Gangaur Story in Hindi – राजस्थान में प्रचलित हैं गणगौर के अपहरण की लोक कथाएँ

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Gangaur Story in Hindi

Gangaur Story in Hindi | गणगौर त्यौहार की लोक कथाएँ | राजस्थान के राजा महाराजा दुसरे राज्यों की गणगौर को करते थे अपहरण माना जाता था वीरता की निशानी जाने रोचक इतिहास

राजस्थान में गणगौर का त्यौहार एक प्रमुख त्यौहार है| यह त्यौहार राजस्थान में हमेशा से ही सेलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है|

होली के बाद शुरू होने वाले 18 दिन के महापर्व को देखने, लाखों की संख्यां में देश विदेश से लोग यहाँ आते हैं| राजस्थान के परिधान, खान पान, मेले रेले इस त्यौहार की शान हैं|

दोस्तो, गणगौर क्यों मनाया जाता है और इसका इतिहास क्या है| कहना का आशय यह है सभी त्योहारों का एक ऐतिहासिक महत्त्व तो होता ही है|

ऐसे ही गणगौर के त्यौहार से भी कई लोक कथाएँ जुडी हुई हैं| इन्ही गणगौर की लोक कथाओं (Gangaur Story in Hindi) पर आधारित लोक गीत गणगौर के दिन भी गाये जाते हैं|

सच कहा है राजस्थान का इतिहास जितना पुराना है उतना ही रोमांच से भी भरा हुआ है| शायद आपको यकीन न हो, पुराने समय में राजे रजवाड़े दुसरे राज्य की गणगौर की प्रतिमा का अपहरण करके लाते थे|

इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात यह है, की राजपूतों में गणगौर का अपहरण करना वीरता की निशानी माना जाता था|

आज हम ऐसे ही कुछ किस्से कहानियां आपके साथ साझा करेंगे, बस बने रहिये हमारे साथ|

Gangaur Story in Hindi

गणगौर त्यौहार से जुडी कुछ रोचक लोक कथाएँ

आइये जानते हैं गणगौर से जुडी राजस्थान में प्रचलित (Gangaur Story in Hindi) किस्से कहानियां और लोक कथाएँ

ईसर सिंह और गबरी की लोक कथा

गणगौर त्यौहार की लोक कथाएँ

उदयपुर राज घराने से सम्बन्ध रखने वाले विरमदास जी की एक बहुत ही सुन्दर पुत्री थी नाम था गबरी (गणगौर). गाब्रि का रिश्ता बूंदी के ईसर सिंह से तय हो गया था|

गबरी के सुन्दरता के चर्चे और भी राज घरानों में थे| इस रिश्ते से यह सभी राजघराने खुश नहीं थे और इन सभी में इर्ष्या का भाव आ गया था|

ऐसा कहा जाता था, गवरी का अपहरण करने की भी योजनायें मनाई जाने लगी| जब इस तरह की खबरें, ईसर सिंह को जैसे ही पता चली|

ईसर सिंह अपनी पत्नी को लेने के लिए उदयपुर के लिए निकल गए| वहां घोड़े पर गबरी को बिठाया और बूंदी की और निकल पड़े|

लेकिन लोटते समय बहुत तेज बारिश होने लगी और चम्बल नदी में पानी का स्तर बढ़ गया और नदी उफान मारने लगी| लेकिन ईसर सिंह ने इसकी परवाह नहीं की और घोडा नदी में उत्तर दिया|

लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था| घोडा पानी के बहाव के आगे टिक नहीं पाया और ईसर सिंह और गवरी पानी ने डूब गए|

ऐसा माना जाता है, इन्ही दोनों की प्रेम के अमर कहानी के आधार पर ही गणगौर मनाया जाता है, जहाँ विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत और पूजा पाठ करती हैं|

जावद की गणगौर की अपहरण की लोक कथा

राजस्थान में देवगढ के पास एक गाँव, नाम है बर्जल| इस गाँव में रावत बहुतायत में रहते हैं| एक बार जाला रावत के भाई की पत्नी ने उपहास करते हुए जाला रावत से कहा, यदि कोई जावद की गणगौर का अपहरण करके लाये तो उसे बहादुर माने, नहीं तो मिटटी के शेर तो घड़ें घुमे से|

इसे सुन जाला, जावद पहुंचे और गणगौर की सवारी निकल रही थी| जावद सबके सामने से गणगौर का अपहरण कर बर्जल ले आये|

गाँव में उनका जोरदार स्वागत हुआ और उनकी बहादुरी के चर्चे होने लगे| इसके बाद ऐसी कहावत बन गई ‘कोई जावद की गणगौर लेके आवे तो वीर माने’|

बाद में जाला जी ने गणगौर को देवगढ ठिकाना के दरवार को सौंप दिया|

कोटा की गणगौर का अपहरण और गोगुंडा के गणगौर मेले का सम्बन्ध

Gogunda mela

एक बार की बात है उदयपुर के महाराणा स्वरुप सिंह के सामने किसी ने कोटा की गणगौर की बहुत तारीफ़ की| स्वरुप सिंह अब कोटा की गणगौर को पाना चाहते थे|

ने पूरे राज्य में घोषणा की जो भी कोटा की गणगौर को लाएगा उसे उचित इनाम दिया जाएगा| यह सुनकर गोगुंडा के लाल सिंह ने यह चुनोती स्वीकार की और राणा की आज्ञा से कोटा की और चल पड़े|

कोटा पहुंचकर लाल सिंह ने पूरे कोटा में यह खबर फेला दी की वह नाचते हुए घोड़े पर गणगौर के साथ सवारी कर सकता है|

यह सुनकर वहां के राणा ने लाल सिंह को महल बुलाया और अपना करतव दिखाने के लिए कहा|

लाल सिंह ने कोटा की गणगौर को अपने घोड़े पर बिठाया और धीरे धीरे चलने लगे | लेकिन कुछ देर के बाद घोड़े को तेजी से भगा कर कोटा से उदयपुर आ गए|

कोटा के सेनिकों ने पीछा किया लेकिन लाल सिंह को पकड़ नहीं पाए| उदयपुर पहुँच कर गणगौर को स्वरुप सिंह के सामने पेश किया|

राणा लाल सिंह की बहादुरी देख बहुत प्रसन्न हुए और गणगौर उन्हें ही रखने के लिए बोला और इनाम भी दिया| यही गणगौर गोगुंडा के गणगौर मेले की मुख्या आकर्षण होती है|

यह मेला रात में आयोजित किया जाता है इस मेले में आस पास के हज़ारों लोग आते हैं और उत्सव में भाग लेते हैं|

बिना सर वाली गणगौर की लोक कथा

बेदला ठिकाना के मनोहर सिंह के पास बिना सर की गणगौर है| इस गणगौर के सर न होने के बारे में मनोहर सिंह जी बताते हैं एक लड़ाई में इसका सर कट गया था|

कई पीड़ियों से इस गणगौर की पूजा की जाती रही है| यह गणगौर करीब 300-400 साल पुरानी है|

गणगौर वाले दिन हीरे जवाहरातों और परम्परिक पोशाकों से इसे इस तरह से सजाया जाता है की पता ही नहीं लगता की गणगौर का सर नहीं है|

बीकानेर की गणगौर

एक बार जैसलमेर के महारावल के हुक्म पर भाटी मेहजल और इसके साथियों ने बीकानेर की गणगौर को तलवार की नोक पर अपहरण कर लिया था|

बाद में बिटवर खांगिर सिंह के बेटे लखन सिंह ने मेह्जल को मार दिया| इससे खुश होकर बीकानेर के महाराजा करणसिंह ने चुरू राज्य के रतनगढ़ तहसील के एक गाँव लोहा को लखन सिंह तो उपहार स्वरुप दे दिया|

लखन सिंह के बहादुरी के किस्से लोक गीतों में अब भी सुनाये जाते हैं|

मेर्ता शहर की गणगौर जिसकी सुरक्षा करते है बन्दूकधारी

एक बार की बात है रामसिंह खंगरोत मेर्ता शहर की गणगौर को अपहरण करके ले गया था| राम सिंह सीकर ठिकाना का फौजदार था|

मेर्ता शहर के गाँव में आज भी गणगौर की बंदूकों, भालों और लाठी से रक्षा की जाती है|

‘आगे आगे गिन्दोली, पाछे जगमाल कँवर लोग गीत के पीछे यह है ऐतिहासिक लोक कथा

एक बार की बात है, पाटन का सूबेदार हाथीखान लड़कियों को अपहरण करके ले गया था| यह सब उस समय तीज की पूजा कर रही थी|

हाथीखान ने इस सभी को अहमदाबाद के बादशाह को तोहफे में दे दिया| जगमाल उस समय गाँव में नहीं थे| जब वह वापस आये तो इस घटना को सुनकर बहुत क्रोधित हुए और बदला लेने का प्रण लिया|

जगमाल ने यह प्राण लिया की वह जब तक बदला नहीं ले लेते दाड़ी नहीं बनायेंगे, साफ कपडे नहीं पहनेंगे और न ही पगड़ी पहनेंगे|

एक बाद गणगौर देखने के लिए बादशाह महमूद की बेटी गिन्दोली आई| जगमाल के प्रधान भोपजी हूल ने गिन्दोली को आपने साथियों की मदद से अपहरण कर लिया और जगमाल के पास ले आये|

जगमाल बहुत प्रसन्न हुए और गिदोली को गणगौर की झांकी में आगे आगे चलाया और उसके पीछे खुद चलने लगे|

इसी घटना से एक लोक गीत का सर्जन हुआ ‘आगे आगे गिन्दोली, पाछे जगमाल कँवर’

साधुवाद:-

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