Mahatma Gandhi Biography in Hindi | महात्मा गाँधी का जीवन परिचय और इतिहास

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Mahatma gandhi biography in hindi

Mahatma Gandhi Biography Life History Information story in Hindi | महात्मा गाँधी का जीवन परिचय और इतिहास 

महात्मा गाँधी, एक ऐसी महान सख्सियत जिसने पूरी दुनिया को अहिंसा का मार्ग दिखाया| एक गीत भारत में प्रचलित है “दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, सावरमती के संत तूने कर दिया कमाल”|

 महात्मा गाँधी जिन्होंने न केवल अहिंसा के मार्ग को अपना कर, क्रूर अग्रेंजों के खिलाफ आज़ादी के आन्दोलन का नेतृत्व किया, बल्कि 15 अगस्त 1947 में आज़ादी दिलाने में कामयाब भी रहे|

और पूरे विश्व को इस बात पर विश्वास करने पर मजबूर किया सिर्फ अहिंसा ही एक ऐसा मार्ग है जिससे आप अपने दुश्मन का भी दिल जीत सकते हो|

अल्वर्ट आइन्स्टीन ने महात्मा गाँधी के 70वें जन्मदिवस पर बापू की प्रशंसा करते हुए कहा था,

“Generations to come, it may well be, will scarce believe that such a man as this one ever in flesh and blood walked upon this Earth.”

अर्थार्थ, हमारी आने वाली भविष्य की पीड़ी शायद ही विश्वास करे की कोई ऐसा भी इंसान इस धरती पर पैदा हुआ था|

दोस्तो, आइये जानते हैं ऐसी महान आत्मा महात्मा गाँधी का जीवन परिचय और इतिहास (Mahatma Gandhi Biography in Hindi) विस्तार से इनके एक साधारण बालक से एक महान शख्शियत बनने का सफ़र|

Mahatma Gandhi Biography in Hindi

महात्मा गाँधी का जीवन परिचय और इतिहास

ParticularDetail
पूरा नाममोहनदास करमचंद गाँधी
अन्य नाममहात्मा गाँधी, बापूजी, गांधीजी
जन्म दिनांक2 अक्टूबर 1869
जन्म स्थानपोरबंदर, पोरबंदर स्टेट, काठियावाड़ एजेंसी, बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश इंडिया,
वर्तमान में गुजरात इंडिया
पिता का नामकरमचंद गाँधी
माता का नामपुतलीबाई
भाईलक्ष्मीदास(कालिदास), करसनदास
बहनरलियतबेन (गोकिबेन), मुलीबेन (सोतेली)
पनकुनवरबेन (सोतेली)
पत्नीकस्तूरबाई माखंजी कपाडिया (कस्तूरबा गाँधी)
संतानहरिलाल, मणिलाल, रामदास, देवदास
शिक्षाबेरिस्टर
राष्ट्रीयताभारतीय
व्यवसायवकील
राजनितिक दलकांग्रेस
पदभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष
आजादी में योगदानभारत के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व
उल्लेखनीय कार्यअसहयोग आन्दोलन, भारत छोडो आन्दोलन, स्वदेशी आन्दोलन
सिग्नेचरmahatma gandhi signature image
म्रत्यु 30 जनवरी 1948 उम्र 78 साल
म्रत्यु का कारणहत्या
हत्यारे का नामनाथूराम गोडसे

Mahatma Gandhi Life History in Hindi

आइये चर्चा करते हैं गांधीजी के प्रारंभिक जीवन की

महात्मा गांधीजी का प्रारंभिक जीवन

मोहनदास करमचंद गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को एक गुजराती हिन्दू बनिया परिवार में गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर (जो की काठियावाड़ प्रायद्वीप सोराष्ट्र में स्थित है) हुआ था|

गांधीजी के पिता करमचंद गाँधी पोरबंदर प्रिंसली स्टेट के दीवान थे| करमचंदजी ने चार शादियाँ की थी, पहली दो पत्नियाँ का प्रसव (डिलीवरी) के समय देहांत हो गया था|

इन दोनों पत्नियों से 2 लड़कियां मुलीबेन, पनकुनवरबेन हुईं, इनकी तीसरी पत्नी से कोई संतान नहीं थी| करमचंदजी ने अपनी तीसरी पत्नी की सहमति से चौथी शादी पुतलीबाई से की|

पुतलीबाई से चार संतानें हुईं, लक्ष्मीदास (पुत्र), रालिअतबहन(पुत्री), करसनदास(पुत्र) और मोहनदास(पुत्र), मोहनदास अपने चारों भाई बहनों में सबसे छोटे थे|

गांधीजी की बड़ी बहन बताती हैं, ये बचपन में बहुत शरारती थे और इन्हें कुत्तों के कान मरोड़ना बहुत पसंद था|

गांधीजी की माँ पुतलीबाई बहुत धार्मिक महिला थी और बचपन में अपने सभी बच्चों को धार्मिक शिक्षा के साथ साथ श्रवण कुमार और राजा हरिश्चंद्र की प्रेरणा दायक कहानिया सुनाया करती थी|

गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया था की हरिश्चंद्र की सत्यवादिता का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा|

1874 में गांधीजी के पिता राजकोट आ गए और यहाँ के राजा के काउंसलर बन गए| 1876 में पदोन्नति के बाद इन्हें राजकोट का दीवान नियुक्त कर दिया गया|

दीवान का पद प्राप्त करने के वाद करमचंदजी ने अपने पूरे परिवार को राजकोट बुला लिया|

महात्मा गाँधी जी की प्रारंभिक शिक्षा

9 साल की उम्र में गांधीजी ने राजकोट के एक स्थानीय स्कूल में एडमिशन ले लिया| यहाँ इन्होने गणित, इतिहास और गुजराती भाषा की शिक्षा ली|

11 साल की उम्र में राजकोट के ही उच्च प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश लिया|

अपनी आत्मकथा में इन्होने लिखा है, की वह पढाई में औसत थे, खेल में इन्हें कोई रूचि नहीं थी इसके अलावा ये शर्मीले स्वभाव के थे|

महात्मा गांधी जी का वैवाहिक जीवन

1883, 13 साल की उम्र में मोहनदास का विवाह कस्तूरबाई माखंजी कपाडिया से कर दिया गया| कस्तूरबा की उम्र उस समय 14 साल थी|

1885 में इनके पिता का देहांत हो गया, 17 साल की उम्र में कस्तूरबा ने अपने पहले बच्चे को जन्म दिया लेकिन वह कुछ ही दिन जीवित रहा|

इसके बाद गाँधी दम्पत्ति के चार बच्चे हुए, हरिलाल (1888), मणिलाल (1892), रामदास (1897) और देवदास (1900).

महात्मा गांधी जी की उच्च शिक्षा

1887 में 18 साल की उम्र में गांधीजी अहमदाबाद के हाई स्कूल से अपनी माध्यमिक शिक्षा सम्पूर्ण की|

जनवरी 1888 में भावनगर के सामलदास कॉलेज में प्रवेश लिया, लेकिन बीच में ही कॉलेज छोड़कर पोरबंदर चले आये|

गांधीजी के पारिवारिक मित्र मावजी दवे जोशीजी ने मोहनदास को लन्दन से वकीलात करने की सलाह दी| लेकिन परिवार वाले राजी नहीं थे|

लेकिन मोहनदास के बड़े भाई लक्ष्मीदास ने मोहनदास के लन्दन से लॉ करने का समर्थन किया और घरवालों को भी राजी कर लिया|

10 अगस्त 1888 को गांधीजी पोरबंदर से मुंबई को रवाना हो गए| वहां अपने जानने वालों के यहाँ कुछ दिन रुके और 4 सितम्बर को पानी के जहाज में बैठकर लन्दन रवाना हो गए|

लन्दन में इन्होने “University college, London” में प्रवेश लिया और लॉ का पढाई करने लगे| यहाँ इन्होने बैरिस्टर बनने के लिए “Inner Temple” बार कौंसिल में अपना रजिस्ट्रेशन कराया|

इन्होने अपना पहला केस 22 साल की उम्र में लड़ा और कोर्ट में वकील के तौर पर पेश हुए और “Called to the bar” की उपाधि प्राप्त की|

जून 1891 में गांधीजी भारत लोट आये|

मोहनदास गाँधी का व्यावसायिक जीवन

मुंबई में गांधीजी ने वकील के तौर पर काम करना शुरू किया लेकिन वकील के पेशे में कामयाब नहीं हो पाए और वापस राजकोट आ गए|

यहाँ इन्होने मुकदमों के लिए कागज तैयार करने का काम शुरू कर लिया| लेकिन एक ब्रिटिश ऑफिसर सैम सन्नी ने उनका यह काम बंद करवा दिया|

महात्मा गाँधी और साउथ अफ्रीका जाने का संयोग

1893, में काठियावाड़ के एक मुस्लिम व्यापारी दादा अब्दुल्लाह ने गांधीजी से संपर्क किया, अब्दुल्लाह का साउथ अफ्रीका में शिपिंग (जहाज) का व्यापार था|

जोहंस्बुर्ग साउथ अफ्रीका में उन्हें एक वकील की जरुरत थी लेकिन वह काठियावाड़ इलाके का ही एक विश्वशनीय वकील चाहिए था|

गांधीजी को 105 पाउंड्स सैलरी के साथ आने जाने का खर्चा तय हुआ और कम से कम एक साल के लिए गांधीजी को ब्रिटिश साम्राज्य के दक्षिण अफ्रीका में स्थित उपनिवेश (colony) नेटल (Natal) में रहना था|

अप्रैल 1893 में 23 साल की उम्र में साउथ अफ्रीका को रवाना हो गए|

महात्मा गाँधी जी के साउथ अफ्रीका में 21 साल (1893 – 1914)

साउथ अफ्रीका में जाते ही गांधीजी को भेदभाव का सामना करना पड़ा| गोरे यूरोपियन काले रंग के लोगों से भेदभाव करते थे|

गाँधीजी ने अपनी आत्म कथा में कई घटनाओं का जिक्र किया है| जैसे एक बार उन्हें टिकट होने के बावजूद ट्रेन के फर्स्ट क्लास के डिब्बे में नहीं बेठने दिया गया और ड्राईवर के डब्बे में फर्श पर बेठने पर मजबूर होना पड़ा|

एक बार गांधीजी को ट्रेन से ही धक्का दे दिया, गांधीजी बताते हैं एक बार उन्हें किसी घर के पास से गुजरने पर गट्टर में फ़ेंक दिया गया था|

साउथ अफ्रीका में फूटपाथ पर चलना भी काले और भारतीय लोगों के लिए मना था|

गांधीजी के एक बार मन में आया की भारत वापस लोट आयें, लेकिन उनकी अंतरात्मा ने सत्य के साथ रहने का फेसला लिया|

अब गाँधीजी ने ठान लिया था की इस काले गोरे के भेदभाव का वे अपने जीवन की अंतिम स्वास तक विरोध करेंगे|

यही से मोहनदास करमचंद गाँधी का अत्याचार और अन्याय के प्रति संघर्ष शुरू हो गया था|

हालांकि मई 1894 में अब्दुल्लाह केस का कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हो गया था| और मोहनदासजी ने भारत आने का विचार बना लिया था|

लेकिन वहां भारतीयों और अफ्रीका के काले लोगों पर हो रहे अत्याचार से लड़ने का उन्होंने फेसला कर लिया था|

गांधीजी ने अपना भारत आने का विचार त्याग दिया और अपने जीवन के महत्वपूर्ण 21 साल साउथ अफ्रीका में बिताये|

महात्मा गाँधी जी की साउथ अफ्रीका में उप्लव्धियाँ

गाँधीजी ने अंग्रेजों के उस बिल का विरोध किया जिसमें साउथ अफ्रीका में वोट देने का अधिकार केवल अंग्रेजों को ही था| भारतियों को वोट देने का कोई अधिकार नहीं था|

गांधीजी ने ब्रिटिश उपनिवेश सचिव जोसफ चम्बेर्लें से इस कानून का दुवारा से अवलोकन करने की प्रार्थना की| हालांकि बिल में कोई परिवर्तन नहीं किया गया|

लेकिन अंग्रेजों के सामने भारतियों के द्वारा महसूस की जाने परेशानियों को सरकार के सामने लाने में कामयाब रहे|

1894 में गांधीजी ने “Natal Indian Congress” का गठन किया जिससे भारतीयों का एक मजबूत संगठन बना और भारतीय मूल के लोग राजनितिक रूप से मजबूत हुए|

1900 ईसवीं में “Boer war” के समय ब्रिटिश आर्मी की मदद के लिए गांधीजी ने “Natal Indian Ambulence Corps” का गठन किया|

इस संगठन में 1100 भारतीय हिन्दुओं को शामिल किया गया था|

गांधीजी द्वारा गठित इस संगठन ने अंग्रेजों को कई युद्धों जैसे “Boer War, Battle of Colenso, Battle of
Spion Kop etc में मेडिकल मदद दी|

इस संगठन का कार्य युद्ध क्षेत्र से घायल सेनिकों को उठाकर दूर मेडिकल कैंप तक लाना था| मेडिकल कैंप युद्ध क्षेत्र से काफी दूर होते थे|

घायलों को युद्ध क्षेत्र से स्ट्रेचर पर रखकर दूर मेडिकल केम्प तक लाना एक साहसिक कार्य था| गांधीजी और उनके 37 साथियों को इस योगदान के लिए “Queen’s South Africa Medal” से सम्मानित किया गया|

1906, में साउथ अफ्रीका के ट्रांसवाल इलाके में रहने वाले चीनी और भारतीय लोगों का अलग से रजिस्ट्रेशन कराने के लिए एक एक्ट बनाया गया, जिसका गांधीजी ने अपने लोगों के साथ विरोध किया|

यह वह पहला आन्दोलन था जब गांधीजी ने विरोध के लिए सत्याग्रह ( अहिंसा विरोध) का प्रयोग किया|

महात्मा गांधी जी का भारत आगमन

भारतीय राजनेता गोपाल कृष्णा गोखले ने “C.F. Andrews” के माध्यम से गांधीजी को सन्देश भिजवाया की आप भारत वापस आयें और भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन को एक नई दिशा दें|

1915 में गांधीजी भारत वापस आ गए, इस समय तक गांधीजी पूरे विश्व में एक सोशल वर्कर और नेता के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे|

गांधीजी ने इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हो गए और 1924 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किये गए|

1915 से लेकिन 1947 तक विभिन्न समाजिक आर्थिक और राजनितिक क्षेत्रों में गांधीजी ने काम किया आइये विस्तार से चर्चा करते हैं|

महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) द्वारा किये गए आन्दोलन

अप्रैल 1918 में गांधीजी को भारत के वाइसराय ने निमंत्रण दिया और प्रथम वर्ल्ड वॉर में गांधीजी से योगदान देने की प्रार्थना की|

गांधीजी ने युद्ध में अंग्रेजों की मदद करने का फेसला लिया और भारतीय लड़ाके फौज में भर्ती करवाए|

लेकिन युद्ध के बाद भी अंग्रेजों ने भारत की स्थिति सुधारने में कोई मदद नहीं की इससे गांधीजी बहुत निराश हुए|

इसके बाद गांधीजी ने यह निश्चय किया की जब तक भारत के जन जन तक आजादी की आवाज़ नहीं जाएगी और पूरा भारत एक आत्मा से आजादी की आवाज नहीं लगाएगा भारत को आजादी नहीं मिलेगी|

इसलिए गांधीजी ने सामाजिक मुद्दों को उठाने का विचार बनाया और धीरे धीरे आजादी की लहर पूरे भारत में फेल गई|

आइये चर्चा करते हैं कोन कोन से आन्दोलन का नेतृत्व गांधीजी ने किया|

चंपारण सत्याग्रह आन्दोलन

1917 में गांधीजी ने बिहार के किसानों की बिगडती आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए एक आन्दोलन चलाया जो पंचारण सत्याग्रहण के आन्दोलन के नाम से प्रसिद्द है|

बिहार के किसान उस समय अपने खेतों में नील (Indigo) उगाने के लिए बाध्य किया जा रहा था| इसके अलावा फसल को एक निश्चित कम कीमत में बेचने को मजबूर भी किया जा रहा था|

किसानों ने अहमदाबाद जाकर अपनी व्यथा गाँधी जी को बताई| गांधीजी ने चंपारण में एक अहिंसक विरोध इसके प्रति जताया और हजारों किसानों का समर्थन गांधीजी को इस आन्दोलन से मिला|

अंग्रेजों को गांधीजी के सामने झुकना पड़ा और किसानों की साड़ी मांगे मान ली गईं | यह प्रथम आन्दोलन से भारत की जनता में गांधीजी के प्रति विश्वास और मजबूत हो गया|

खेडा सत्याग्रह आन्दोलन

1918 में गुजरात के एक क्षेत्र खेडा में बाड़ और सूखे की वजह से किसानों की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो गई थी और किसान लगान (टैक्स) भरने में असमर्थ थे|

यहाँ भी गांधीजी ने किसानों की मदद करने का फेसला लिया और अपने समर्थकों की इकट्टा किया| इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए गांधीजी ने सिग्नेचर कैंपेन चलाया|

जिसमें असहयोग नीति को अपनाया गया और सभी किसानों से किसी भी प्रकार का टैक्स भरने के लिए मन किया गया चाहे उनकी जमीन की कुडकी क्यों न हो जाए|

अंत में अंग्रेजों को गांधीजी के आन्दोलन के सामने झुकना पड़ा और यह तय हुआ जब तक अकाल और सुखा ख़त्म नहीं हो जाता किसानों से किसी भी प्रकार का लगान नहीं लिया जाएगा|

इस आन्दोलन में बल्लभ भाई पटेल ने गांधीजी का तन मन धन से सहयोग किया|

खिलाफत आन्दोलन

प्रथम विश्व युद्ध में गांधीजी ने अग्रंजों की हर संभव मदद की और अंग्रेजों ने भी गांधीजी को विश्वास दिलाया था की युद्ध के बाद भारत को पूर्ण  स्वराज्य दे दिया जाएगा|

लेकिन ऐसा हुआ नहीं थोड़े बहुत सरकार के काम काज में सुधार किया गए इससे ज्यादा कुछ नहीं| 1919 के आस पास हिन्दू मुस्लिम दंगे भी अपनी चरम सीमा पर थे|

गांधीजी ने महसूस किया की यदि हमें अंग्रेजों से आज़ादी चाहिए तो मुस्लिम्स का समर्थन भी बहुत जरुरी है|

इसलिए ओटोमान सम्राज्य की हार के बाद मुस्लिम कालिफ (Turkish Caliph) के समर्थन में खिलाफत आन्दोलन की शुरुआत की और इसका समर्थन भी किया|

हम यहाँ आपको बता दें, Caliph सुन्नी मुस्लिम में एक सबसे बड़ा ओहदा है और हर एक देश के सुन्नी मुसलमान को Caliph के दिशा निर्देशों पर चलना होता था|

खिलाफत आन्दोलन से मुस्लिम्स का समर्थन भी गांधीजी को मिला| हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय का समर्थन मिलने से गांधीजी एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर कर सामने आये और राजनितिक गलियारों में इनका कद और बढ़ गया|

हालांकि, बहुत सारे हिन्दू नेता जैसे रविन्द्र नाथ टेगोर गांधीजी के इस रूक से खासा नाराज थे क्योंकि caliph के होने से मुस्लिम समुदाय और कट्टर और मजबूत हो जाता|

लेकिन 1922 तक खिलाफत आन्दोलन ख़त्म हो गया, तुर्की के अतातुर्क ने खलीफा (Caliphate) को ख़त्म कर दिया| धीरे धीरे मुस्लिम समर्थन भी गाँधी जी के प्रति कम हो गया|

असहयोग आन्दोलन

गांधीजी के लगातार किये जा रहे आंदोलनों से निपटने के लिए अंग्रेजों ने Rowlatt Act बनाया, जिसके तहत शांतिपूर्ण रूप से आन्दोलन करने वालों पर भी अपराधिक मुक़दमा चलाया जा सकता था|

इसके खिलाफ जगह जगह पर लोग शांतिपूर्ण सत्याग्रह आन्दोलन कर रहे थे और अंग्रेज क्रूरता से इन आंदोलनों का दमन|

ऐसा ही अमृतसर जलियावाला बाग में किया गया जहाँ जनरल डायर ने शांतिपूर्ण रूप से इकट्ठे हुए सिखों और हिन्दुओं पर गोलियां चला दी जिसमे सेकड़ों लोग मारे गए|

अब तक गाँधी जी को समझ आ गया था| ब्रिटिश राज में भारतीय सुरक्षित नहीं रह सकते थे| इसलिए अब गांधीजी भी पूर्ण स्वराज की वकालत करने लगे|

1921 में गांधीजी के मार्गदर्शन में ही कांग्रेस कार्य कर रही थी और खालिफात आन्दोलन का समर्थन करने से मुस्लिम भी गाँधी जी के समर्थन में थे|

अब गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन को तेज करने का आह्वान किया और अंग्रेजों के द्वारा बनाई गई वस्तुओं, सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार करने को भारत की जनता को प्रेरित किया||

गांधीजी का मानना था की भारत की जनता के सहयोग से ही अंग्रेज यहाँ राज कर पा रहे है, यह बात गांधीजी ने 1909 में अपनी किताब हिन्द स्वराज में भी लिखी थी|

पूरे भारत में असहयोग आन्दोलन आग की तरह फेल गया| जगह जगह अंग्रेजी कपड़ों और समान को आग के हवाले कर दिया गया|

बहुत से लोगों ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और शिक्षण संस्थाओं से अपने बच्चों को निकाल लिया|

लेकिन 4 फरबरी 1922 को उत्तर प्रदेश में हुए चौरा चौरी काण्ड के बाद 12 फरबरी 1922 को कांग्रेस ने इस आन्दोलन को ख़त्म करने का एलान कर दिया था क्योंकि अब आन्दोलन अहिंसक न रहकर हिंसक हो गया था|

गांधीजी को 10 मार्च 1922 को गिरिफ्तार करके 6 साल के लिए जेल भेज दिया गया|

गांधीजी के जेल जाने के बाद असहयोग आन्दोलन कमजोर पड़ गया| इसके अलावा खिलाफत आन्दोलन भी ख़त्म हो गया था और मुस्लिमों का सपोर्ट भी गांधीजी की तरफ ख़तम हो गया|

मुसलमानों ने अपनी अलग मुस्लिम लीग पार्टी बना ली और इसके अलावा कांग्रेस भी दो भागों में विभाजित हो गई थी|

नमक सत्याग्रह आन्दोलन

गांधीजी को 2 साल के बाद ही जेल से छोड़ दिया गया| दिसंबर 1928 में गांधीजी ने कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रस्ताव किया और अंग्रेजी हुकूमत को धमकाया, या तो भारत को पूर्ण स्वराज दें नहीं तो असहयोग आन्दोलन को हम आगे पूरे भारत में और तेज करेंगे|

हम आपको बता दें गांधीजी के सभी आंदोलनों का आधार सत्याग्रह (अहिंसा) और असहयोग (Non-coperation) था|
इसे सविनय अवज्ञा आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है|

इसका विस्तार से वर्णन हमने इस आर्टिकल में किया है सविनय अवज्ञा आन्दोलन क्या था और इसके कारण

31 दिसंबर 1929 को कांग्रेस से लाहौर में पहली बारे भारत का झंडा फेहराया| 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस ने गांधीजी के नेतृत्व में लाहौर में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया|

यह वह समय था जब भारत में सरकार के अलावा कोई भी अन्य नमक नहीं बना सकता था| यह गेर कानूनी था और बनाने पर भरी टैक्स चुकाना पड़ता था|

गांधीजी ने नमक टैक्स के खिलाफ सत्याग्रह आन्दोलन प्रारंभ किया और अपने 78 साथियों के साथ अहमदाबाद से दांडी यात्रा पैदल प्रारम्भ की|

यह यात्रा करीब 388 किलोमीटर की थी और इसे पूरा करने में 25 दिन लगे| गांधीजी ने 5 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर नमक बनाया और अंग्रेजों के कानून को तोडा|

इस यात्रा में गांधीजी को हर शहर और गाँव से लाखों लोगों ने ज्वाइन किया| यहाँ नमक बनाने के बाद गांधीजी दक्षिण भारत की तरफ चल दिए|

गांधीजी का उद्देश्य दक्षिण के तटों पर नमक बनाना था| इन्होने कई जगह पर रूक रूक कर भाषण दिए|

4-5 मई आधी रात को गांधीजी को गिरिफ्तार कर लिया गया| इस आन्दोलन में करीब 80,000 लोगों को जेल में डाला गया| यह आन्दोलन करीब 1 साल तक चला|

गाँधी – इरविन संधि

असहयोग आन्दोलन की वजह से अंग्रेजी सरकार को बहुत नुक्सान हो रहा था| सरकार अब गांधीजी से समझोता करने के लिए तैयार हो गई|
मार्च 1931 में गांधीजी और सरकार की तरफ से लार्ड इरविन के बीच में समझोता हुआ|

फर्स्ट राउंड टेबल

इस समझोते के अंतर्गत सभी आन्दोलनकारियों को जेल से छोड़ा गया| इसी समझोते के अंतर्गत गांधीजी को फर्स्ट राउंड टेबल में लन्दन बात करने के लिए बुलाया गया| लेकिन भारत के स्वराज्य पर कोई बात नहीं हो पाई|

सेकंड राउंड टेबल

1931-32 के बीच में सेकंड राउंड टेबल में भी गांधीजी और अंग्रेजों के बीच में बात चीत शुरू हुई| लेकिन अंग्रेजों ने भारत की स्वतंत्रता पर बात करने के वजाए भारत को धर्म के आधार पर लोगों को अलग अधिकार देने की बात की|

मुस्लिम, सिख और हिन्दू क्षेत्रों के लिए अलग अलग क़ानून बनाने पर अंग्रेजों ने जोर दिया और पूर्ण स्वतंत्रता के स्थान पर ऑटोनोमी देने की बात की|

सेकंड राउंड टेबल से वापस आने पर गांधीजी को हिरासत में ले लिया गया और यरवाडा जेल पुणे में डाल दिया गया|

जब गाँधी जी जेल में बंद थे, अंग्रेजों ने हरिजनों के लिए अलग से क़ानून बनाया जिसमें इनके लिए अलग से चुनाव रखने का प्रस्ताव था|

गांधीजी ने इस कानून के खिलाफ जेल में ही आमरण अनशन शुरू कर दिया| गांधीजी की बिगडती तबियत देखकर जन जन आक्रोश में भर गया और पूरा भारत में आन्दोलन होने लगे|

इससे घबराकर अंग्रेजों ने यह कानून वापस ले लिया और कांग्रेस और सरकार के बीच पूना एक्ट पर हस्ताक्षर हुए|

द्वितीय विश्व युद्ध

दुसरे विश्व युद्ध में गांधीजी ने भारत की जनता से अंग्रेजों की किसी भी प्रकार की मदद न करने का आह्वान किया लेकिन गांधीजी का यह आन्दोलन फेल हो गया, और भरी संख्या में भारतियों ने सेना में भारती होकर अंग्रेजों का साथ दिया|

द्वितीय विश्व युद्ध और भारत छोडो आन्दोलन

द्वितीय विश्व युद्ध के समय गांधीजी ने अंग्रेजों की किसी भी प्रकार की मदद न करने का देश की जनता से आवाहन किया| लेकिन गांधीजी के विरोध के बावजूद भरी मात्रा में लोग ब्रिटिश आर्मी में शामिल हो गए|

गांधीजी का मत था अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध के समय भी अपने वादों से मुकर गए और अब पुनः गांधीजी अंग्रेजों की मदद नहीं करना चाहते थे|

1942 में मुंबई के अन्दर गांधीजी ने एक भाषण दिया जिसके माध्यम से भारत छोडो आन्दोलन की शुरुआत की और भारत की जनता से अंग्रेजों के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग न करने का आग्रह किया|

लेकिन एक घंटे के बाद ही गांधीजी को हिरासत में ले लिया गया|

गांधीजी की गिरफ्तारी से पूरे देश में जन आक्रोश चरम सीमा पर था और लोगों ने रेलवे स्टेशन, पुलिस स्टेशन में आग लगा दी और टेलीग्राफ के तारों को काट दिया|

गांधीजी को आगा खान पैलेस में 2 साल तक जेल में रखा गया| इसी बीच गांधीजी के सेक्रेटरी महादेव देसाई और का ह्रदय घात से निधन हो गया और 18 महीने के बाद 22 फरबरी 1944 को पत्नी कस्तूरबा गाँधी का निधन हो गया|

इसी बीच गांधीजी को भी मलेरिया हो गया और ज्यादा तबियत खराब होने से अंग्रेजों ने 6 मई 1944 को गांधीजी को रिहा कर दिया|

गांधीजी और मुस्लिम लीग

गांधीजी की अनुपस्थिति में जिन्हा के नेतृत्व में मुस्लिम लीग बहुत मजबूत हो चुकी थी| और पूरे भारत के मुसलामानों का एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के लिए मांग और समर्थन तेज हो चूका था|

गांधीजी ने जिन्हा के साथ करी मुलाकातों के दौर में काफी समझाने बुझाने की कोशिश की जिसमें एक सब धर्म समभाव की भावना के आधार पर एक सयुंक्त भारत बनाने की मांग की| लेकिन जिन्हा नहीं माने|

एक तरफ गांधीजी संगठित भारत की आज़ादी चाहते थे और इनका नारा था “British to Quit India, और वहीँ जिन्हा
आज़ादी तो चाहते थे लेकिन नारा था “Divide and Quit India”.

जिन्हा ने गांधीजी का कोई सुझाव नहीं माना और एक अलग मुस्लिम देश की मांग पर अड़े रहे|

बंगाल हिन्दू हत्या काण्ड

16 अगस्त 1946 को जिन्हा ने एक अलग मुस्लिम देश के लिए भारत के सभी मुस्लिमों से एक होकर मांग करने की अपील की और “Direct Action Day” के नाम से आन्दोलन चलाया|

इसी बीच बंगाल के मुख्यमंत्री हुसेन शहीद सुहरावर्दी ने ‘Direct Action day’ को सेलिब्रेट करने के लिए पुलिस महकमे को एक विशेष एक दिन की छुट्टी दे दी|

मौका पाकर मुस्लिम आक्रान्ताओं ने बंगाल में हिन्दुओं को मारना शुरू कर दिया, लाखों की संख्या में हिन्दुओं की हत्या कर दी गई और उनकी प्रॉपर्टी भी तबाह कर दी गई|

लेकिन ब्रिटिश गवर्नमेंट ने अपनी सेना बंगाल नहीं भेजी दंगों को रोकने के लिए|

भारत की आज़ादी और विभाजन

अंग्रेज अब समझ गए थे की हिन्दू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते हैं इन दोनों के सांस्कृतिक और रहन सहन में बहुत अंतर है|

इसके अलावा भी हर रोज हो रहे दंगों से भी दोनों धर्मों के बीच में नफरत और तनाब बढ़ता ही जा रहा था|

आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत को आज़ादी मिली| पाकिस्तान स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को मनाता है|

गांधीजी की हत्या

30 जनवरी 1948 शाम 5:17 मिनट पर अपनी दो भतीजी के साथ दिल्ली बिरला हाउस में शाम की प्रार्थना के लिए जा रहे थे| उसी समय नाथूराम गोडसे ने तीन गोलियां मारकर गांधीजी की हत्या कर दी|

क्योंकि गोडसे ने गांधीजी की हत्या गोडसे का मत था गांधीजी मुस्लिम के प्रति कुछ ज्यादा ही रक्षात्मक रवैया अपना रहे थे|

यदि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हो रहा था, तब भी इन्होने करोड़ों मुसलामानों को भारत में हो रहने की अनुमति दे दी और सरकार के द्वारा उन्हें सुरक्षा भी प्रदान की|

लेकिन पकिस्तान में 50% से ऊपर हिन्दुओं के लिए किसी भी प्रकार की सुरक्षा न प्रदान की और न ही पाकिस्तान की सरकार से आग्रह किया|

इसके अलावा गांधीजी के सत्याग्रह (अहिंसा) के आन्दोलन से हिन्दू मानसिक रूप से कमजोर हो गया था अब हिन्दू अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का उचित प्रतिकार नहीं कर पा रहा था|

गोडसे का मत था पागल कुत्ते और हाथी के सामने आप अहिंसा की बातें नहीं कर सकते|

गांधीजी पाकिस्तान को भारत की सरकार से करीब कई करोड़ रूपए की मदद देने का आग्रह कर रहे थे इससे भी गोडसे नाराज़ थे|

इनका मत था जिस धर्म के लोगों ने हज़ारों लाखों हिन्दुओं को सिर्फ धर्म के आधार पर मार दिया गांधीजी कैसे उनकी मदद कर रहे हैं|

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