Ganga Dussehra in Hindi (2019) | गंगा दशहरा क्यों मनाया जाता है, महत्व, कथा, स्नान शुभ मुहूर्त

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Ganga dussehra in hindi, गंगा दशहरा का महत्त्व

Why Ganga Dussehra Parv is celebrated Importance in Hindi | क्यों मनाया जाता है गंगा दशहरा पर्व कथा महत्व स्नान शुभ मुहूर्त इतिहास

गंगा दशहरा पर्व भारत का एक प्रमुख त्यौहार है और ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की दसवीं को पूरे भारत में धूम धाम से मनाया जाता है|

आज यहाँ हम विस्तार से चर्चा करेंगे, गंगा दशहरा क्यों मनाया जाता है, गंगा दशहरा का 2019 में शुभ मुहुर्त क्या है, गंगा दशहरा पर गंगा पूजन कैसे करें और गंगा दशहरा की कथा और इस पर्व के महत्त्व की भी चर्चा करेंगे|

Why Ganga Dussehra is Celebrated in Hindi

गंगा दशहरा क्यों मनाया जाता है

Particular Detail
नाम गंगा दशहरा
धर्म हिन्दू
प्रकार हिन्दू पर्व
महत्त्व गंगा नदी का स्वर्ग से धरती पर अवतरण
कैसे मनाते हैं देवी गंगा की पूजा, और गंगा नदी में स्नान
हिन्दू तारीख ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी
अंग्रेजी तारीख 12 जून 2019
कब कब मनाया जाता है हर साल

 

गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) पर्व को गंगा अवतरण भी कहा जाता है, हिन्दू मान्यताओं और पोराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन गंगा स्वर्ग से उतरकर धरती पर आई थी|

गंगा दशहरा भारत के कुछ अहम् राज्यों में बड़े धूम धाम से मनाया जाता है, ज्यादातर ऐसे राज्यों में जहाँ से गंगा हो कर जाती है|

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की दसवीं ही वह दिन है जब गंगा धरती पर अवतरित हुईं थी|

यह त्यौहार पूरे 10 दिन तक चलता है और दसवें दिन गंगा के किनारे गंगा जी की आरती, पूजन और कथा की जाती है|

किन किन राज्यों में दशहरा पर्व मनाया जाता है

यह त्यौहार ऐसे राज्यों में मनाया जाता है जहाँ जहाँ से गंगा बह कर जाती है| उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में यह गंगा दशहरा बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है|

इन राज्यों में जो प्रमुख शहर है वो हैं हरिद्वार, वाराणसी, गर्मुक्तेश्वर, ऋषिकेश, प्रयागराज और पटना है|

गंगा दशहरा 2019 में कब मनाया जाएगा (Ganga Dussehra 2019 date)

गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दसवीं को मनाया जाता है, 2019 में यह दिन 12 जून को पड़ रहा है|

गंगा दशहरा पर्व कैसे मनाया जाता है

गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) पर्व गंगा जी के स्वर्ग से धरती पर अवतरित होने से सम्बंधित है| इस दिन को गंगाजी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है|

यह त्यौहार 10 दिन तक चलता है| ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दसवीं का दिन अंतिम दिन होता है| कहने का अर्थ है शुक्ल पक्ष की दसवीं से 10 दिन पहले से शुरू हो जाता है|

इन दस दिन में गंगा किनारे मेला लगता है, श्रद्धालु गंगा की आरती करते हैं और गंगा स्नान करते है| मेले का आयोजन बड़े पैमाने पर होता है जिसमें लाखों श्रद्धालु इस पर्व में हिस्सा लेते हैं|

हरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज और ऋषिकेश प्रमुख शहर हैं जहाँ गंगा दशहरा पर्व के मेले का आयोजन किया जाता है|

इसी दिन कई शहर मथुरा, वृन्दावन और बटेश्वर में यमुना नदी की भी आरती की जाती है और पतंगे भी उड़ाई जाती है|

इस दिन लस्सी, शर्बत और शिकंजी का दान और प्रसाद के रूप में सेवन किया जाता है| इसके अलावा तरबूज, खरबूज और सत्तू का दान और सेवन भी किया जाता है|

हरिद्वार और वाराणसी जैसे शहरों में तो यह त्यौहार बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है| वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर दीये गंगा नदी में बहाये जाते हैं और गंगा महा आरती का आयोजन किया जाता है|

पटना के गाँधी घाट और अदालत घाट पर भी महा आरती और फूलों की माला अर्पित की जाती है|

गंगा माँ की पूजा कैसे करें

गंगा में स्नान करने से पहले और स्नान करते समय इस मन्त्र जाप करें

“ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः”

फिर हाथों में फूल लेकर इस मन्त्र को बोलें

“ऊँ नमो भगवते ऐं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पाय स्वाहा”

गंगा दशहरा का महत्त्व

हिन्दू धर्म में माना जाता है इस दिन दान पुण्य करने से और गंगा जी में स्नान करने से 10 तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है|

गंगा नदी की कहानी, इतिहास व गंगा दशहरा कथा (Ganga River Story and History)

गंगा अवतरण की कथा वायुपुराण, विष्णुपुराण, हरवंश पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, महाभारत और भागवत जैसे हिन्दू धर्म ग्रन्थ में वर्णित है|

इनकी 2 पत्नियाँ थी केशनी और सुमति, सुमति पत्नी के 60,000 पुत्र थे और दूसरी पत्नी केशनी के केवल 1 पुत्र था| 60,000 पुत्र बहुत उदंड थे और एक पुत्र जो था बहुत बुद्धिमान था|

उदंड पुत्रों से राजा सगर बहुत दुखी थे और प्रजा भी परेशान थी|

राजा सगर को कुल ऋषि ने सुझाव दिया की आप अश्मेघ अज्ञ करें और इन 60,000 पुत्रों को उसकी रक्षा करने का दायित्व सोंप दें, ये सारे पुत्र राज्य से दूर रहेंगे और यहाँ शांति बनी रहेगी|

यहाँ आपको बता दें अश्वमेघ यज्ञ एक प्रकार का यज्ञ होता है जिसमें एक सफ़ेद घोडा छोड़ा जाता है|

यह घोडा जिस जिस राज्य में जाता है और वहां का राजा उस घोड़े को रोकता नहीं है तो वह राज्य अश्वमेघ यज्ञ करने वाले राजा के अधीन हो जाता है|

यदि वह घोड़े को रोकता है तो युद्ध से निर्णय होता है|

घोड़े को रक्षा के लिए 60,000 पुत्र घोड़े के साथ चलने लगे| लेकिन इंद्र देवता नहीं चाहते थे यह अश्मेघ यज्ञ सफल हो सके क्योंकि इस यज्ञ से इंद्र के सिंहासन को भी खतरा था|

इस यज्ञ को असफल करने के लिए इंद्र ने घोडा चुरा लिया और पातळ में कपिल मुनि के आश्रम में बाँध दिया|

अब घोड़े को ढूँढने के लिए पूरे विश्व में खोजा गया जब नहीं मिला तो जमीन को खोद के पातळ में देखा गया| वहां कपिल मुनि के आश्रम में घोडा बंधा हुआ था और कपिल मुनि ध्यान में थे|

सारे पुत्र कपिल मुनि को पत्थर मारने लगे और बुरा भला कहने लगे, शोर सुनकर कपिल मुनि का ध्यान टूट गया और जैसे ही उन्होंने आँखें खोली उनके तप से आँखों से निकली अग्नि से सारे पुत्र जल कर राख हो गए|

जब सागर राजा ने यह समाचार सुना तो वह बड़े चिंतित हुए| उनकी चिंता को दूर करने के लिए नारद मुनि वहां प्रकट हुए तो उनसे ब्रह्मा जी की तपस्या करने के लिया कहा|

और वरदान के रूप में गंगा जी को प्रथ्वी पर भेजने के लिए मागने की सलाह दी|

सगर ने तपस्या की लेकिन सफल नहीं हो पाए| इसके बाद इनके पुत्र अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप ने भी घोर तपस्या की लेकिन सफल नहीं हो पाए|

इसके बाद सागर के पौत्र रजा भागीरथ ने कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया और वरदान के रूप में गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर भेजने के वरदान माँगा, उस समय गंगा जी ब्रह्मा जी के कमंडल में विराजमान थी|

लेकिन ब्रह्मा जी ने कहाँ गंगा का वेग बहुत तेज है जैसे ही यह धरती से टकराएगी तो पाताल में चली जाएगी| ब्रह्मा जी ने राजा भागीरथ को सलाह दी की आप भगवान् शिव की तपस्या करें|

राजा भागीरथ ने शिव की घोर तपस्या की, शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए तो गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने के लिए तैयार हो गए|

गंगा स्वर्ग से शिव की जटाओं में आईं लेकिन उनकी जटाओं में फँस गई|

तब भागीरथ ने फिर शिव की तपस्या की और शिव ने अपनी एक जटा खोलकर गंगा को बाहर आने दिया और भागीरथ से कहा की आप जहाँ जहाँ जाओगे आपके पीछे पीछे गंगा जाएगी|

धरती पर जैसे ही गंगा आई बड़े वेग से आस पास की प्रकर्ति को अपने अन्दर समाने लगी और कई ऋषियों के आश्रम नष्ट कर दिए| वहीँ बीच रास्ते ऋषि जुहू का आश्रम था|

अपनी आश्रम की और गंगा की और आते देख क्रोध वश ऋषि जुहू ने सम्पूर्ण गंगा को अपने मुह में ले लिया| बाद में भागीरथ की प्रार्थना पर उन्होंने गंगा को मुक्त किया और गंगा जुहू ऋषि के नामकरण पर जाह्नवी कहलाई|

गंगा, भागीरथ के साथ कपिल मुनि के आश्रम पहुंची और 60,000 पुत्रों का उद्धार किया| भागीरथ की तपस्या के बल पर ही गंगा प्रथ्वी पर आईं थी इसलिए इन्हें भागीरथी भी कहा जाता है|

गंगा नदी के अन्य नाम

1. मंदाकनी
2. त्रिपथगा
3. देवगंगा
4. सूरापगा
5. सुरसरिता
6. देवनदी

 

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