धन पर संस्कृत श्लोक अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas on Wealth with meaning in Hindi

धन पर संस्कृत श्लोक अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas on Wealth with meaning in Hindi | सम्पति पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

दोस्तो, हमारे धर्म ग्रन्थ ज्ञान का भंडार है| हिन्दू सभ्यता इतनी पुरानी है की इसने जीवन के सभी मूल धर्म गुणों को समझ लिया और जीवन के इन्ही अनुभवों को हमारे पूर्वजों ने वेदों, उपनिषदों और अन्य संस्कृत के ग्रंथों में लिखा|

ऐसे ही धन (संपत्ति) के बारे में भी बहुत सारी ज्ञान की बातें इन ग्रंथों में लिखी गई है|

आइये जानते हैं धन से सम्बधित कुछ संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

संपत्ति पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च ।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१॥
(अर्थ-नाशं मनस्-तापम् गृहे दुः-चरितानि च वञ्चनम् च अपमानम् च मतिमान् न प्रकाशयेत्।)

हिंदी अर्थ:- धन की हानि, अनिष्ट घटनाओं से प्राप्त मानसिक कष्ट, घर-परिवार में दुःखद किंतु गोपनीय घटनाएं, ठगे जाने, और अपमानिन होने की बातों का खुलासा बुद्धिमान व्यक्ति न करे। उन्हें अपने मन ही तक सीमित रखे।

यस्यार्थस्तस्य मित्राणि यस्यार्थस्तस्य बान्धवाः ॥
यस्यार्थः स पुमांल्लोके यस्यार्थः स च जीवति ॥॥
(यस्य अर्थः तस्य मित्राणि यस्य अर्थः तस्य बान्धवाः यस्य अर्थः स पुमान् लोके यस्य अर्थः स च जीवति।)

हिंदी अर्थ:- चाणक्य कहते है, जिसके पास धन और सम्पदा है इसके ही मित्र और सगे सम्बन्धी होते हैं| जिसके पास धन नहीं है न तो उसके मित्र होते हैं और सगे सम्बन्धी भी उससे दुरी बनाए रखते हैं|

अशनादिन्द्रियाणीव स्युः कार्याण्यखिलान्यपि ।
एतस्मात्कारणाद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते ॥॥
(अशनात् इन्द्रियाणि इव स्युः कार्याणि अखिलानि अपि एतस्मात् कारणात् वित्तं सर्व-साधन् उच्यते ।)

अर्थः भोजन का जो संबंध इंद्रियों के पोषण से है वही संबंध धन का समस्त कार्यों के संपादन से है । इसलिए धन को सभी उद्येश्यों की प्राप्ति अथवा कर्मों को पूरा करने का साधन कहा गया है ।

यहाँ कहा गया है की धन कमाना और जोड़ना कोई बुरी बात नहीं है| बिना धन के तो एक धार्मिक कार्य भी संम्पन नहीं हो सकता है| इसलिए जैसे हमें हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए धन की आवश्यकता होती है वैसे ही हमें धन भी अर्जित करना चाहिए और धर्म के कार्यों में लगाना चाहिए|

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते ।
त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ॥9॥
(अर्थ-अर्थी जीवलोकः, अ‌यं श्मशानम् अपि सेवते, त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ।)

हिंदी अर्थ:- धन के बिना यह जीवन संभव नहीं है| शास्त्र कहते हैं यदि धन कमाने का कोई कार्य नहीं मिलता है तो विवशता पूर्ण शमशान का कार्य भी करना पड़ता है| धन कमाने के लिए तो जन्मदाता को छोड़कर दुसरे देश भी जाना पड़ता है|

गतवयसामपि पुंसां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः ।
अर्थे तु ये हीना वृद्धास्ते यौवनेऽपि स्युः ॥10॥
(गत-वयसाम् अपि पुंसां येषाम् अर्थाः भवन्ति ते तरुणाः, अर्थे तु ये हीनाः वृद्धाः ते यौवने अपि स्युः ।)

अर्थः उम्र ढल जाने पर भी वे पुरुष युवा रहते हैं जिनके पास धन रहता है । इसके विपरीत जो धन से
क्षीण होते हैं वे युवावस्था में भी बुढ़ा जाते हैं ।

इस श्लोक की मैं दो प्रकार से व्याख्या करता हूं । पहली व्याख्या तो यह है धनवान व्यक्ति पौष्टिक भोजन एवं चिकित्सकीय सुविधा से हृष्टपुष्ट एवं स्वस्थ रह सकता है । तदनुसार उस पर बुढ़ापे के लक्षण देर से दिखेंगे । जिसके पास खाने-पीने को ही पर्याप्त न हो, अपना कारगर इलाज न करवा सके, वह तो जल्दी ही बूढ़ा दिखेगा । संपन्न देशों में लोगों की औसत उम्र
अधिक देखी गई है । अतः इस कथन में दम है ।

दूसरी संभव व्याख्या यों हैः धनवान व्यक्ति धन के बल पर लंबे समय तक यौनसुख भोग सकता है, चाटुकार उसे घेरे रहेंगे और कहेंगे, “अभी तो आप एकदम जवान हैं ।” कृत्रिम साधनों से भी वह युवा दिख सकता है और युवक-युवतियों के आकर्षण का केंद्र बने रह सकता है । जब मन युवा रहे जो वार्धक्य कैसा ? – योगेन्द्र जोशी

इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते ।
स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ॥5॥
(इह लोके हि धनिनां परः अपि स्वजनायते स्वजनः अपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ।)

हिंदी अर्थ:- शास्त्र कहते हैं, धनवान व्यक्ति के तो पराये भी अपने हो जाते हैं और निर्धन से तो अपने भी दुरी बना लेते हैं| कहने का अर्थ है, इस संसार में कर्म करके धन कमाना बहुत जरुरी है| और धन से ही हम अपने सारे सांसारिक कार्य पुरे कर सकते हैं|

अर्थेभ्योऽपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्य इतस्ततः ।
प्रवर्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः ॥6॥
(अर्थेभ्यः अपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्य इतः ततः प्रवर्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इव आपगाः ।)

हिंदी अर्थ:- शास्त्र कहते हैं, आपके पास धन कमाने के जितने भी माध्यम हैं सभी से धन कमाकर अर्जित करें| कर्म करें पुरुषार्थ करें और धन कमाए क्योंकि संसार के जितने भी कार्य हैं धन के विना संपन्न नहीं किये जा सकते हैं|

पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्यो९पि गम्यते ।
वन्द्यते यदवन्द्योऽपि स प्रभावो धनस्य च ॥7॥
(पूज्यते यत् अपूज्यः अपि यत् अगम्यः अपि गम्यते वन्द्यते यत् अवन्द्यः अपि स प्रभावः धनस्य च ।)

हिंदी अर्थः धन का प्रभाव यह होता है कि जो सम्मान के अयोग्य हो उसकी भी पूजा होती है, जो पास जाने योग्य नहीं होता है उसके पास भी जाया जाता है, जिसकी वंदना (प्रशंसा) का पात्र नहीं होता उसकी भी स्तुति होती है ।

न हि तद्विद्यते किञ्चिद्यदर्थेन न सिद्ध्यति ।
यत्नेन मतिमांस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत् ॥2॥
(न हि तत् विद्यते किञ्चित् यत् अर्थेन न सिद्ध्यति यत्नेन मतिमान् तस्मात् अर्थम् एकं प्रसाधयेत् ।)

हिंदी अर्थः- ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे धन के द्वारा न पाया जा सकता है । अतः बुद्धिमान् व्यक्ति को एकमेव धन अर्जित करने का प्रयत्न करना चाहिए ।

भौतिक सुख-सुविधाएं धन के माध्यम से एकत्र की जा सकती हैं । इतना ही नहीं सामाजिक संबंध भी धन से प्रभावित होते हैं । ऐसी ही तमाम बातें धन से संभव हो पाती हैं । इनका उल्लेख आगे किया गया हैः

यस्यार्थाः तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥3॥
(यस्य अर्थाः तस्य मित्राणि यस्य अर्थाः तस्य बान्धवाः यस्य अर्थाः सः पुमान् लोके यस्य अर्थाः सः च पण्डितः ।

हिंदी अर्थ:- जिस व्यक्ति के पास धन हो उसी के मित्र होते हैं, उसी के बंधुबांधव होते हैं, वही संसार में वस्तुतः पुरुष (सफल व्यक्ति) होता है, और वही पंडित या जानकार होता है ।

न सा विद्या न तद्दानं न तच्छिल्पं न सा कला ।
न तत्स्थैर्यं हि धनिनां याचकैर्यन्न गीयते ॥4॥
(न सा विद्या न तत् दानं न तत् शिल्पं न सा कला न तत् स्थैर्यं हि धनिनां याचकैः यत् न गीयते ।)

हिंदी अर्थः- ऐसी कोई विद्या, दान शिल्प (हुनर), कला, स्थिरता या वचनबद्धता नहीं है जिनके धनिकों में होने का गुणगान याचकवृंद द्वारा न किया जाता हो।

शास्त्र कहते हैं| धनवान व्यक्ति का सभी गुणगान करते हैं, चाटुकारिता करते हैं| और उन्हें विद्वान, शिल्पकार, दानशील पता नहीं क्या क्या उपाधियाँ दी जाती हैं|

दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयः भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥॥


हिंदी अर्थ:- दान, भोग और नाश – धन की यही तीन गतियाँ हैं। जिसने न दान दिया और न धन का उपभोग किया उसके धन की तीसरी गति ही होती है, जो है नाश।

Share your love
Default image
Viral Facts India
Articles: 340

Leave a Reply

close