Chanakya Niti Third Chapter Hindi English | चाणक्य नीति तृतीय अध्याय

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chanakya niti third chapter with meaning in hindi english

Chanakya Niti third (3rd) chapter 3 shlokas with meaning in Hindi English | चाणक्य निति तृतीय अध्याय श्लोक हिंदी इंग्लिश अर्थ सहित

चाणक्य भारत के इतिहास में सबसे बड़े राजनीतिज्ञ माने जाते हैं| इन्होने सिर्फ अपनी कूटनीति का प्रयोग करके एक शक्तिशाली राजा का पूरा साम्राज्य नष्ट कर दिया|

चाणक्य ने हिन्दू धर्म के विभिन्न ग्रंथों से राजनीती और धर्म शास्त्र के शोल्क को एकत्रित कर एक ग्रन्थ बनाया जिसे चाणक्य नीति का नाम दिया गया|

इसमें कुल 18 अध्याय हैं आज यहाँ चाणक्य निति के तृतीय अध्याय को हिंदी इंग्लिश अर्थ सहित (Chanakya Niti Third Chapter shlok hindi english arth sahit) चर्चा करेंगे|

Chanakya Niti Third Chapter with Meaning in Hindi and English (1 – 10)

चाणक्य निति तृतीय अध्याय हिंदी और इंग्लिश अर्थ सहित

संस्कृत श्लोक – 1

कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीड़ितः।
व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्।।1।।

दोहा–

केहि कुल दूषण नहीं, व्याधि न काहि सताय ।।
कष्ट न भोम्यो कौन जन, सुखी सदा कोउ नाय ।।१।।

हिन्दी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य का कथन है कि दोष कहां नहीं है? इसी आशय से उनका कहना है कि किसके कुल में दोष नहीं होता? रोग किसे दुःखी नहीं करते? दुःख किसे नहीं मिलता और निरंतर सुखी कौन रहता है।

अर्थात् कुछ न कुछ कमी तो सब जगह है और यह एक कड़वी सच्चाई है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो कभी बीमार न पड़ा हो और जिसे कभी कोई दुःख न हुआ हो या जो सदा सुखी हो रहा हो तो फिर संकोच या दुःख किस बात का |

इसलिए व्यक्ति को अपनी कमियों को लेकर अधिक चिन्ता नहीं करनी चाहिए बल्कि कमियों के रहते भी आचरण पर ध्यान देते हुए उसे अन्य मानवीय गुणों से सम्पन्न करना चाहिए ताकि व्यक्तित्व को पूर्णता प्राप्त हो सके।

English Meaning:- Chanakya says, No family in this world is free from problem, who is free from sickness and grief. No body is always happy here. so Do not worry, keep doing
your duty as human being.

संस्कृत श्लोक – 2

आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्।
सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्।।2।।

दोहा – 2

महत कुलहिं आचार भल, भा अन देश बताय ।
आदर प्राप्ति जनावहि, भोजन देहू मुटाय ।।२।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य लक्षणों से प्राप्त संकेतों की चर्चा करते हुए कहते हैं। कि आचरण से व्यक्ति के कुल का परिचय मिलता है। बोली से देश का पता लगता है।

आदर-सत्कार से प्रेम का तथा शरीर को देखकर व्यक्ति के भोजन का पता चलता है।

अभिप्राय यह है उच्च वंश का व्यक्ति शालीन, शान्त और अच्छे स्वभाव का होगा, यह माना जाएगा और नीच वंश का आदमी उद्धत, बातूनी और मान-मर्यादा का ख्याल न रखने वाला होगा।

English Meaning:- Chanakya Says, a gentalman can be known by his conduct, country by it langugae his friendship by his warmth welcom and glow, and capacity to eat by his body.

संस्कृत श्लोक – 3

सकुले योजयेत्कन्या पुत्रं विद्यासु योजयेत्।
व्यसने योजयेच्छत्रु मित्रं धर्मे नियोजयेत्।।3।।

दोहा–

कन्या ब्याहिय उच्च कुल, पुत्रहिं शास्त्र पढाय ।
शत्रुहिं दुख दीजै सदा, मित्रहिं धर्म शिखाय ।।३।।

हिंदी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य व्यावहारिकता की चर्चा करते हुए कहते हैं कि कन्या का विवाह किसी अच्छे घर में करना चाहिए, पुत्र को पढ़ाईलिखाई में लगा देना चाहिए, मित्र को अच्छे कार्यों में तथा शत्रु को बुराईयों में लगा देना चाहिए।

यही व्यावहारिकता है और समय की मांग भी।आशय यह है कि कुशल व्यक्ति वही है, जो बेटी के विवाह योग्य होते
ही उसका विवाह देखभाल कर किसी अच्छे खानदान में कर दे और बेटे को अधिक से अधिक शिक्षा दे ताकि वह अपने जीवन में आजीविका की दृष्टि से आत्मनिर्भर बन सके।

मित्र को मेहनत-परिश्रम, ईमानदारी की सीख दे ताकि सपरामर्श से वह अपना जीवन सुधार सके और किसी अच्छे काम में लग जाए, किन्तु दुश्मन को बुरी आदतों का शिकार बना दे ताकि वह उसमें उलझकर आपको अनावश्यक रूप से तंग न करे।

English Meaning:- Marry your daughter in good family, give your son good education, engage your friends in good deed and always insure that your enemy comes to grief due so
that he does not harm you, that’s what dharm shastr says.

संस्कृत श्लोक – 4

दुर्जनेषु च सर्वेषु वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे-पदे।।4।।

दोहा – 4

खलहु सर्प इन राहून में, भलो सर्प खल नाहिं।।
सर्प दशत है काल में, खलजन पद पद माहिं ।।4।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां दुष्टता की दृष्टि से तुलना करते हुए उस पक्ष को रख रहे हैं, जहां दुष्टता का दुष्प्रभाव कम-से-कम पड़े।

उनका मानना है कि दुष्ट और सांप, इन दोनों में सांप अच्छा है, न कि दुष्ट। सांप तो एक ही बार डसता है, किन्तु दुष्ट तो पग-पग पर डसता रहता है। इसलिए दुष्ट से बचकर रहना चाहिए।

अभिप्राय यह है कि यदि यह पूछा जाय कि दुष्ट और सांप में कौन अच्छा है? तो इसका उत्तर है-सांप दुष्ट से हजार गुना अच्छा है|

क्योंकि सांप तो कभी-कभार किसी विशेष कारण पर ही मनुष्य को डसता है, किन्तु दुष्ट तो पग-पग पर डसता रहता है।

दुष्ट का कोई भरोसा नहीं कि कब क्या कर बैठे और यह भी तथ्य है कि सांप तभी काटता है जब उस पर पांव पड़ जाए या वह किसी कारण भयभीत हो जाए, लेकिन दुर्जन (दुष्ट) तो अकारण ही दुःख पहुंचाने का यत्न करता है। संगति कुलीनों की करें|

English Hindi:- Of a rascal and a serpent, the serpent is the better of the two, for he
strikes only at the time he is destined to kill, while the former at every step.

संस्कृत श्लोक – 5

एतदर्थ कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्।
आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्।।5।।

दोहा – 5

मर्यादा सागर तजे, प्रलय होन के काल ।।
उत साधू छोड़ नहीं, सदा आपनी चाल ।।६।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां कुलीनता का वैशिष्ट्य बताते हुए कहते हैं कि कुलीन लोग आरंभ से अंत तक साथ नहीं छोड़ते। वे वास्तव में संगति का धर्म निभाते हैं।

इसलिए राजा लोग कुलीनों का संग्रह करते हैं ताकि समय-समय पर सत्परामर्श मिल सके।

अभिप्राय यह है कि अच्छे खानदानी व्यक्ति जिसके साथ मित्रता करते हैं, उसे जीवन भर निभाते हैं। वे शुरू से अन्त तक सुख और दुःख दोनों दशाओं में कभी साथ नहीं छोड़ते।

इसलिए राजा लोग ऐसे कुलीनों को अपने पास रखते हैं। इसलिए राजा लोग और राजपुरुष महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट राजकीय सेवाओं में कुलीन पुरुषों की नियुक्ति उनके उच्च संस्कारों और परम्परागत शिक्षा-दीक्षा के कारण ही करते हैं।

वे कभी नीच अथवा ओछे हथकण्डे अपनाकर अपने स्वामी के साथ छल या धोखा नहीं करते।

English Meaning:- Chanakya says kings always hire subordinates from good families, for they never forsake them either at the beginning, the middle or the end.

संस्कृत श्लोक – 6

प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः।।6।।

दोहा – 6

मर्यादा सागर तजे, प्रलय होन के काल ।।
उत साधू छोड़ नहीं, सदा आपनी चाल ।।६।।

हिन्दी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य परिस्थितिवश आचार में आने वाले परिवर्तन के स्तर और स्थिति को इंगित करते हुए धीर-गंभीर व्यक्ति की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि सागर की तुलना में धीर-गंभीर पुरुष को श्रेष्ठतर माना जाना चाहिए|

क्योंकि जिस सागर को लोग इतना गंभीर समझते हैं, प्रलय आने पर वह भी अपनी मर्यादा भूल जाता है और किनारों को तोड़कर जल-थल एक कर देता है; परन्तु साधु अथवा श्रेष्ठ व्यक्ति संकटों का पहाड़ टूटने पर भी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करता।

अतः साधु पुरुष सागर से भी महान् होता है। यूं तो मर्यादा पालन के लिए सागर आदर्श माना जाता है, वर्षा में उफनती नदियों को अपने में समेटता हुआ भी सागर अपनी सीमा नहीं तोड़ता|

परन्तु प्रलय आने पर उसी सागर का जल किनारों को तोड़ता हुआ सारी धरती को ही जलमय कर देता है। सागर प्रलयकाल में अपनी मर्यादा को सुरक्षित नहीं रख पाता|

किन्तु इसके विपरीत साधु पुरुष प्राणों का संकट उपस्थित होने पर भी अपने चरित्र की उदात्तता का परित्याग नहीं करते।

वे प्रत्येक अवस्था में अपनी मर्यादा की रक्षा करते हैं। इसलिए सन्त पुरुष समुद्र से भी अधिक गम्भीर माने जाते हैं और उनका सम्मान करना ही चाहिए।

English Meaning:- Even At the time of the pralaya (universal destruction) the oceans are to exceed their limits and seek to change, but a saintly man never changes. Thats why saintly man is even more great than ocean.

संस्कृत श्लोक – 7

मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः।
भिनत्ति वाक्यशूलेन अदृश्यं कण्टकं यथा।।7।।

दोहा – 7

मूरख को तजि दीजिये, प्राट विपद पशु जान ।
वचन शल्यते वेधहीं, अड्याहिं कांट समान ।।7।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां नर पशु की चर्चा करते हुए कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति को दो पैरों वाला पशु समझकर त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह अपने शब्दों से शूल के समान उसी तरह भेदता रहता है, जैसे अदृश्य कांटा चुभ जाता है।

आशय यह है कि मूर्ख व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी पशु ही है। जैसे पांव में चुभा हुआ कांटा दिखाई तो नहीं पड़ता पर उसका दर्द सहन नहीं किया जा सकता है।

इसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति के शब्द दिखाई नहीं देते, किन्तु हृदय में शूल की तरह चुभ जाते हैं। मूर्ख को त्याग देना ही उचित रहता है।

English Meaning:- Do not acompany with a fool for as we can see he is a two-legged beast. He is like an unseen thorn that prick and hurt, same foolish pierces the heart with his sharp words.

संस्कृत श्लोक – 8

रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसंभवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः।।8।।

दोहा – 8

संयुत जीवन रूपते, कहिये बडे कुलीन ।।
विद्या बिन शोभत नहीं पहुप गंध ते हीन ।।8।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य विद्या का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि रूप और यौवन से सम्पन्न, उच्च कुल में उत्पन्न होकर भी विद्याहीन मनुष्य सुगंधहीन फूल के समान होते हैं और शोभा नहीं देते।

आशय यह है कि मनुष्य चाहे कितना ही सुन्दर हो, जवान हो और धनी घराने में पैदा हुआ हो, किन्तु यदि वह विद्याहीन है, मूर्ख है तो उसे सम्मान नहीं मिलता।

विद्या मनुष्य की सुगन्ध के समान है। जैसे सुगन्ध न होने पर किंशुक पुष्प को कोई पसन्द नहीं करता, इसी तरह अशिक्षित व्यक्ति की भी समाज में कोई इज्जत नहीं होती। अतः विद्या व्यक्ति को वास्तव में गुणी मनुष्य बनाती है।

English Meaning:- Even It A men be endowed with beauty and youth and born in
noble families, yet without education they are like the palasa flower, without sweet fragrance.

संस्कृत श्लोक – 9

कोकिलानां स्वरो रूपं नारी रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्।।9।।

दोहा – 9

रूप कोकिला व तियन, पतिव्रत रूप अनूप ।
विद्यारूप कुरूप को, क्षमा तपस्वी रुप ।।9।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य रूप-चर्चा करते हुए सूरत की अपेक्षा सीरत को महत्त्व देते हैं और कहते हैं कि कोयलों का रूप उनका स्वर है।

पतिव्रता होना ही स्त्रियों की सुंदरता है। कुरूप लोगों का ज्ञान ही उनका रूप है। तथा तपस्वियों का क्षमा भाव ही उनका रूप है।

आशय है कि कोयलों की सुरीली आवाज ही उनकी सुन्दरता है। इसी से वे अपने प्रति आकर्षण पैदा करती हैं। स्त्रियों की सच्ची सुन्दरता उनका पतिव्रत धर्म है।

इसी में स्त्री धर्म की सार्थकता निहित है। कुरूप व्यक्ति की सुन्दरता उसकी विद्या है, क्योंकि ज्ञान से ही वह स्वयं का आत्म परिष्कार करके जग को प्रकाशित कर सकता है।

तपस्वियों की सुन्दरता सबको क्षमा करना है, क्योंकि तप से क्रोध पर विजय प्राप्त की जाती है। शालीनता
आने पर सहज ही क्षमा भाव जागृत होने लगता है।

English Meaning:- The beauty of a cuckoo is in its notes, that of a woman in her unconditional devotion to her husband, that of an ugly person in his scholarship, and that of an ascetic (nobal Man) in his forgiveness.

संस्कृत श्लोक – 10

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।।10।।

दोहा – 10

कुलहित त्याशिय एककें, गृहहु छाडि कुल ग्राम ।।
जनपद हित ग्रामहि तजिय, तनहित अवनि तमाम ।।10।।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां क्रम से श्रेष्ठता को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को चाहिए कि कुल के लिए एक व्यक्ति को त्याग दे।

ग्राम के लिए कुल को त्याग देना चाहिए। राज्य की रक्षा के लिए ग्राम को तथा आत्मरक्षा के लिए संसार को भी त्याग देना चाहिए।

आशय यह है कि यदि किसी एक व्यक्ति को त्याग देने से पूरे कुलखानदान का भला हो रहा हो, तो उस व्यक्ति को त्याग देने में कोई बुराई नहीं है।

यदि कुल को त्यागने से गांव भर का भला होता हो, तो कुल को भी त्याग देना चाहिए। इसी प्रकार यदि गांव को त्यागने पर देश का भला हो तो गांव को भी त्याग देना चाहिए।

किन्तु अपना जीवन सबसे बड़ा है। यदि अपनी रक्षा के लिए सारे संसार का भी त्याग करना पड़े, तो संसार का त्याग
कर देना चाहिए। जान है तो जहान है। यही उत्तम कर्तव्य है।

English Meaning:- Give up a member to save a family, a family to save a village, a village to save a country, and the country to save yourself.

Chanakya Niti Third Chapter with Meaning in Hindi and English (11 – 21)

संस्कृत श्लोक – 11

उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्।
मौनेन कलहो नास्ति जाग्रतस्य च न भयम्।।111।।

दोहा – 11

नहिं दारिद उद्योग पर, जपते पातक नाहिं।
कलह रहे ना मौन में, नहिं भय जात माहिं ।।11।।

हिंदी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य आचरण की चर्चा करते हुए कहते हैं कि उद्यम से दरिद्रता तथा जप से पाप दूर होता है। मौन रहने से कलह और जागते रहने से भय नहीं होता। |

आशय है कि परिश्रम-उद्यम करने से गरीबी नष्ट होती है। अतः व्यक्ति को श्रम करना चाहिए ताकि जीवन सम्पन्न हो सके।
भगवान का नाम जपने से पाप दूर होते हैं, मन और आत्मा शुद्ध होती है, शुद्ध कर्म की प्रेरणा मिलती है, व्यक्ति दुष्कर्म से दूर होता है।

चुप रहने से झगड़ा नहीं बढ़ता और अप्रिय स्थितियां टल जाती हैं तथा जागते रहने से किसी चीज का डर नहीं रहता, क्योंकि सजगता से व्यक्ति चीजों को खतरे से पूर्व ही संभाल सकता है।

English Meaning:- There is no poverty for the Hard working and Businessman. Sin does not attach itself to the person who always remember the god. Those who kept themselves silent and kalm have no quarrel with others. and They are fearless who remain always
alert.

संस्कृत श्लोक – 12

अति रूपेण वै सीता चातिगर्वेण रावणः।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यति सर्वत्र वर्जयेत्।।2।।

दोहा – 12

अति छबि ते सिय हुण भी, नशि रावण अति गर्व ।।
अतिहि दान ते बलि बँध, अति तजिये थल सर्व ।।12।।

हिंदी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य कहते हैं कि अधिक सुंदरता के कारण ही सीता का हरण हुआ था, अति घमंडी हो जाने पर रावण मारा गया तथा अत्यन्त दानी होने से राजा बलि को छला गया। इसलिए अति सभी जगह वर्जित है।

आशय यह है कि सीताजी अत्यन्त सुंदरी थीं, इसलिए रावण उन्हें उठा ले गया। रावण को अत्यधिक घमण्ड हो गया था अतः उसका नाश हो गया और राजा बलि अति दानी थे, इसी कारण भगवान के हाथों ठगे गए। भलाई में भी और बुराई में भी, अति दोनों में ही बुरी है।

English Meaning:- Chanakya Says anything that is in excess or extravegenza is harmful. chanakya explain it with exmaple as sita mata was abducted due to too much beautiful, Ravan was killed due to his excessive errogance, raja bali was decieve beacuse he was higly committed to donation, so excessvieness is harmful.

संस्कृत श्लोक – 13

को हि भारः समर्थानां किं दूर व्यवसायिनाम्।
को विदेश सुविद्यानां को परः प्रियवादिनाम्।।13।।

दोहा – 13

उद्योगिन कुछ दूर नहिं, बलिहि न भार विशेष ।।
प्रियवादिन अप्रिय नहिं, बुधहि न कठिन विदेश ।।13।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां मधुरभाषिता को व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण गुण बताते हुए कहते हैं कि सामर्थ्यवान व्यक्ति को कोई वस्तु भारी नहीं होती।

व्यापारियों के लिए कोई जगह दूर नहीं होती। विद्वान के लिए कहीं विदेश नहीं होता। मधुर बोलने वाले का कोई पराया नहीं होता। |

अभिप्राय यह है कि समर्थ व्यक्ति के लिए कौन-सी वस्तु भी भारी होती है। वह अपनी सामर्थ्य के बल पर कुछ भी विचार कर सकता है।

व्यापारियों के लिए दूरी क्या? वह वस्तु-व्यापार के लिए कहीं भी जा सकता है। विद्वान के लिए कोई-सा देश-विदेश नहीं, क्योंकि अपने ज्ञान से वह सभी जगह अपने लिए वातावरण बना लेगा। मधुर बोलने वाले व्यक्ति के लिए कोई पराया नहीं क्योंकि मधुरभाषिता से वह सबको अपना बना लेता है।

English Meaning:- What is too heavy for the strong and what place is too distant for Businesman? What country is foreign to true Schlora? Who can be inimical (unfriendly) to one who speaks pleasingly?

संस्कृत श्लोक – 14

एकेनापि सुवर्ण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वसितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा।।14।।

दोहा – 14

एक सुगन्धित वृक्ष से, सब बन होत सुवास ।
जैसे कुल शोभित अहे, हि सुपुत्र शुण रास ।।14।।

हिंदी अर्थ:-आचार्य चाणक्य कहते हैं कि गुणवान अपने एक भी गुणों का विस्तार करके नाम कमा लेता है। उनका कहना है कि वन में सुंदर खिले हुए फूलों वाला एक ही वृक्ष अपनी सुगंध से सारे वन को सुगंधित कर देता है।

इसी प्रकार एक ही सुपुत्र सारे कुल का नाम ऊंचा कर देता है।

आशय यह है कि यदि वन में कहीं पर एक ही वृक्ष में भी सुन्दर फूल खिले हों, तो उसकी सुगन्ध से सारा वन महक उठता है।

इसी तरह एक ही सपूत सारे वंश का नाम अपने गुणों से उज्जवल कर देता है। क्योंकि कोई भी वंश गुणी पुत्रों से ही ऊंचा उठता है, इसलिए अनेक गुणहीन पुत्रों की अपेक्षा एक गुणवान पुत्र ही पर्याप्त है।

English Meaning:-As a whole forest becomes fragrant by the existence of a single tree with sweet-smelling blossoms in it, so a family becomes famous by the birth of a virtuous son.

संस्कृत श्लोक – 15

एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा।।15।।

दोहा – 15

सूख जरत इक तरुहूते, जस लात बन दाढ़।।
लका दाहक होत है, तस कुपूत की बाढ़ ।।15।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य गुणवत्ता को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि एक ही सूखे वृक्ष में आग लगने पर सारा वन जल जाता है। इसी प्रकार एक ही कुपुत्र सारे कुल को बदनाम कर देता है।

आशय यह है कि वन में यदि एक भी वृक्ष सूखा हुआ है, तो उसमें शीघ्र आग लग जाती है, और उस वृक्ष की आग से वह सारा वन जलकर राख हो जाता है।

ठीक इसी तरह यदि कुल में एक भी कपूत पैदा हो जाता है तो वह सारे कुल को बदनाम कर देता है। अतः सदृहस्थ को चाहिए कि सन्तान को मर्यादा में रखे और उनमें सद्गुण पैदा करने का प्रयास करे।

English Meaning:- As a single withered (dry) tree, if set aflame, causes a whole forest to burn, so does a rascal son destroy a whole family.

संस्कृत श्लोक – 16

एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्ते च साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी।।16।।

दोहा – 16

एकहु सुत जो होय, विद्यायुत अरु साधु चित ।
आनन्दित कुल सोय, यथा चन्द्रमा से निशा ।।१६।।।

हिंदी अर्थ:- यहां भी आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिस प्रकार अकेला चन्द्रमा रात की शोभा बढ़ा देता है, ठीक उसी प्रकार एक ही विद्वान-सज्जन पुत्र कुल को आह्लादित करता है। |

अभिप्राय यह है कि एक अकेला चन्द्रमा रात के सारे अंधेरे को दूर करके सारी दुनिया को अपने प्रकाश से जगमगा देता है।

इसी तरह पुत्र एक ही हो, किन्तु गुणवान हो तो सारे कुल के नाम को रोशन कर देता है। इसलिए अच्छे स्वभाव का एक पुत्र सारे वंश का नाम रोशन कर देता है।

 

संस्कृत श्लोक – 17

किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकैः।
वरमेकः कुलावलम्बो यत्र विश्राम्यते कुलम्।।17।।

दोहा – 17

कलहार सन्ताप सुत, जनमें कहा अनेक।
देहि कुलहिं विश्राम जो, श्रेष्ठ होय वरु एक ।।१७।।

हिंदी अर्थ:- यहां भी आचार्य चाणक्य गुणवान एक ही पुत्र की पर्याप्तता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि शोक और संताप उत्पन्न करने वाले अनेक पुत्रों के पैदा होने से क्या लाभ! कुल को सहारा देने वाला एक ही पुत्र श्रेष्ठ है, जिसके सहारे सारा कुल विश्राम करता है।

English Meaning:- What is the use of having many sons if they cause grief and sorrow. It is wise to have only one son from whom the whole family can derive support and peacefulness.

संस्कृत श्लोक – 18

लालयेत् पंचवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्।।18।।

दोहा – 18

पाँच वर्ष लों लीलिए, दसलों ताडन दे।।
रातहीं सोलह व स्त्र में, मित्र सरिस शनि दे ।।१८।।

हिंदी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य पुत्र-पालन में माता-पिता के दायित्व को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि पुत्र का पांच वर्ष तक लालन करें। दस वर्ष तक ताड़न करें। सोलहवां वर्ष लग जाने पर उसके साथ मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।

आशय यह है कि पांच वर्ष की अवस्था तक ही पुत्र के साथ लाड़प्यार करना चाहिए। इसके बाद दस वर्षों तक, अर्थात् पन्द्रह वर्ष की अवस्था तक उसे कठोर अनुशासन में रखना चाहिए।

किन्तु जब पुत्र पन्द्रह वर्ष की अवस्था पूरी करके सोलहवें में प्रवेश कर जाए, तो वह वयस्क हो जाता है। फिर उसके साथ एक मित्र की तरह सम्मान का व्यवहार करना चाहिए।

English Meaning:- Pamper a son until he is five years of age, and use the stick for another ten years, but when he has attained his sixteenth year treat him as a friend.

संस्कृत श्लोक – 19

उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे।
असाधुजनसम्पर्के पलायति स जीवति।। 19।।

दोहा – 19

काल उपद्रव संवा स्ठ, अन्य राज्य भय होय ।।
तेहि थल ते जो भागिहै, जीवत बचिहै सोय ।।१९।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां समय की सूझ की चर्चा करते हुए कहते हैं उपद्रव या लड़ाई हो जाने पर, भयंकर अकाल पड़ जाने पर और दुष्टों का साथ मिलने पर भाग जाने वाला व्यक्ति ही जीता है।

आशय यह है कि कहीं पर भी अन्य लोगों के बीच में लड़ाई-झगड़ा, दंगा-फसाद हो जाने पर, भयंकर अकाल पड़ जाने पर और दुष्ट लोगों के संपर्क में आ जाने पर उस स्थान को छोड़कर भाग खड़ा होने वाला व्यक्ति अपने को बचा लेता है। ऐसी जगहों से भाग जाना ही सबसे बड़ी समझदारी है।

English Meaning:- He who runs away from a palce with fearful calamity, a foreign invasion, a terrible famine, and and run away from a place there is war and other people are fighting frealessly is safe to live in future.

संस्कृत श्लोक – 20

धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते।
जन्म जन्मानि मर्येषु मरणं तस्य केवलम्।।20।।

दोहा – 20

धरमादिक चहूँ बन में, जो हिय एक न धार।
जात जननि तेहि नन के, मरिये होत अबार।।२०।।

हिन्दी अर्थ:- यहां आचार्य जीवन की निरर्थकता की चर्चा करते हुए कहते हैं कि जिस मनुष्य को धर्म, धन, काम (भोग), मोक्ष में एक भी वस्तु नहीं मिल पाती, उसका जन्म केवल मरने के लिए ही होता है।

आशय यह है कि धर्म, धन, काम (भोग) तथा मोक्ष पाना मनुष्य जीवन के चार कार्य हैं। जो व्यक्ति न तो अच्छे काम करे धर्म का संचय करता है, न धन ही कमाता है, न काम-भोग आदि इच्छाओं को ही पूरा कर पाता है। और न ही मोक्ष ही प्राप्त करता है, उसका जीना या मरना एक समान है।

वह जैसा इस दुनिया में आता है, वैसा ही यहां से चला जाता है। उसका जीवन निरर्थक है।

English Meaning:- He who has not acquired one of the following: religious merit (dharma), wealth (artha), satisfaction of desires (kama), or liberation (moksa) is repeatedly born to die.

संस्कृत श्लोक – 21

मूर्खाः यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसंचितम्।
दाम्पत्योः कलहो नास्ति तत्र श्री स्वयमागता।।21।।

दोहा – 21

जहाँ अन्न संचित रहे, मूर्ख न पूजा पाव ।
दंपति में जहँ कलह नहिं, संपत्ति आपुङ आव ।।२१।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां विद्वानों एवं स्त्री के सम्मान में खुशहाली एवं शांति की स्थिति का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि जहां मूर्खा का
सम्मान नहीं होता, अन्न का भंडार भरा रहता है और जहां पति-पत्नी में कलह नहीं हो, वहां लक्ष्मी स्वयं आती है। |
आशय यह है कि जिन घरों में कोई भी व्यक्ति मूर्ख नहीं होता, अनाज-खाद्य पदार्थ आदि के भण्डार भरे रहते हैं तथा जिन पति-पत्नी में आपस
में कभी लड़ाई-झगड़ा, मनमुटाव नहीं रहता, उनके घरों में सुखशांति, धन-सम्पत्ति आदि सदा बनी रहती है।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि यदि देश की समृद्धि और देशवासियों की संतुष्टि अभीष्ट
है तो मूर्खा के स्थान पर गुणवान व्यक्तियों को आदर देना चाहिए। बुरे । दिनों के लिए अन्न का भण्डारण करना चाहिए तथा घर-गृहस्थ में
वादविवाद का वातावरण नहीं बनने देना चाहिए।

English Meaning:- Chanakya says, Lakshmi, the Goddess of wealth, comes of Her own will where fools are not respected, grain is well stored up, and the husband and wife do not quarrel.

आशा करते हैं चाणक्य निति तृतीय अध्याय (Chanakya Niti Third Chapter with meaning in Hindi English) के इस वेशकीमती ज्ञान से आपके सामाजिक जीवन में जरुर बदलाव आएगा|

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