Chanakya Niti Chapter 8 Hindi English | चाणक्य नीति आठवां अध्याय अर्थ सहित

0
59
Chanakya Niti chapter 8 shlokas hindi english

Chanakya Niti eighth chapter 8 shlokas meaning in Hindi English | चाणक्य नीति आठवां अध्याय हिंदी इंग्लिश अर्थ सहित

Chanakya Niti Chapter 8 in Hindi English

चाणक्य निति आठवां अध्याय हिंदी इंग्लिश अर्थ सहित

संस्कृत श्लोक – 1

अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।1।।

दोहा – 1

अधम धनहिं को चाहते, मध्यम धन अरु मान ।
मानहि धन है बडन को, उत्तम चहै मान ।।1।।

हिंदी अर्थ:- चाणक्य यहाँ मनुष्य के तीन प्रकार के बारे में बताते हुए कहते हैं, अधम प्रकार के मनुष्य सिर्फ धन की इच्छा रखते हैं, वे धन अर्जन के लिए किसी भी युक्ति का प्रयोग कर सकते हैं|

माध्यम प्रकार के लोग धन और मान दोनों की इच्छा रखते हैं, ऐसे लोग धन तो चाहते हैं लेकिन समान के साथ|

लेकिन उत्तम प्रकार के लोग सिर्फ मान और सम्मान की इच्छा रखते हैं इनके लिए धन का कोई मोल नहीं होता हैं| मान सम्मान ही इनका धन है|

English Meaning:- Low class Human desire wealth; middle class, both wealth and respect,
but the noble, desire honour only, for them honour is the noble man’s true wealth.

संस्कृत श्लोक – 2

इक्षुरापः पयोमूलं ताम्बूलं फलमौषधम्।
भक्षयित्वापि कर्तव्या स्नानदानादिकाः क्रिया।।2।।

दोहा – 2

ऊख वारि पय मूल, पूनि ओषधह खायके।
तथा खाये ताम्बूल, नान दान आदिक उचित ।।२।।

हिंदी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य कहते हैं कि ईंख (गन्ना), जल, दूध, मूल, पान, फल और औषधि को खा लेने के बाद भी स्नान, दान आदि कार्य
किए जा सकते है|

English Meaning:- chanakya says even after chewing sugar cane, after taking milk and water, and after eating fruits, paan and medicine, one can take bath and practice the donation.

संस्कृत श्लोक – 3

दीपो भक्षयते ध्यान्तं कञ्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा।।3।।

दोहा – 3

दीपक तमको खात है, तो कजल उपजाय ।
यन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा ।।3।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहाँ अन्न और मन संस्कार के बीच सम्बन्ध बताते हुए कहते हैं| व्यकित जैसा भोजन ग्रहण करता हैं वैसा ही उसका मन होता है और संतान भी वैसी ही पैदा होती है|

सात्त्विक भोजन करने से सन्तान भी योग्य और बुद्धिमान होगी तथा तामसी भोजन से मूर्ख सन्तान ही पैदा होगी।

चाणक्य उदहारण देते हुए कहते हैं जैसे दीपक अन्धकार को खाता है और काजल पैदा करता है

English Meaning:- Chankaya says according to the nature of our diet (sattva, rajas or tamas) one produce offspring of similar quality.

The person earing tamas food produce foolish and crook offspring and those take satvik food there offspring are intelligent and kind.

chanakya takes an example, As The lamp eats up the darkness and therefore
it produces blackened lamp.

संस्कृत श्लोक – 4

चाण्डालानां सहस्रैश्च सूरिभिस्तत्वदर्शिभिः।
एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः।।4।।

दोहा – 4

एक सहस्त्र चाण्डाल सम, यवन नीच इक होय ।
तत्त्वशी कह यवन ते, नीच और नहिं कोय ।।७।।

हिंदी अर्थ:- चाणक्य ने यवन (मांस खाने वाले) को निम्नतम कोटि का माना है, आचार्य चाणक्य कहते हैं कि तत्त्वदर्शी विद्वानों ने कहा है कि हजार चांडालों के बराबर एक यवन होता है। यवन से नीच कोई नहीं होता।

आशय यह है कि विद्वान महापुरुषों के अनुसार एक हजार चाण्डालों के बराबर बुराईयां एक यवन में होती है। इसलिए यवन सबसे नीच मनुष्य माना जाता है। यवन से नीच कोई नहीं होता है।

English Meaning:- Chanakya says Meat eater, is lowest even from chaandal (ill mannered people) in society.

संस्कृत श्लोक – 5

वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमान्नान्यत्र देहि क्वचित्,
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं धनयुतां माधुर्ययुक्तं सदा।
जीवाः स्थावर जंगमाश्च सकला संजीव्य भूमण्डलम्
भूयं पश्य तदैव कोटिगुणितं गच्छन्त्यम्भोनिधिम्।।5।।

दोहा – 5

गुणहिंन ओरहिं देइ धन, लखिय जलद जल खाय ।
मधुर कोटि शुण करि जात, जीवन जलनिधि जाय ।।5।।

हिंदी अर्थ:- धन की पात्रता बताते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं-बुद्धिमान व्यक्ति वाही है जो गुणी और योग्य लोगों को ही धन देता है| अगुणी लोगों को कभी धन नहीं देना चाहिए ऐसा धन नष्ट हो जाता है।

जैसे बादल समुद्र से जल लेकर मधुर जल की वर्षा करता है। इससे पृथ्वी के सारे प्राणी जीवित रहते हैं। फिर यही जल करोड़ों गुना अधिक होकर समुद्र में ही चला जाता है।

धनी और बुद्धिमान लोगों को भी किसी योग्य व्यक्ति को ही कोई कारोबार करने के लिए धन से सहायता करनी चाहिए। इससे वह व्यक्ति कई लोगों का भला करता उन्हें रोजगार देता है और सहायता करने वाले व्यक्ति को भी लाभ होता है।

English Meaning:- Chanakya Says, wealthy and wise man should always give money to the worthy.

As the cloud take water from the ocean, then rain over to earth with sweat water and foster the living beings and at last this water again travel back to the ocean.

In same Fashion, Money, given to the worthy and wise one never goes into vein, As worthy utilizes and invest that money and benefited others and as well as giver also.

संस्कृत श्लोक – 6

तैलाभ्यंगे चिताधूमे मैथुने क्षौर कर्मणि।
तावद्भस्ति चांडालो यावत्स्नानं न समाचरेत्।।6।।

दोहा – 6

चिताधूम तनुतेल लगि, मैथुन छोर बनाय ।।
तब लौ है चण्डाल सम, जबलों नाहिं नहाय ।।6।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य सुझाव देते हुए कहते हैं, तेल लगाने के बाद, चिता का धुआं लगने पर, मैथुन करने के बाद तथा बाल कटाने पर, जब तक मनुष्य स्नान नहीं कर लेता तब तक वह चाण्डाल होता है।

English Meaning:- Chanakya advises, After oiling on the body, after encountering the smoke from a funeral pyre, after intercourse with the wife, and after a hair cut, one remains impure until he takes baths.

so it is necessary to take bath after mentioned above task.

संस्कृत श्लोक – 7

अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे तद् बलप्रदम्।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम्।।7।।

दोहा – 7

वारि अजीण ओषधी, जीण में बलवान ।
भोजन के संग अमृत है, भोजनान्त वि अपान ।।7।।

हिंदी अर्थ:- जल की गुणवत्ता बताते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि भोजन यदि पच नहीं रहा है तो जल औषधि के समान कार्य करता है। भोजन करते समय जल अमृत है तथा भोजन के बाद विष का काम करता है

अभिप्राय यह है कि अपच की शिकायत होने पर जी भरकर, जितना पिया जा सके, पानी पीना चाहिए। यह औषधि की तरह काम करता है।

खाना पच जाने पर पानी पीने से शरीर की शक्ति बढ़ती है। भोजन करते समय बीच-बीच में पानी पीते रहने से यह अमृत की तरह व्यवहार करता है और यही पानी यदि भोजन के बाद पिया जाए तो यह विष का काम करता है।

English Meaning:- Chankaya says, Water is the medicine for indigestion, Water must be taken after food that is eaten is well digested.

it act like nectar when drunk in the middle of a meal, and it is like poison when taken just after the end of a meal.

संस्कृत श्लोक – 8

हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाज्ञानता नरः।
हतं निर्णायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृका।।8।।

दोहा – 8

ज्ञान क्रिया बिन नष्ट है, नर जो नष्ट अज्ञान।
बिनु नायक जसु सेनहू, त्यों पति बिनु तिय जान ।।8।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिस ज्ञान पर आचरण और व्यवहार में न लिया जाए, वह ज्ञान नष्ट हो जाता है। अज्ञान से मनुष्य का नाश हो जाता है। सेनापति के बिना सेना तथा बिना पति के स्त्री नष्ट हो जाती है।

English Meaning:- Chanakya says, Knowledge is lost without putting it into practice, a
man is lost due to ignorance; an army is lost without a commander; and a woman is lost without a husband.

संस्कृत श्लोक – 9

वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्तगतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं तिस्र पुंसां विडम्बना।।9।।

दोहा – 9

वृध्द समय जो मरु तिया, बन्धू हाथ धन जाय । |
पराधीन भोजन मिलै, अहे तीन ठूखदाय ।।9।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बुढ़ापे में पत्नी की मृत्यु, धन का भाईयों के हाथ में चले जाना, भोजन के लिए भी पराधीनता, ये तीनों स्थिति पुरुष के लिए दुःखों का पहाड़ है।

आशय यह है कि व्यक्ति के बुढ़ापे में पत्नी का मरना बड़े दुर्भाग्य की बात है। बुढ़ापे में पत्नी ही व्यक्ति की साथी होती है।
धन पर भाईयों का कब्जा हो जाने पर व्यक्ति केवल मन ही मन दुखी ही रहता है क्योंकि खून का रिश्ता होने की वजह से कोई बड़ी कार्यवाही नहीं कर सकता है।

इसी प्रकार भोजन के लिए दूसरों पर आश्रित रहना, भी एक मनुष्य के लिए दुखों का पहाड़ टूट पड़ने जैसा ही माना जाता है|

English Meaning:- A man who faces the following three unfortunate, the death of his wife in his old age, the money goes into the hands of relatives, and depending upon others for food.

संस्कृत श्लोक – 10

नाग्निहोत्रं विना वेदा न च दानं विना क्रिया।
न भावेन विना सिद्धिस्तस्माद् भावो हि कारणम्।।10।।

दोहा – 10

अनिहोत्र बिनु वेद नहिं, यज्ञ क्रिया बिनु दान ।।
भाव बिना नहिं शिष्टदि है, सबमें भाव प्रधान ।।10।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य कहते है कि अग्निहोत्र, यज्ञ-यज्ञादि के बिना वेदों का अध्ययन निरर्थक है तथा दान के बिना यज्ञ-यज्ञादि शुभ कर्म सम्पन्न नहीं होते, जिसके बिना यज्ञ पूर्ण ही नहीं माना जाता, किन्तु यदि दान बिना श्रद्धा-भाव के केवल दिखलावे के लिए हो तो उससे कभी अभीष्ट कार्य की सिद्धि नहीं होती।

अर्थात् मनुष्य की भावना ही प्रधान होती है। शुद्ध भावना से किये गए यज्ञ, दान से ही मनुष्य को निश्चित रूप से लाभ होता है, अतः मनुष्य को कोई शुभ कार्य करते समय मन में भी श्रद्धा रखनी चाहिए

आचार्य चाणक्य के अनुसार मन का भाव ही महत्वपूर्ण है|

English Meaning:- Chanting of the Vedas without making ritualistic sacrifices to the Supreme Lord through the medium of Agni, and sacrifices not followed by donation
gifts are futile.

But at the time of giving donation your thoughts are not pure, such donation is also futile. according to Chanakya, Pure thoughts are first more important.

Chanakya Niti Chapter 8 shlokas in Hindi English (11 – 22)

संस्कृत श्लोक – 11

काष्ठपाषाण धातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्।
श्रद्धया च तथा सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसादतः।।11।।

दोहा – 11

देव न काठ पा प्राणमृत,मूर्ति में नहाय ।
भाव तहाही देवल, कान भाव कहाय ।।११।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां भी भावना को भगवान प्राप्ति का महत् साधन बताते हुए कहते हैं कि काष्ठ, पाषाण या धातु की मूर्तियों की भी भावना और श्रद्धा से उपासना करने पर भगवान की कृपा से सिद्धि मिल जाती है।

आशय यह है कि यद्यपि मूर्ति ईश्वर नहीं है, फिर भी यदि कोई सच्ची भावना और श्रद्धा से लकड़ी, पत्थर या किसी धातु की मूर्ति की ईश्वर के रूप में पूजा करता है, तो भगवान उस पर अवश्य प्रसन्न होते हैं। उसे अवश्य सफलता मिलती है।

यहाँ भी चाणक्य ने मन के भाव को सर्वोपरि बताया है|

English Meaning:- If there is a faith and belief in heart, even the stone sculpture of god is like a real god and blessed in real life.

संस्कृत श्लोक – 12

न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्।।2।।

दोहा – 12

धातु काठ पा प्राण का, करू सेवन युत भाव ।। |
अदा से भगवत्कृपा, तैसे तेहि सिदि आव ।।१२।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि ईश्वर न काष्ठ में है, न मिट्टी में, न मूर्ति में। वह केवल भावना में रहता है। अतः भावना ही मुख्य है।

अर्थात् ईश्वर वास्तव में लकड़ी, मिट्टी आदि की मूर्तियों में नहीं है। वह व्यक्ति की भावना में रहता है। व्यक्ति की जैसी भावना होती है, वह ईश्वर को उसी रूप में देखता है। अतः यह भावना ही सारे संसार का आधार है।

संस्कृत श्लोक – 13

शांतितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम्।
न तृष्णया परो व्याधिनं च धर्मो दयापरः।।13।।

दोहा – 13

नहीं सन्तोष समान सुख, तप न क्षमा सम आन।।
तृष्णा सम नहिं व्याधि तन, धरम या सम मान ।।१३।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि शांति के समान कोई तपस्या नहीं है, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, तृष्णा से बढ़कर कोई व्याधि नहीं है और दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।

अर्थात् अपने मन और इन्द्रियों (इच्छाओं) को शांत रखना ही सबसे बड़ी तपस्या है। सन्तोष ही सबसे बड़ा सुख है, मनुष्य की इच्छाएं सबसे बड़ा रोग हैं, जिनका कोई इलाज नहीं हो सकता और सब पर दया करना ही सबसे बड़ा धर्म है।

English Meaning:- There is no austerity equal to a balanced mind, and there is no happiness equal to contentment, there is no disease like greediness, and no virtue
like mercy.

संस्कृत श्लोक – 14

क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुधा धेनुः संतोषो नन्दनं वनम्।।14।।

दोहा – 14

त्रिसना वैतरणी नदी, धर्मराज सह शेष ।
कामधेनु विद्या कहिय, नन्दन बन सन्तोष ।।14।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां क्रोध, तृष्णा के सापेक्ष विद्या व संतोष का  महत्व बताते हुए कहते हैं कि क्रोध यमराज है, तृष्णा वैतरणी नदी है, विद्या कामधेनु है और संतोष नन्दन वन है।

अभिप्राय यह है कि क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, इसे यमराज के समान भयंकर समझना चाहिए। तृष्णा अर्थात् इच्छाएं वैतरणी नदी के समान है, इनसे छूट पाना बड़ा कठिन काम है।

विद्या कामधेनु के समान सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली है। सन्तोष परम सुख देने वाले नन्दन वन के समान है।

English Meaning:- Anger is a personification of Yama (the god of death), thirst is like
the hellish river Vaitarani, knowledge is like a kamadhenu (the cow of plenty), and contentment is like Nandanavana (the garden of Indra).

संस्कृत श्लोक – 15

गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्।।15।।

दोहा – 15

शुन भूषन है रूप को, कुल को शील कहाय ।
विद्या भूषन सिदि जन, तेहि खर्चत सो पाय ।।15।।

हिंदी अर्थ:- यहां आचार्य चाणक्य शोभायुक्त तत्त्वों की चर्चा करते हुए कहते हैं कि शुभ गुण रूप की शोभा बढ़ाते हैं, शील (विनम्र) स्वभाव कुल की शोभा बढ़ाता है, सिद्धि (perfectness) विद्या की शोभा बढ़ाती है और भोग करना धन की शोभा बढ़ाता है|

English Meaning:- Moral excellence is an ornament for personal beauty, righteous conduct, for high birth, success for learning, and proper spending for wealth.

संस्कृत श्लोक – 16

निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्।
असिद्धस्य हता विद्या अभोगस्य हतं धनम्।।16।।

दोहा – 16

निर्गुण का हत रुप है, हृत कुशील कुलमान ।
हत विद्याहू असिध्दको, हत अझोला धन धान ।।१६।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य दुर्गुणों के कारण सद्गुणों के नाश की चर्चा करते हुए कहते हैं कि गुणहीन का रूप, दुराचारी का कुल तथा अयोग्य व्यक्ति की विद्या नष्ट हो जाती है। धन का भोग न करने से धन नष्ट हो जाता है।

आशय यह है कि व्यक्ति कितना ही सुन्दर रूप वाला हो – यदि गुणवान न हो, तो उसकी सुन्दरता भी अखरने लगती है|

बुरे चाल-चलन वाला व्यक्ति अपने खानदान को बदनाम कर देता है। अयोग्य व्यक्ति विद्या का सदुपयोग नहीं कर पाता।

जो व्यक्ति अपने धन का कोई भी भोग नहीं करता उसका धन निश्चित ही नष्ट हो जाता है। इसलिए कहा गया है कि दुराचारी का कुल मूर्ख का रूप, अयोग्य की विद्या तथा भोग न करने वाले का धन नष्ट हो जाता है।

English Meaning:- Beauty is spoiled by an immoral nature, noble birth by bad conduct,
learning, without being perfected; and wealth by not being properly utilised.

संस्कृत श्लोक – 17

शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता।
शुचिः क्षेमकरो राजा सन्तोषी ब्राह्मण शुचिः।।17।।

दोहा – 17

शुध्द भूमिगत वारि है, नारि पतिव्रता जोन ।।
क्षेम करे सो भूप शुचि, विप्र तोश सुचि तीन ।।१७।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां शुद्धता की चर्चा करते हुए कहते हैं कि भूमिगत जल शुद्ध होता है, पतिव्रता स्त्री शुद्ध होती है, प्रजा का कल्याण करने वाला राजा शुद्ध होता है तथा संतोषी ब्राह्मण शुद्ध होता है।

आशय यह है कि भूमि के नीचे रहने वाला पानी, पतिव्रता स्त्री, प्रजा के सुख-दुःख का ध्यान रखने वाला राजा तथा सन्तोष करने वाला ब्राह्मण स्वयं शुद्ध माने जाते हैं।

English Meaning:- Water seeping into the earth is pure, and a devoted wife is pure, the
king who is always take care of his people is pure, and pure is the brahmana who is contented.

संस्कृत श्लोक – 18

असन्तुष्टी द्विजा नष्टाः सन्तुष्टाश्च महीभूतः।।
सलञ्जा गणिका नष्टानिर्लज्जाश्च कुलांगनाः।।18।।

दोहा – 18

असन्तोष ते विप्र हत, नूप सन्तोष तै ख्वारि।।
निका विनशै लाज ते, लाज बिना कुन नारि।।18।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य यहां दुर्गुणों की चर्चा कर रहे हैं जो दुष्प्रभावी होते हैं। असंतुष्ट ब्राह्मण तथा संतुष्ट राजा नष्ट हो जाते हैं। लज्जा करने वाली वेश्या तथा निर्लज्ज कुलीन घर की बहू नष्ट हो जाती है।

आशय यह है कि ब्राह्मण को सन्तोषी होना चाहिए, जो ब्राह्मण सन्तोषी नहीं होता उसका नाश हो जाता है।

राजा को धन एवं राज्य से सन्तोष नहीं करना चाहिए। इनसे सन्तुष्ट होने वाला राजा नष्ट हो जाता है। वेश्या का पेशा ही निर्लज्जता का है, अतः लज्जा करने वाली वेश्या नष्ट हो जाती है।

गृहिणियों-कुलवधुओं या किसी भी घर की बहू-बेटियों में लज्जा होना आवश्यक है। लज्जा उनका सबसे बड़ा आभूषण (गहना) माना गया है। निर्लज्ज गृहिणयां नष्ट हो जाती हैं।

English Meaning:- Discontented brahmanas, contented kings, shy prostitutes, and immodest housewives are ruined.

संस्कृत श्लोक – 19

किं कुलेन विशालेन विद्याहीने व देहिनाम्।
दुष्कुलं चापि विदुषी देवैरपि हि पूज्यते।।19।।

दोहा – 19

कहा होत बड़ वंश ते. जो नर विद्या हीन ।
प्राट शूजते पूजियत, विढ्या त कुलहीन ।।19।।।

हिंदी अर्थ:- विद्वान की महत्ता बताते हुए आचार्य कहते हैं कि विद्याहीन होने पर विशाल कुल का क्या करना, विद्वान नीच कुल का भी हो तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है।

आशय यह है कि विद्वान का ही सम्मान होता है, खानदान का नहीं। नीच खानदान में जन्म लेने वाला व्यक्ति यदि विद्वान हो, तो उसका सभी सम्मान करते हैं।

English Meaning:- Even a person born in poor family if educated is respected everywhere. But a person born in rich and noble family if uneducted is useless.

संस्कृत श्लोक – 20

विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्।
विद्वया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते।।20।।

दोहा – 20

विद्वप प्रशंसित होत जा, सब थल गोरख पाय ।।
विढ्या से सब मिलत है, थल सब सोइ पुजाय ।।२०।।।

हिंदी अर्थ:- आचार्य चाणक्य विद्वान की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि विद्वान की सभी जगह प्रशंसा होती है, विद्वान को सर्वत्र सम्मान मिलता है, विद्या से सब कुछ प्राप्त होता है और विद्या की सर्वत्र पूजा होती है।

आशय यह है कि विद्या के कारण ही मनुष्य को समाज में आदर, प्रशंसा, मान-सम्मान मिलता है और सांसारिक सुख सुविधा आसानी से संगृहीत कर लेता है क्योंकि विद्या का सभी सम्मान करते हैं।

English Meaning:- A learned man is honoured by the people. A learned man commands
respect everywhere for his learning. Indeed, learning is honoured everywhere.

संस्कृत श्लोक – 21

मांसभक्ष्यैः सुरापानैमूर्खश्छास्त्रवर्जितैः।
पशुभिः पुरुषाकारैण्क्रांताऽस्ति च मेदिनी।।21।।

दोहा – 21

मांस भक्ष मदिरा पियत, मूर्ख अक्षर हीन ।
नका पशुभार गृह, पृथ्वी नहिं राहु तीन ।।२1।।

हिंदी अर्थ:-  दुर्गुणों में लिप्त मनुष्य की स्थिति का बताते हुए आचार्य कहते हैं कि मांसाहारी, शराबी तथा मूर्ख, मनुष्य के रूप में पशु के सामान हैं। इनके भार से पृथ्वी दबी जा रही है।

आशय यह है कि मांस खाने वाले, शराबी तथा मूर्ख, ये तीनों ही पशु के सामान हैं। भले ही इनका शरीर मनुष्य का होता है। लेकिन कृत्य पशुओं के जैसे हैं|

मानव रूप में प्रभु ने हमें सोचने समझने की शक्ति दी है, इस संसार में जो बेहतर है उसका चुनाव हम कर सकते हैं| शाकाहार, मासाहार से बेहतर है, यह आयुर्वेद और मेडिकल साइंस सिद्ध कर चुकी है|

सबकुछ जानकार भी मनुष्य मासाहार करता है, तो इसे मुर्ख न कहें तो क्या कहें|

English Meaning:- The earth is overweight with the weight of the flesh-eaters, winebibblers, dull and stupid and blockheads, who are beasts (Animal) in the form of men.

संस्कृत श्लोक – 22

अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनश्च ऋत्विजः।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः।।22।।

दोहा – 22

अन्नहीन राज्यही दहत, दानहीन यजमान ।।
मंत्रहीन त्रविजन कहूँ, ऋतुसम रिपूनहिं आन ।।22।।

हिंदी अर्थ:-  आचार्य चाणक्य कहते हैं, अन्नहीन राजा राष्ट्र को नष्ट कर देता है। मंत्रहीन ऋषि, तथा दान न देने वाला यजमान भी राष्ट्र को नष्ट कर देते हैं।

अभिप्राय यह है, जिस राजा के राज्य में अन्न की कमी हो, तो ऋषि (यज्ञ के ब्राह्मण यज्ञ के मन्त्र न जानते हों तथा जो यजमान यज्ञ में दान न देता हो, ऐसे राजा ऋषि तथा यजमान तीनों ही राष्ट्र को नष्ट कर देते हैं। इनका यज्ञ करना राष्ट्र के साथ शत्रुता दिखाना है।

English Meaning:- The Kingdom with less food destroyed itself, the one is not a priest who can not recite mantras, and the yajmaan who does not gift or donate destroyed himself and the nation also.

आशा करते हैं चाणक्य निति आठवां अध्याय हिंदी इंग्लिश अर्थ सहित (Chanakya Niti Chapter 8 shlokas hindi English) अवश्य ही आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाएगा|

यह भी पढ़ें:-

चाणक्य निति पंचम अध्याय अर्थ सहित

 

 

 

 

 

 

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here