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन, |
विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्न तु चन्दनेन ||

कानों की शोभा कुण्डलों से नहीं अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है | हाथ दान करने से सुशोभित होते हैं
न कि कंकणों से | दयालु / सज्जन व्यक्तियों का शरीर चन्दन से नहीं बल्कि दूसरों का हित करने से शोभा पाता है |

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका |
तृणैर्गुणत्वमापत्नैर् बध्यन्ते मत्तदन्तिनः||

छोटी छोटी वस्तुएँ एकत्र करने से बड़े काम भी हो सकते हैं। जैसे घास से बनायी हुई डोरी से मत्त हाथी बांधा जा सकता है।

वनेऽपि सिंहा मृगमांसभक्षणो बुभुक्षिता नैव तृणं चरन्ति |
एवं कुलीना व्यसनाभिभूता न नीचकर्माणि समाचरन्ति ||

जंगल मे मांस खाने वाले शेर भूक लगने पर भी जिस तरह घास नही खाते, इसी तरह उच्च कुल में जन्मे हुए व्यक्ति
( सुसंस्कारित व्यक्ति) संकट काल मे भी नीच काम नहीं करते।

विपदी धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः |
यशसि चाभिरूचित्र्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ||

आपातकाल मे धैर्य, अभ्युदय मे क्षमा, सदन मे वाक्पटुता, युद्ध के समय बहादुरी, यश मे अभिरूचि, ज्ञान का व्यसन ये सब चीजे महापुरूषों मे नैसर्गिक रूप से पायी जाती हैं।

यदा न कुरूते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् |
समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिश: ||

जो मनुष्य किसी भी जीव के प्रति अमंगल भावना नहीं रखता, जो मनुष्य सभी की ओर सम्यक् दृष्टी (समान) से देखता है, ऐसे मनुष्य को सब ओर सुख ही सुख है।

परिवर्तिनि संसारे मृत: को वा न जायते |
स जातो येन जातेन याति वंशः समुतिम् ||

इस परिवर्तनशील संसार में किसी एक की मृत्यु के पश्चात् क्या कोई दूसरा जन्म नहीं लेता है अर्थात् जन्म लेना और मरना निरंतर चलता रहता है । परन्तु जो व्यक्ति अपनी जाति तथा वंश को असीम ऊंचइयों तक ले जाता है वास्तव में वही जन्म लेता है अर्थात् उसका ही जन्म लेना सफल है।

आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः |
शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति ||

जो मनुष्य (कुछ काम किए बिना) बैठता है, उसका भाग्य भी बैठता है। जो खड़ा रहता है, उसका भाग्य भी खड़ा रहता है। जो सोता है। उसका भाग्य भी सोता जाता है और जो चलने लगता है, उसका भाग्य भी चलने लगता है। अर्थात कर्म से ही भाग्य बदलता है ।

अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्तेभ्यः कुशलो नरः |
सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः ||

भवरा जैसे छोटे बड़े सभी फूलो मे से केवल मधु (शहद) ही लेता है उसी तरह चतुर मनुष्य को भी शास्त्रो मे से केवल उनका सार ही लेना चाहिए।

सर्वार्थसंभवो देहो जनित: पोषितो यतः |
न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मत्र्य: शतायुषा ||

एक, सौ वर्ष की आयु प्राप्त हुआ मनुष्य देह भी अपने माता पिता के ऋणों से मुक्त नहीं होता। जो देह चार पुरूषार्थो (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की प्राप्तिी का प्रमुख साधन हैं, इस शरीर का निर्माण तथा पोषण जिन के कारण हुआ है, उनके ऋण से मुक्त होना असंभव है।

A mortal (a man) with the life of one hundred years even, cannot be free from the debts of his parents, from whom the body, which is the root of the four principal objects of human life (Dharma, Artha, Kaama and Moksha), has originated and by whom it has been nourished.

Niti Slokas (21-30)

आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा |
पात्यते तु क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोषयोः ||

शिला को पर्वत के उपर ले जाना एक कठिन कार्य है परन्तु पर्वत के उपर से नीचे ढकेलना बहुत ही सुलभ। ऐसे ही मनुष्य को सदगुणों से युक्त करना कठिन है पर उसे दुर्गुणों से भरना बहुत ही सुलभ है।

विद्या मित्रं प्रावासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च |
व्याधितस्योषधं मित्रं धर्मों मित्रं मृतस्य च ||

विद्या प्रावास के समय मित्र है । पत्नी अपने घर मे मित्र है। व्याधी ग्रस्त शरीर को औषधी मित्र है तथा मृत्यु के पश्च्यात धर्म अपना मित्र है।

न मर्षयन्ति चात्मानं संभावयितुमात्मना |
अदर्शयित्वा शूरास्तू कर्म कुर्वन्ति दुष्करम् ||

शूरवीर अपने मुख पर दूसरों के द्वारा की गई प्रसंशा पसंद नहीं करते| शूरवीर अपना पराक्रम शब्दों से नहीं बल्कि मुश्किल और कठिन कार्यों को करके दिखाते हैं|

The brave people do not like being praised in front of them. They display their valiour not by words but by doing difficult deeds.

आर्ता देवान् नमस्पन्ति, तप: कुर्वन्ति रोगिणः |
निर्धना: दानम् इच्छन्ति, वृद्धा नारी पतिव्रता ||

संकट में लोग भगवान की प्रार्थना करते है, रोगी व्यक्ति तप करने की चेष्टा करता है। निर्धन को दान करने की इच्छा होती है तथा वृद्ध स्त्री पतिव्रता होती है। लोग केवल परिस्थिती के कारण अच्छे गुण धारण करने का नाटक करते है।

अधर्मेणैवते पूर्व ततो भद्राणि पश्यति |
ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ||

कुटिलता व अधर्म से मानव क्षणिक समृद्वि व संपन्नता तो हांसिल कर लेता है।  शत्रु को भी जीत लेता है। अपनी कामयाबी पर प्रसन्न भी होता है। परन्तु अन्त मे उसका विनाश निश्चित है।

असभ्दिः शपथेनोक्तं जले लिखितमक्षरम् |
सभ्दिस्तु लीलया प्रोक्तं शिलालिखितमक्षरम् ||

दुर्जनो ने ली हुइ शपथ भी पानी के उपर लिखे हुए अक्षरों जैसे क्षणभंगूर ही होती है। परन्तु संत व्यक्ति ने सहज रूप से बोला हुआ वाक्य भी पत्थर पर खिंची हुई लकीर की तरह होता है ।।

सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्मधं त्यजति पण्डित: |
अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशो हि दुःसहः ||

जब सर्वनाश निकट आता है, तब बुद्धिमान मनुष्य अपने पास जो कुछ है उसका आधा गवाने (आधा बचाने) का प्रयास करता है। क्योंकि आधे से भी काम चलाया जा सकता है, परंतु सब कुछ गवाना बहुत दु:खदायक होता है।

शरदिन वर्षति गर्जति वर्षति वर्षासु नि:स्वनो मेघ: |
नीचो वदति न कुरुते न वदति सुजन: करोत्येव ||

शरद ऋतु में बादल केवल गरजते है, बरसते नही। वर्षा ऋतु में बरसते है, गरजते नही। नीच (दुष्ट) मनुष्य केवल बोलता है, कुछ करता नही| परन्तु सज्जन करता है, बोलता नही।

श्रमेण दुःखं यत्किन्चिकार्यकालेनुभूयते |
कालेन स्मर्यमाणं तत् प्रामोद ||

उचित काम को करते समय होने वाले कष्ट के कारण थोडा दु:ख तो होता है। परन्तु भविष्य में उस काम का स्मरण होने पर निश्चित ही आनंद का अनुभव होता है।

यत्र नार्यः तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः |
यत्र एताः तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्र अफलाः क्रियाः ||

जहां स्त्रीयों का मानसम्मान होता है तथा उनकी पूजा(आदर) होती है वहां देवता स्वंम निवास करते है। परन्तु जहां स्त्रीयों की निंदा होती है तथा उनका सम्मान नही किया जाता वहां कोई भी कार्य सफल नहीं होता।

Niti Slokas (31-40)

खद्योतो द्योतते तावद् यवन्नोदयते शशी |
उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः ||

जब तक चन्द्रमा उगता नही, तब तक जुगनु चमकता है। परन्तु जब सुरज उगता है तब जुगनु भी नही होता तथा चन्द्रमा भी नही, दोनो सुरज के सामने फीके पड़ते है। अर्थार्थ सूरज की भांति ज्ञानवान बनो, पूरा विश्व तुम्हारे सामने नतमस्तक होगा|

यावत् भ्रियेत जठरं तावत सत्वं हि देहीनाम् |
अधिकं योभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ||

अपने स्वयम के पोषण के लिए जितना धन आवश्यक है उतने पर ही अपना अधिकार है। यदि इससे अधिक पर हमने अपना अधिकार जमाया तो यह सामाजिक अपराध है तथा हम दण्ड के पात्र है। (Manusmriti)

को न याति वशं लोके मुखे पिण्डेन पूरित:|
मृदंगो मुखलेपेन करोति मधुरध्वनिम् ||

इस संसार में कौन ऐसा है जो मुख में भोजन देने (इच्छा या आवश्यकता की पूर्ति) कर देने पर वश में नहीं हो जाता ?
मृदंग (ढोलक) भी मुंह पर आटे का लेप लगाने के उपरांत मधुर ध्वनि देने लगता है।

गुणेषु क्रियतां यत्नः किमाटोपैः प्रयोजनम् |
विक्रीयन्ते न घण्टाभि: गाव: क्षीरविवर्जिताः || 

स्वयं के आचरण और व्यवहार में अच्छे गुणों की वृद्धी करनी चहिए। दिखावा करके लाभ नहीं होता। जैसे दुध न देने वाली गाय उसके गले मे लटकी हुई घंटी बजाने से बेची नही जा सकती।

न प्राप्यति सम्माने नापमाने च कुप्यति |
न क्रुद्धः परूषं ब्रूयात् स वै साधूत्तमः स्मृतः||

संत वही है जो मान देने पर हर्षित नही होता, अपमान होने पर क्रोधीत नही होता तथा स्वयं क्रोधीत होने पर कठोर शब्द नही बोलता।

लुब्धमर्थेन गृणीयात् क्रुद्धमञ्जलिकर्मणा |
मूर्ख छन्दानुवृत्त्या च तत्वार्थेन च पण्डितम् ||

लालची मनुष्य को धन (का लालच) देकर वश में किया जा सकता है। क्रोधित व्यक्ति के साथ नम्र भाव रखकर उसे वश में किया जा सकता है।  मूर्ख मनुष्य को उसके इच्छा अनुरूप बर्ताव कर वश में किया जा सकता है। लेकिन ज्ञानि व्यक्ति को केवल मुलभूत तत्व (सत्य) बताकर ही वश में कर सकते है।

चलन्तु गिरय: कामं युगान्तपवनाहताः |
कृच्छेरपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मनः ||

युगान्तकालीन वायु के झोंकों से पर्वत भले ही चलने लगें, परन्तु धैर्यवान् पुरूषों के निश्चल मन किसी भी संकट में नहीं डगमगाते ।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् |
मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम् ||

महान व्यक्तियों के मन मे जो विचार होता है वही वे बोलते हैं और वैसा ही इनका शुद्ध आचरण होता है। इसके विपरीत दुष्ट के मन मे कुछ और होता है, बोलते कुछ और हैं, और करते कुछ और ऐसे लोगों पर अँधा विश्वाश करना अपने पेरों पे खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा है|

दूरस्था: पर्वता: रम्या: वेश्याः च मुखमण्डने |
युध्यस्य तु कथा रम्या त्रीणि रम्याणि दूरतः ||

पहाड दूर से देखने पर बहुत अच्छे दिखते है। मुख विभुषित (Makeup) करने के बाद वैश्या भी अच्छी दिखने लगती है। युद्ध की कहानिया सुनने में बहुत अच्छी लगती है। यइन तीनों पर्याप्त दूरी बनाये रखना ही उचित है|

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