Chanakya Niti [ First Chapter ] | चाणक्य निति [ प्रथम अध्याय ]

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Chanakya niti first chapter sanskrit shlokas with meaning in Hindi English

Chanakya Niti First Chapter Sanskrit Shlokas with meaning in Hindi English Translation | चाणक्य निति प्रथम अध्याय श्लोक हिंदी अर्थ सहित

चाणक्य भारत के सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ माने जाते हैं| इन्होने अकेले खुद के सामर्थ्य से एक बहुत बड़े सम्राज्य को धराशायी कर दिया|

अपने जीवन के राजनितिक अनुभव से इन्होने विभिन्न ग्रंथों से गुण श्लोक का संकलन किया| जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अपनाना चाहिए|

कई जगह चाणक्य के द्वारा दिया गए तर्क आपको असंगत लगेंगे| लेकिन कई बातें सत्य होती हैं, लेकिन आप उन्हें समाज में मुक्त रूप से चर्चा के रूप में नहीं ला सकते हैं|

लेकिन तर्क बिलकुल व्यावहारिक और प्रेक्टिकल तौर पर सत्य ही हैं|

चाणक्य ने अपने ग्रन्थ में 18 अध्याय में राजनितिक सूत्रों की चर्चा की है| आइये आज चाणक्य निति के प्रथम अध्याय की हिंदी और इंग्लिश अर्थ के साथ (Chanakya Niti First Chapter with meaning in Hindi and English) चर्चा करते हैं

 

Chanakya Niti First Chapter with Meaning in English Hindi (1-10)

 

ईश्वर प्रार्थना

श्लोक 1

प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम्।
नाना शास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीति समुच्चयम्।।1।।

दोहा–

सुमति बढावन सबहि जन, पावन नीति प्रकाश ।।
टिका चाणक्यनीति कर, भनत भवानीदास ।।1।।

हिंदी अर्थ:- में चाणक्य, अनेकों वेद पुराणों से संकलित की गई राजनीती की नीतियों को बताने से पहले तीनो लोकों के स्वामी भगवान् विष्णु के चरणों में प्रणाम करता हूं|

English Meaning:- I humbly bow down in front of Almighty Vishnu (The Lord of Three worlds) before reciting and telling Maxims (Rules) of the science of Political ethics (Niti) selected from various sastras, Upanishads and Vedas.

अच्छा मनुष्य कौन

श्लोक 2

अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः।
धर्मोपदेशविश्यातं कार्याऽकार्याशुभाशुभम्।।2।।

दोहा:-

तत्व सहित पढि शास्त्र यह, नर जानत सब बात ।।
काज अकाज शुभाशुभहिं, मरम नीति विख्यात ।।2।।

हिंदी अर्थ:- धर्म का उपदेश देने वाले, कार्य अकार्य शुभ अशुभ को बताने वाले इस नीति शास्त्र को पढ़कर जो सही रूप में इसे जान लेता है वही श्रेष्ठ मनुष्य है|

चाणक्य के अनुसार इस निति शास्त्र में एक बुद्धिमान मनुष्य को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका भली भाँती वर्णन किया गया है|

English Meaning:- The person who knows what ought to do or not by studying and implementing the knowledge hidden in these Maxims collected from sastras is the Excellent One.

श्लोक 3

राजनीति : जग क्लयाण के लिए

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया।
येन विज्ञान मात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते।।3।।

दोहा–

मैं सोड अब बनन करू, अति हितकारक अङ्ग ।
जाके जानत हो जन, सबही विधि सर्वज्ञ ।।3।।

हिंदी अर्थ:- में चाणक्य लोगों की भलाई और जग कल्याण के लिए राजनीती के रहस्य को कर रहा हूँ, जिसे केवल जान लेने मात्र से ही व्यक्ति स्वयं के जीवन में परिवर्तन ला सकता है और एक बेहतर समाज की स्थापना कर सकता है|

English Meaning:- Thats Why I Chanakya tells the Secret Knowledge of Political
Field for welfare of Human Being and Society.

Just Knowing this knowledge one can change his life and can lead to more better
social establishment.

श्लोक 4

शिक्षा : सुपात्र की

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च।
दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति।।4।।

दोहा–

उपदेशत शि प्रमूढ कहँ; व्यभिचारिणि ढिा वास ।।
अरि को करत विश्वास उर, विदुषहू लहत विनास ।।4।।

हिंदी अर्थ:- चाणक्य कहते हैं, मूर्ख शिष्य को पढ़ने और उपदेश देने से, दुष्ट स्त्री का भरण पोषण और साथ रहने से तथा दुखी और नकारात्मक लोगों के साथ से विद्वान् और समझदार व्यक्ति भी दुखी रहने लगता है|

इसलिए समझदार व्यक्ति को इन तीनों का साथ हमेशा के लिए अभी छोड़ देना चाहिए|

English Meaning:- Even a wise Man comes to Grief and sadness by giving instruction to foolish disciple, maintaining and living with wicked wife and excessive get together with miserable sad and negative poeple.

So Chanakya instructs, immediately leave the company of these three characters.

श्लोक 5

मृत्यु के कारणों से बचें

दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः।
ससर्पे गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः।।5।।

दोहा–

भामिनी ढुङ टा मित्र शठ, प्रति उत्तरदा मृत्य।
अहि युत बसत असार में, सब विधि मरिबो सत्य ।।5।।

हिंदी अर्थ:- चरित्रहीन पत्नी, दुष्ट मित्र का साथ, उत्तर देने वाला सेवक तथा सांप वाले घर में रहना, ये चारों ही किसी न किसी दिन म्रत्यु का कारण बनते हैं|

चाणक्य कहते हैं, किसी भी व्यक्ति का दुष्ट होना म्रत्यु के समान है, ऐसा व्यक्ति आत्महत्या करने पर विवश हो सकता है| ऐसी स्त्री हमेशा पति के लिए दुःख का कारण बनी रहती है|

इसी प्रकार नीच, धूर्त मित्र भी आपका बहुत बड़ा अनिष्ट और अहित हर सकता है, मुह लगा नौकर भी सारे भेद जानता है, आपने कई ऐसी घटनाएं देखी होंगी जहाँ नौकर ने ही मालिक की हत्या कर दी|

क्योंकि मुह लगा नौकर आपका और आपके घर का हर एक राज जानता है|

इसके अलावा चाणक्य कहते हैं, यदि आपके घर में सांप है तो भी उसे तुरंत मार देने में ही भलाई है|

English Meaning:- Charachterless (wicked) wife, Crooked (Dishonest) Friend, saucy and imprudent servent and living in a house with snake, these all four are the cause of death of a person sooner or later.

श्लोक 6

आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद्धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि।।6।।

दोहा–

धन हि शखहु विपति हित, धन ते वनिता धीर।
तजि वनिता धनकू तुरत, सबते राख शरीर।।6।।

हिंदी अर्थ:- चाणक्य कहते हैं, मुसीबत और संकट की धडी में संचित धन ही काम हाता है इसलिए व्यक्ति को धन का
संचय करना चाहिए धन को एकत्रित करना चाहिए|

लेकिन यदि आपके घर की स्त्री और पत्नी की जान पर बन आये तो धन की फिक्र छोड़ पत्नी को बचाना उचित है|

क्योंकि आपकी पत्नी आपके घर की इज्जत है और घर की मान मर्यादा बचाने में ही एक सज्जन व्यक्ति की पहचान है|

लेकिन यदि आत्मा की सुरक्षा की बात आती है तो उसे धन और पत्नी दोनों को ही तुच्छ समझना चाहिए

English Meaning:- One should save his money against hard times, save his wife at the sacrifice of his wealth, but invariably one should save his soul even at the sacrifice of his wife and wealth.

श्लोक 7

आपदर्थे धनं रक्षेच्छीमतांकुतः किमापदः।
कदाचिच्चलिता लक्ष्मी संचिताऽपि विनश्यति।।7।।

दोहा–

आपद हित धन राखिये, धनहिं आपदा कौन ।
संचितहूँ नशि जात है, जो लक्ष्मी करुगोन ।।7।।

हिंदी अर्थ:- आपत्ति काल के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए। लेकिन धनवान को आपत्ति क्या करेगी अर्थात् धनवान पर आपत्ति आती ही कहां है?

तो प्रश्न उठा कि लक्ष्मी तो चंचल होती है, पता नहीं कब नष्ट हो जाए तो फिर यदि ऐसा है तो कदाचित् संचित धन भी नष्ट हो सकता है।

बुरा समय आने पर व्यक्ति का सब कुछ नष्ट हो सकता है। लक्ष्मी स्वभाव से ही चंचल होती है। इसका कोई भरोसा नहीं कि कब साथ छोड़ जाऐ।

इसलिए धनवान व्यक्ति को भी यह नहीं समझना चाहिए कि उस पर विपत्ति आएगी ही नहीं। दुःख के समय के लिए कुछ धन अवश्य बचाकर रखना चाहिए।

यहां अभिप्राय यह है कि धन का प्रयोग अनुचित कार्यों में किया जाए तो उसके नष्ट होने पर व्यक्ति विपन्नता को प्राप्त होता है |

किन्तु सत्कार्यों में व्यय किया गया धन व्यक्ति को मान, प्रतिष्ठा और समाज में आदर का पात्र बनाता है क्योंकि धन-सम्पत्ति अस्थायी होती है। इन पर क्या गुमान करना।

व्यक्ति इन्हें अर्जित करता है। वास्तविक शक्ति तो प्रभु द्वारा प्रदत्त है वही स्थायी है।

जबतक उसकी कृपा है तब तक ही सब कुछ है, लेकिन यह निश्चय है कि धन-सम्पत्ति व्यक्ति के परिश्रम, बुद्धिमता और कार्यक्षमता से प्राप्त होती है और इसके चलते वह कभी नष्ट नहीं होती।

श्रम, बुद्धि और कार्य क्षमता के अभाव में वह हमेशा साथ छोड़ देती है, तो मूल बात श्रम, बुद्धि की कार्य क्षमता का बने रहना है तभी लक्ष्मी भी स्थिर रह सकती है।

English Meaning:- Save your wealth against future calamity. Do not say, “What fear has a
rich man, of calamity?” When riches begin to forsake one even the accumulated
stock dwindles away.

श्लोक 8

इन स्थानों पर न रहें

यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत्।।8।।

दोहा–

जहाँ न आदर जीविका, नहिं प्रिय बन्धु निवास ।
नहिं विद्या जिस देश में, करहु न दिन इक वास ।।8।।

हिंदी अर्थ:- जिस देश में सम्मान न हो, जहां कोई आजीविका न मिले, जहां अपना कोई भाई-बन्धु न रहता हो और जहां विद्या अध्ययन संभव न हो, ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहिए। अर्थात् जिस देश अथवा शहर में निम्नलिखित सुविधाएं न हों,

उस स्थान को अपना निवास नहीं बनाना चाहिए
• जहां किसी भी व्यक्ति का सम्मान न हो।
• जहां व्यक्ति को कोई काम न मिल सके।
• जहां अपना कोई सगा-संबंधी या परिचित व्यक्ति न रहता हो।
• जहां विद्या प्राप्त करने के साधन न हों, अर्थात् जहां स्कूल-कॉलेज या पुस्तकालय आदि न हों।

ऐसे स्थानों पर रहने से कोई लाभ नहीं होता। अतः इन स्थानों को छोड़ देना ही उचित होता है।

अतः मनुष्य को चाहिए कि वह आजीविका के लिए उपयुक्त स्थान चुने। वहां का समाज ही उसका सही समाज होगा क्योंकि मनुष्य सांसारिक प्राणी है,

वह केवल आजीविका के भरोसे जीवित नहीं रह सकता। जहां उसके मित्र-बन्धु हों वहां आजीविका भी हो तो यह उपयुक्त स्थान होगा।

विचारशक्ति को बनाये रखने के लिए, ज्ञान प्राप्ति के साधन भी वहां सुलभ हों, इसके बिना भी मनुष्य का निर्वाह नहीं।

इसलिए आचार्य चाणक्य यहां नीति वचन के रूप में कहते हैं कि व्यक्ति को ऐसे देश में निवास नहीं करना चाहिए जहां उसे न सम्मान प्राप्त हो, न आजीविका का साधन हो, न बंधु-बान्धव हों, न ही विद्या प्राप्ति का कोई साधन हो बल्कि जहां ये संसाधन उपलब्ध हो वहां वास करना चाहिए।

English Meaning:- Do not inhabit a country where you are not respected, cannot earn your livelihood, have no friends, or cannot acquire knowledge.

श्लोक 9

धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसे वसेत।।9।।

दोहा–

धनिक वेदप्रिय भूप अरु, नदी वैद्य पुनि सोय ।
बराहु नाहिं इक दिवस तह, जहँ यह पञ्च न होय ।।9।।

हिंदी अर्थ:- जहां कोई सेठ, वेदपाठी विद्वान, राजा और वैद्य न हों, जहां कोई नदी न हो, इन पांच स्थानों पर एक दिन भी नहीं रहना चाहिए।

अर्थात् निम्नलिखित स्थानों पर एक दिन भी नहीं रहना चाहिए|

• जिस शहर में कोई भी धनवान व्यक्ति न हो।
• जिस देश में वेदों को जानने वाले विद्वान न हों।
• जिस देश में कोई राजा या सरकार न हो।।
• जिस शहर या गांव में कोई वैद्य (डॉक्टर) न हो।
• जिस स्थान के पास कोई भी नदी न बहती हो।

क्योंकि आचार्य चाणक्य मानते हैं कि जीवन की समस्याओं में इन पांच वस्तुओं का अत्यधिक महत्त्व है। आपत्ति के समय धन की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति धनी व्यक्तियों से ही हो पाती है।

कर्मकाण्ड के लिए पारंगत पुरोहितों की आवश्यकता होती है।

राज्य शासन के लिए राज प्रमुख या राजा की आवश्यकता होती है। जल आपूर्ति के लिए नदी और रोग निवारण के लिए अच्छे चिकित्सक की आवश्यकता होती है।

इसलिए आचार्य चाणक्य पूर्वोक्त पांचों सुविधाएं जीवन के लिए अपेक्षित सुविधा के रूप में मानते हुए इनकी आवश्यकता पर बल देते हैं और इन सुविधाओं से सम्पन्न स्थान को ही रहने योग्य स्थान के रूप में समझते हैं।

English Meaning:- Chanakya says, Do not stay for a single day where following five persons do not available: a wealthy man, a brahmin well versed in Vedic lore, a king, a river and a physician.

श्लोक 10

लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संगतिम्।।10।।

दोहा–

दानदाता लाज भय, यात्रा लोक न जान ।।
पाँच नहीं जहँ देखिये, तहाँ न बसहु सुजान ।।10।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिस स्थान पर आजीविका न मिले, लोगों में भय, लज्जा, उदारता तथा दान देने की प्रवृत्ति न हो, ऐसी पांच जगहों को भी मनुष्य को अपने निवास के लिए नहीं चुनना चाहिए।

इन पांच चीजों को विस्तार से बताते हुए वे कहते हैं कि जहां निम्नलिखित पांच चीजें न हों, उस स्थान से कोई सरोकार नहीं रखना चाहिए।

  • जहां रोजी-रोटी का कोई साधन अथवा आजीविका या व्यापार की स्थिति न हो।
  • जहां लोगों में लोकलाज अथवा किसी प्रकार का भय न हो।
  • जिस स्थान पर परोपकारी लोग न हों और जिनमें त्याग की भावना न पाई जाती हो।
  • जहां लोगों को समाज या कानून का कोई भय न हो।
  • जहां के लोग दान देना जानते ही न हों।

ऐसे स्थान पर व्यक्ति का कोई सम्मान नहीं होता और वहां रहना भी कठिन ही होता है।

अतः व्यक्ति को अपने आवास के लिए सब प्रकार से साधन सम्पन्न और व्यावहारिक स्थान चुनना चाहिए ताकि वह एक स्वस्थ वातावरण में अपने परिवार के साथ सुरक्षित एवं सुखपूर्वक रह सके।

English Meaning:- Wise men should never go into a country where there are no means of earning one’s livelihood, where the people have no dread of anybody, have no sense of shame, no intelligence, or a charitable disposition.

Chanakya Niti First Chapter with Meaning in English Hindi (11-17)

श्लोक 11

परख समय पर होती है

जानीयात्प्रेषणेभृत्यान् बान्धवान् व्यसनाऽऽगमे।
मित्रं याऽऽपत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये।।11।।

दोहा–

काज भृत्य कें जानिये, बन्धु परम दुख होय ।
मित्र परखियतु विपति में, विभव विनाशित जोय ।।11।।

 

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य समय आने पर सम्बन्धियों की परीक्षा के संदर्भ में कहते हैं-किसी महत्त्वपूर्ण कार्य पर भेजते समय सेवक की पहचान होती है।

दु:ख के समय में बंधु-बांधवों की, विपत्ति के समय मित्र की तथा धन नष्ट हो जाने पर पत्नी की परीक्षा होती है।

यदि किसी विशेष अवसर पर सेवक को कहीं किसी विशेष कार्य से भेजा जाए तभी उसकी ईमानदारी आदि की परीक्षा होती है।

रोग या विपत्ति में ही सगे-सम्बन्धियों तथा मित्रों की पहचान होती है और गरीबी में, धनाभाव में पत्नी की परीक्षा होती है।

सभी जानते हैं कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रह सकता। उसे अपने हर काम को करने में सहायक, मित्र, बन्धु, सखा और परिजनों की आवश्यकता होती है|

किन्तु किसी भी कारणवश उसके ये सहायक उसकी जीवन-यात्रा में समय पर सहायक नहीं होते तो उस व्यक्ति का जीवन निष्फल हो जाता है।

अतः सही सेवक वही जो असमय आने पर सहायक हो। मित्र, सखा व बन्धु वही भला जो आपत्ति के समय सहायक हो, व्यसनों से मुक्ति दिलाने वाला हो और पत्नी वही सहायिका और असली जीवन संगिनी है जो धनाभाव में भी पति का सदैव साथ दे।

ऐसा न होने पर इनका होना बेकार है।

English Meaning:- chanakya says, you can recognize, who is your brother in sad time, who is your friend in hard time and when you faces economical crises (Money crises) that is time you can know whether your wife really loves you or not

श्लोक 12

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे।
राजद्वारे श्मशाने च यात्तिष्ठति स बान्धवः।।12।।

दोहा–

दुख आतुर दुरभिक्ष में, अरि जय कलह अभड्या ।।
भूपति भवन मसान मे, बन्धू सोड़ रहे सड् ।।12।।।

 

हिंदी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य बंधु-बांधवों, मित्रों और परिवारजनों की पहचान बताते हुए कहते हैं|

कि रोग की दशा में (बीमार होने पर) असमय शत्रु से घिर जाने पर, राजकार्य में सहायक रूप में तथा मृत्यु पर श्मशान भूमि में ले जाने वाला व्यक्ति सच्चा मित्र और बंधु है।

देखा जाए तो सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य के सम्पर्क में अनेक लोग आ जाते हैं और अपने लाभ के कारण वह व्यक्ति से जुड़े होने का भाव भी जताते हैं |

किन्तु वे कितने सच्चे और सही मित्र हैं और कितने मौकापरस्त, इसका अनुभव तो समय आने पर ही हो पाता है।

ऊपर वर्णित स्थितियां ऐसे ही अवसर का उदाहरण हैं। जब कोई व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है तो उसे सहारे की आवश्यकता पड़ती है|

ऐसे में परिवारजन और मित्र बन्धु जो सहायक बनते हैं वास्तव में वही सही मित्र कहे जाते हैं। शेष सब तो मुंह देखी बातें हैं।

इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति शत्रु से घिर जाए, उसके प्राण संकट में पड़ जाएं तो जो कोई मित्र, सगा-सम्बन्धी शत्रुओं से मुक्ति दिलाता है, प्राण रक्षा में सहायक बनता है वह उसका मित्र व हितैषी है।

शेष सब स्वार्थ के नाते ही जुड़े हैं।

ऐसे ही राजा और सरकार की ओर से व्यक्ति पर न्यायिक मामले में अभियोग लग जाता है या किसी राजकीय कर्म में उसके समक्ष बड़ी समस्या आ जाती है|

तो मित्र-बन्धु (यदि वे सच्चे हैं तो) ही सहयोग करते हैं और मृत्युपरान्त तो हम सभी जानते हैं कि व्यक्ति चार व्यक्तियों के कन्धों पर सवार होकर ही श्मशान पहुंचता है।

ऐसे में मित्र-सम्बन्धियों की ही अपेक्षा होती है। ऐसे समय में ही सच्चे और सही ईमानदार मित्र की वास्तविक पहचान
होती है।

English Meaning:- Chanakya says, True friend is the person, who is always with us and help, in time of need, misfortune, famine, or war, in a king’s court, or at the crematorium (smasana).

श्लोक 13

हाथ आई चीज न गवाएं

यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवं परिसेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति चाध्रुवं नष्टमेव तत्।।13।।

दोहा–

ध्रुव हूँ तजि अध्र अ है, चितमें अति सुख चाहि।।
ध्रुव तिनके नाशत तुरत, अध्र व न ट वे जाहि ।।13।।

 

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित का सहारा लेता है, उसका निश्चित भी नष्ट हो जाता है। अनिश्चित तो स्वयं नष्ट होता ही है।

अभिप्राय यह है कि जिस चीज का मिलना पक्का निश्चित है, उसी को पहले प्राप्त करना चाहिए या उसी काम को पहले कर लेना चाहिए।

ऐसा न करके जो व्यक्ति अनिश्चित यानी जिसका होना या मिलना पक्का न हो, उसकी ओर पहले दौड़ता है, उसका निश्चित भी नष्ट हो जाता है अर्थात् मिलनेवाली वस्तु भी नहीं मिलती।

अनिश्चित का तो विश्वास करना ही मूर्खता है, इसे तो नष्ट ही समझना चाहिए। अर्थात् ऐसा आदमी अक्सर ‘आधी तज पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे’ की स्थिति का शिकार हो जाता है।

ऐसे व्यक्ति केवल डींगें मारते हैं, कर्म में शिथिलता बरतते हैं और शेखचिल्ली होकर रह जाते हैं।

इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने साधनों के अनुरूप कार्य-योजना बनाकर चले तभी वह इस जीवन-रूपी सागर को शरीर रूपी नौका के सहारे पार जा सकता है |

वरना नाव मझधार में कहीं भी मनोरथ के भंवर में फंसकर रह जाएगी। अतः मनुष्य को अपनी क्षमता को पहचानकर कार्य करना चाहिए क्योंकि काम करने से ही होता है, केवल मनोरथ से नहीं।

English Meaning:- He who gives up what is impossible for that which is possible, loses all; and achieve nothing.

श्लोक 14

विवाह समान में ही शोभा देता है।

वरयेत्कुलजां प्राज्ञो निरूपामपि कन्यकाम्।
रूपवतीं न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले।।14।।

 

दोहा–

कल जातीय विरूप दोउ, चातुर वर करि चाह।
रूपवती तर नीच तजि, समकुल कयि विवाह ।।14।।

 

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य विवाह के संदर्भ में रूप और कुल में श्रेष्ठता कुल को देते हुए कहते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह रूपवती न होने पर भी कुलीन कन्या से विवाह कर ले |

किन्तु नीच कुल की कन्या यदि रूपवती तथा सुशील भी हो, तो उससे विवाह न करे। क्योंकि विवाह समान कुल में ही करना चाहिए।

(विवाह के लिए वर और वधू, दोनों का घराना समान स्तर का होना चाहिए। बुद्धिमान मनुष्य को अपने समान कुल की कन्या से ही विवाह करना चाहिए। चाहे कन्या साधारण रूप-रंग की ही क्यों न हो, निम्न कुल की कन्या यदि सुन्दर और सुशील भी हो, तो उससे विवाह नहीं करना चाहिए।) |

विजातीय अथवा असमान (बेमेल विवाह) में अनेक कष्ट आते हैं। अनेक समस्याएं पैदा हो जाती हैं। यद्यपि मनुस्मृति में
प्रतिकूल विवाह का भी विधान है, लेकिन देखने में यही आता है।

कि असमान विवाह अनेक कारणों से असफल ही हो जाते हैं या उनका परिणाम सुखद नहीं रह पाता। इसलिए जीवन के सन्दर्भ में विवाह जैसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न को भावुकता का शिकार बनने से रोकना ही नीतिसंगत है

English Meaning:- chanakya says, A wise man should marry a woman of a respectable family even if she is not that beautiful. He should not marry one of a low-class family girl Although she is Much Beautiful. Marriage in a family of equal status is preferable.

श्लोक 15

देख-परख कर भरोसा करें

नखीनां च नदीनां च श्रृंगीणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च।।15।।

दोहा–

सरिता थड्शी शस्त्र अरू, जीव जितने नखवन्त ।
तियको नृपकुलको तथा , करहिं विश्वास न सन्त ।।15।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां विश्वसनीयता के लक्षणों की चर्चा करते हुए। कहते हैं कि लंबे नाखून वाले हिंसक पशुओं, नदियों, बड़े-बड़े सींग वाले पशुओं, शस्त्रधारियों, स्त्रियों और राज-परिवारों का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि ये कब घात कर दें, चोट पहुंचा दें कोई भरोसा नहीं।

जैसे लम्बे नाखून वाले सिंह, भालू अथवा बाघ आदि पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनके सम्बन्ध में आप इस बात के लिए आश्वस्त नहीं हो सकते हैं, इसलिए उन पर विश्वास करने वाला व्यक्ति सदा धोखा खाता है।

ऐसे ही यदि आप कोई नदी पार करना चाहते हैं तो आपको किसी व्यक्ति के यह कहने पर भरोसा नहीं करना चाहिए कि नदी का प्रवाह अथवा गहराई कितनी है, क्योंकि नदी के प्रवाह और उसकी गहराई के सम्बन्ध में कोई निश्चित धारणा कभी नहीं बताई जा सकती।

इसलिए आप यदि नदी में उतरते हैं तो आपका सावधान रहना आवश्यक है और स्वयं के विवेक का प्रयोग करना चाहिए।

इसी प्रकार आचार्य चाणक्य का कहना है कि सींग वाले पशुओं तथा शस्त्रधारी व्यक्ति का भी विश्वास नहीं किया जा सकता।

क्योंकि न जाने वे कब स्वार्थवश आपका अहित कर बैठे या अपने जुनून में आक्रमण कर इसी प्रकार स्त्रियों का भी आंख मींचकर विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि क्या पता उनके मन में क्या है और वे अपने संकीर्ण सोच, प्रति ईष्र्या-द्वेष से ग्रस्त आपको कब गलत सलाह दे बैठे या आपको गलत, अपने मनोनुकूल कार्य के लिए प्रेरित कर दें।

आचार्य चाणक्य का स्पष्ट मत है कि बहुत-सी स्त्रियां कहती कुछ है और करती कुछ और हैं। वे प्रेम किसी अन्य से करती हैं तथा प्रेम का प्रदर्शन किसी अन्य से करती हैं। इसलिए उनकी स्वामिभक्ति व पतिव्रता होने पर विश्वास नहीं किया जा
सकता। इसमें सावधानी बरतनी चाहिए। |

इसी प्रकार आचार्य चाणक्य राजकुल की भी चर्चा करते हैं। उनके विचार से राजनीति सदा ही परिवर्तनशील होती है। राजपरिवार के लोग सत्ता पक्ष से जुड़े होने के कारण या सत्ता में आने (सत्ता पाने) के लोभ में कूट चालों में ग्रस्त रहते हैं, उसी के शिकार भी होते हैं।

उनके मित्र व शत्रु सामयिक हानि-लाभ पर निर्भर करते हैं। इस पक्ष से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखें तो यह तथ्य स्पष्ट है कि राज्य-प्राप्ति के लिए पुत्र पिता की हत्या करवा देता है।

उसे कारागार में डलवा देता है। कंस ने लोभ में पिता उग्रसेन को कारागार में डाल दिया था और अपने प्राणों को सुरक्षित रखने के भाव से बहन देवकी को पति वासुदेव सहित जेल में डाल दिया था।

कृष्ण का जन्म कंस की कारावास में ही हुआ था। अतः चाणक्य के अनुसार इन 6 सम्बन्धों-शक्तियों पर अन्धविश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि इनकी चित्तवृत्तियां क्षण-प्रतिक्षण बदलती रहती हैं। यही नीति कहती है।

English Meaning:- Do not put your trust in rivers, men who carry weapons, beasts with claws or horns, women, and members of a royal family.

श्लोक 16

सार को ग्रहण करें

विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि कांचनम्।
नीचादप्युत्तमा विद्यां स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि।।16।।

दोहा–

अहहु सुधा वि पते कनक, मलते बहुरि यत्न ।।
नीचहु ते विढ्या विमल, दुष्कुलते तियरत्न ।।16।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां साध्य की महत्ता दर्शाते हुए साधन को गौण मानते हुए कहते हैं कि विष में से भी अमृत तथा गंदगी में से भी सोना ले लेना चाहिए।

नीच व्यक्ति से भी उत्तम विद्या ले लेनी चाहिए और दुष्ट कुल से भी स्त्री-रत्न को ले लेना चाहिए।

अमृत अमृत है, जीवनदायी है, अतः विष में पड़े हुए अमृत को ले लेना ही उचित होता है। सोना यदि कहीं पर गंदगी में भी पड़ा हो तो उसे उठा लेना चाहिए।

अच्छा ज्ञान या विद्या किसी नीच कुल वाले व्यक्ति से भी मिले तो उसे खुशी से ग्रहण कर लेना चाहिए। इसी तरह यदि दुष्टों के कुल में भी कोई गुणवान, सुशील श्रेष्ठ कन्या हो, तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को अमृत, स्वर्ण, विद्या तथा गुण और स्त्री-रत्न को ग्रहण करने से कभी भी हिचकिचाना नहीं चाहिए।

वह इनके ग्रहण में गुण को महत्ता दे, स्रोत को नहीं अर्थात् बुरे स्रोत से कोई उत्तम पदार्थ प्राप्त होता हो तो उसे प्राप्त करने में व्यक्ति को संकोच नहीं करना चाहिए|

क्योंकि उपलक्ष्य तो साध्य है साधन नहीं। यहां उन्होंने उसके गुणों की ओर संकेत किया है, केवल मात्र रसिक की भांति उसके रूप की ओर नहीं।

विवाह के सम्बन्ध में तो चाणक्य की यह स्पष्ट धारणा है कि वह तो समान स्तर के परिवार में ही होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि चाणक्य विवाह के बाद होने वाले परिणामों से पूर्णतया परिचित थे।

जैसा कि आज हम देखते हैं कि समान स्तर और समान विचारवाले परिवारों में विवाह न होने के कारण व्यक्ति को अनेक संकटों से गुजरना पड़ता है, किन्तु इसके बाद भी गुण का महत्त्व सर्वोपरि है उसे परखने में भूल नहीं करनी चाहिए। स्त्री पुरुष से आगे होती है।

English Meaning:- Even from poison extract nectar, wash and take back gold if it has fallen in filth, receive the highest knowledge (Krsna consciousness) from a low born person; so also a girl possessing virtuous qualities (stri-ratna) even if she were born in a disreputable family.

श्लोक 17

स्त्रीणां द्विगुण अहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा।
साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः।।17।।

दोहा–

तिय अहार देखिय द्विगुण, लाज चतुशुन जान ।
पटन तेहि व्यवसाय तिय, काम अष् टन मान ।।17।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की क्षमता बताते हुए कहते हैं कि स्त्रियों में आहार दुगुना, लज्जा चौगुनी, साहस छह गुना तथा कामोत्तेजना (संभोग की इच्छा) आठ गुनी होती है।

यहां वस्तुतः नारी के बारे में जो कहा गया है, उसकी निन्दा नहीं बल्कि गुण की दृष्टि से प्रशंसा है कि

स्त्रियों का आहार पुरुष से दुगुना होता है। लज्जा चौगुनी होती है, किसी भी बुरे काम को करने की हिम्मत स्त्री में पुरुष से छ: गुना अधिक होती है तथा कामोत्तेजना-सम्भोग की इच्छा पुरुष से स्त्री में आठ गुना अधिक होती है।

और यह गुणवत्ता उनके शारीरिक दायित्व-जिसका वे विवाहोपरान्त वहन करती हैं, के कारण होती है।

स्त्रियों में भी काम शांति होती है, साथ ही अतृप्ततावस्था में स्वाभाविक क्रिया न होने पर अन्य पुरुष से सम्बन्ध कायम
करने की प्रबल भावना उसमें वेश्यापन (परपुरुषगामी) ला देती है।

लेकिन पुरुष में तत्काल ऐसी क्रियाएं नहीं देखी जातीं। अतः काम भावना का पुरुष की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक होना अनुमानित किया गया है।

English Meaning:- Women have hunger two-fold, shyness four-fold, daring six-fold, and lust eight-fold as compared to men.

चाणक्य के प्रथम अध्याय (Chanakya niti Firts Chaptper meaning in hindi English) में कही गयी बातें कहीं कहीं पर आपके विचार से मेल शायद न मिलें| लेकिन व्यावहारिक रूप से बातें मनुष्य के जीवन पर सटीक बैठती हैं|

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