16 Sanskar (सोलह संस्कार) | हिन्दू धर्म के 16 संस्कार | Hinduism 16 Samskaras

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दोस्तो, हिन्दू धर्म, विश्व में सबसे पुराना धर्म है, और पूरी तरीके से वैज्ञानिक आधार पर भी खरा उतरता है| जहाँ सौर मंडल की जानकारी नासा हमें 19वी शताव्दी में दे पाया, वहीँ इसकी जानकारी हमें कई हजारों सालों से ज्ञात है|

हिन्दू धर्म का पंचांग एक सटीक खगोलीय पिंडों की गति और प्रकर्ति के आधार पर बना हुआ है|

जहाँ कब सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण लगेगा और कब कहाँ कोनसे गृह की दशा दिशा होगी सब कुछ बहुत पहले से हमें ज्ञात है|

लेकिन आज कल भारत में लोग अपनी ही संस्कृति पर सवाल उठाने लगे हैं| खेर अच्छाई और बुराई साथ साथ चलती रहती है|

आज हम बात कर रहे हैं, हिन्दू धर्म में वैदिक काल से प्रेक्टिस किये जा रहे 16 संस्कारों की |

महर्षि वेद व्यास के अनुसार हिन्दू समाज में पैदा होने से लेकर म्रत्यु तक 16 संस्कारों (16 Sanskar) की बात कही गई है|

यह 16 संस्कार (16 Sanskar) गृहस्थ जीवन बिताने वाले हिन्दू जातक को जरुर करने चाहिए|

लेकिन जैसे जैसे समय बदला है, और जिस तरीके से अब तक की सरकारों ने आधुनिकता के नाम पर हिन्दू समाज की आने वाली पीडी को अपने संस्कारों से विमुख रखा|

शायद ही हिन्दू समाज की भावी पीडी अपने संस्कारों को जीवित रख पाएगी|

खेर यहाँ हमारी एक छोटी सी कोशिश है, शायद आपने कहीं से सुना होगा 16 संस्कारों (16 Sanskar) के बारे में तो आप यहाँ कुछ जानने के लिए आये हैं|

आशा करेंगे आपको हमारे द्वारा दी गई इन 16 संस्कारों की जानकारी पसंद आएगी|

आइये दोस्तो, आगे ज्यादा समय बर्वाद ना करके, चर्चा करते हैं|

हिन्दू धर्म के पवित्र सोलह संस्कार (16 Sanskar )

1. गर्भाधान संस्कार:-

महर्षि चरक के अनुसार गर्भ धारण की प्रक्रिया के समय स्त्री और पुरुष दोनों का ही शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहना आवश्यक है| पति और पत्नी का गर्भ धारण के लिए शारीरिक सम्बन्ध बनाना ही गर्भाधान संस्कार कहलाता है|

यहाँ गर्भ (बीज) + धारण (स्थापना) = बीज की स्थापना करना ही गर्भ धारण कहलाता है|

माता पिता के रज और वीर्य के मिलन से ही संतान उत्पति होती है| ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस पूरे ब्रह्माण्ड और इसके अंगों की गति संसार की हर एक वस्तु के जीवन काल को प्रभावित करती है|

गर्भाधान संस्कार के अनुसार एक निश्चित तिथि और गृह नक्षत्र के अनुसार ही गर्भाधान करना चाहिए| जिससे एक तेजस्वी और मेधावी बालक की प्राप्ति हो सके|

गर्भाधान की प्रक्रिया:-

चरक सहिंता के शारीर शास्त्र के अनुसार शात्री की उम्र सोलह साल से ज्यादा होनी चाहिए और 36 बार रजस्वला से शुद्ध होनी चाहिए| कहने का मतलब है, स्त्री को 36 बार पीरियड आ गए हों|

पुरुष की आयु स्त्री की आयु से करीब 2 से 3 साल ज्यादा होनी चाहिए|

चरक संहिता के अनुसार विवाह के चौथे दिन गर्भधारण का महत्व बताया गया है| लेकिन यदि स्त्री रजस्वला (पीरियड) में हो तो यह मुमकिन नहीं हो पाता है|

इसलिए कोई और उचित दिन का ही चयन उत्तम है|

चरक संहिता के अनुसार स्त्री के पीरियड के बाद जो स्नान होता है, जिसे ऋतू स्नान भी कहते हैं| इस स्नान के बाद के 16 दिन गर्भाधान के लिए बताये गए हैं|

लेकिन इसमें प्रथम 4 दिन दोष युक्त हैं, इनमें गर्भाधान वर्जित हैं, इनके अलावा 11वा और 13वा दिन भी अशुभ माना जाता है|

बाकि के बच्चे हुए 10 दिन शुभ माने जाते हैं| लेकिन यदि इन 10 दिनों में अमावस्या और पूर्णिमा की तिथि आ रही हों, तो भी उस दिन को गर्भधारण के लिए अनुचित ही मानें|

यदि पुत्र प्राप्ति के लिए गर्भाधान कर रहे हैं तो 4,6,8,10,12 वां दिन शुभ माना जाता है|

और यदि पुत्री प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे हैं तो 5,7,9 वां दिन शुभ माना गया है|

गर्भधारण यदि कृष्ण पक्ष में होता है तो पुत्र होने की सम्भावना रहती है और शुक्ल पक्ष में आप प्रेगनेंसी हुई है तो पुत्री होने के बारे चरक संहिता शरीर शास्त्र में बताया गया है|

गर्भधारण के लिए 3 दिन पहले ही दिन निश्चित कर लें| इन 3 दिनों में ब्रह्म चर्य का पालन करें और विचारों को शुद्ध रखें|

गर्भधारण वाले दिन शाम को भली भाँती स्नान करें और शुद्ध कपडे पहनें|

सैया (बेड) पर पहले पति दायें पैर से चढ़े और पत्नी पति के दायीं तरफ से बायें पैर से सैया पर चढ़े|

इसके बाद संसर्ग (काम क्रीडा) करने से पहले निचे दिया हुआ मन्त्र आपने पितृ और इष्ट देवता को ध्यान में रखकर बोलें|

“अहीरसि आयुरसि सर्वत: प्रतिष्ठासि धाता,
त्वां दधातु विधाता, त्वां दधातु ब्रह्मावर्चसा भवेति|
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोम सूर्यस्तथाऽश्विनौ।
भगोऽथ मित्रावरूणौ वीरं ददतु मे सुतम्।।

अर्थार्थ:- हे गर्भ आप सूर्य के समान हो, तुम मेरी आयु हो तुम ही मेरी प्रतिष्ठा हो, आपकी रक्षा खुद ब्रह्मा कर रहे हैं, हे प्रभु, ब्रह्मा, सूर्य, विष्णु, ब्रहस्पति, अश्वनी कुमार, सौम, मित्रा वरुण आप सब लोग मुझे मेधावी और वीर पुत्र प्रदान करने की कृपा करें|

2. पुंसवन संस्कार:-

पुंसवन संस्कार, गर्भ धारण के 3 माह के पश्चात किया जात है, मेडिकल साइंस के अनुसार 3 महीने के बाद शिशु का मस्तिष्क विकसित होने लग जाता है|

ऐसा माना जाता है, बच्चा गर्भ में ही बाहर हो रही गतिविधियों को सुनकर सीखने लग जाता है| पुंसवन संस्कार के माध्यम से शिशु के संस्कारों की नीव रखी जाती है|

इस संस्कार में स्त्री एक विशेष औषधि नाक से सूंघने के लिए दी जाती है| कुछ और भी विधि विधान हैं|

जानने के लिए यह आर्टिकल पढ़ लें:- पुंसवन संस्कार विधि

3. सीमन्तोन्नयन संस्कार :-

यह संकार गर्भ के चोथे, छठे और आठवे महीने में किया जात है| इस समय बच्चा समझदार हो जात है| इस समय माता को अपने अचार विचार में शुद्धता रखनी चाहिए| और प्रेरणादायक इतिहास पढना चाहिए|

इस संकार की विधि जानने के लिए यह आर्टिकल पढ़ लें:- सीमन्तोन्नयन संस्कार विधि

4. जातकर्म संस्कार :-

बालक का जन्म होने के तुरंत बाद इस संस्कार को किया जाता है, इससे बालक के कई प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं| इस संस्कार में बच्चे को शहद और घी चटाया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु रहे|

5. नामकरण संस्कार :-

शिशु के जन्म के 11वे दिन नामकरण संस्कार किया जाता है| इस संस्कार में जातक ब्राहमण को बुलाकर घर में हवन और पूजा कराता है|

पंडितजी शिशु के जन्म तिथि और जन्म समय के अनुसार बच्चे का नामकरण करते हैं|

6. निष्क्रमण संस्कार:-

यह संस्कार शिशु के जन्म के चोथे महीने में किया जाता है| चोथे महीने से बच्चे को बाहर ले जाना उचित माना जाता है|

हमारा शरीर पञ्च तत्वों से बना हुआ है, इसलिए माता पिता देवताओं से बच्चे के सुद्रण और पुष्ट शरीर की कामना करते हैं|

7. अन्नप्राशन संस्कार:-

यह संस्कार बच्चे के जन्म के 7 महीने के बाद दांत निकलने के बाद होता है, इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है|

8. मुंडन संस्कार:-

जब शिशु के 1 वर्ष के होने के बाद मुंडन संस्कार किया जाता है, यदि किसी कारणवश 1 साल के बाद मुंडन नहीं हो पाता है|

इस संस्कार को चूड़ाकर्म संस्कार भी कहा जाता है|

तो यह संस्कार तीन वर्ष, पांचवे वर्ष और सांतवे वर्ष में हो सकता है| मुंडन की प्रक्रिया में बच्चे के देव स्थान पर सर के बाल उतारे जाते हैं| इससे सर मजबूत और दिमाग तेज होता है|

9. कर्णभेद संस्कार:-

कर्णभेद संस्कार में शिशु के कानों को छेदा जाता है, चरक संहिता के अनुसार कान छिद्रण से सुनाने की शक्ति बढती है, इसके मस्तिष्क में खून का संचार सुगम हो जाता है और स्मरण शक्ति भी बढती है|

10. विद्याआरंभ संस्कार:-

यह संस्कार तब किया जाता है जब शिशु सिक्षा योग्य हो जाता है, इस संकार में शिशु के अच्छे भविष्य की कामना की जाती है|

11. यज्ञोपवीत संस्कार:-

यज्ञोपवीत संस्कार प्रत्येक हिन्दू को कराना चाहिए| इस संस्कार को उपनयन और जनेऊ संस्कार भी कहते हैं| उप का अर्थ है पास और नयन का अर्थ है ले जाना| अर्थार्थ, गुरु के पास ले जाना|

अंग्रेजी में इस संस्कार को thread ceremany भी बोलते हैं

इस संस्कार में यज्ञ और हवन और पूजा की जाती है और जातक को तीन सूत्र का धागा होता है| यह तीनों धागे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं|

इस संस्कार से शिशु को बल, उर्जा और तेज मिलता है इसके अलावा अध्यात्मिक और धार्मिक प्रवर्ती का संचार होता है|

12. वेदारम्भ संस्कार:-

इसके अंतर्गत शिशु को वेदों का ज्ञान प्रारंभ किया जाता है|

13. केशांत संस्कार:-

केशांत संस्कार के अंतर्गत सिक्षा प्रारंभ करने से पहले सर के बाल काटे जाते हैं यानि मुंडन किया जाता है| हिन्दू धर्म के अनुसार मुंडन से शुद्धिकरण होता है|

इसके अलावा मस्तिष्क भी सही दिशा में और एकाग्र हो जाता है|

14. समावर्तन संस्कार:-

समावर्तन संस्कार शिशु की सिक्षा पूर्ण होने के बाद वापस गुरुकुल से घर आने पर होता है| यह संस्कार इसलिए किया जाता है क्योंकि अब शिशु ब्रह्मचर्य आश्रम से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है|

इस संस्कार के माध्यम से इश्वर से प्रार्थना की जाती है की संतान, इस संसार के उत्तर चढाव और कठनाइयों का साहस से सामना कर सके|

15. विवाह संस्कार:-

विवाह संस्कार से तो आप सब लोग परिचित हैं ही, इस संस्कार में स्त्री और पुरुष को एक उचित उम्र में विवाह के बंधन में बाँधा जाता है|

विवाह का प्रमुख कारण स्रष्टि के विकास में प्रमुख योगदान है| यह एक ऐसा संस्कार है, जिससे मनुष्य अपने पितृ ऋण से मुक्त होता है|

16. अंत्येष्ठी संस्कार:-

16 संस्कारों (16 Sanskar) में यह अंतिम संस्कार है

जब मनुष्य की म्रत्यु हो जाती है, तो इसका अंतिम संस्कार किया जाता है, इसी संकार को अंत्येष्टि संस्कार कहते हैं| इस संस्कार को अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है|

हिन्दू धर्म के अनुसार म्रत्यु के बाद पार्थिव शरीर को अग्नि के हवाले कर दिया जाता है| मान्यता है, अग्नि स्नान से मनुष्य की इस जन्म में अशक्ति समाप्ति हो जाती है और उसके सगे सम्बन्धियों की भी आसक्ति समाप्ति हो जाती है|

मनुष्य आगे अपनी दूसरी यात्रा पर निकल पड़ता है|

यह प्रक्रिया भी एक निश्चित वैदिक विधि से ही पूरी की जाती है|

दोस्तो 16 sanskar आपको जरुर अपने परिवार में सम्पन्न करने चाहिए, यही हमारा धर्म है|

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