धार्मिक कर्म में कुश का महत्व क्यों…?

धार्मिक अनुष्ठानो में कुश ( दर्भ ) नामक घास से निर्मित आसन बिछाया जाता है | पूजा-पाठ आदि कर्मकांड करने से व्यक्ति के भीतर जमा आध्याधिक शक्ति-पुंज का संचय कहीं लीक होकर अर्थ न हो जाये अर्थात पृथ्वी में न समा जाये, उसके लिए कुश का आसन विद्धुत कुचालक का कार्य करता है | इस आसाम के कारण पार्थिव विद्धुतप्रवाह पैरो के माध्यम से शक्ति को नष्ट नहीं होने देता है | कहा जाता है की कुश के बने आसन पर बैठकर मंत्रजप करने से सभी मंत्र सिद्ध होते है |

नास्य केशान प्रवपन्ति, नोरसि ताडमाघ्नते |

अर्थात् कुश धारण करने से सिर के बाल नहीं झड़ते और छाती में आघात यानी दिल का दौरा ( हार्ट अटैक ) नहीं होता |

उल्लेखनीय है की वेद ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है |

कुश की पवित्री पहनना जरुरी क्यों…?

कुश की अंगूठी बनाकर अनामिका उंगली में पहनने का विधान है, ताकि हाथ द्वारा संचित आध्यात्मिक शक्तिपुंज दूसरी उंगलियों में न जाये, क्योकि अनामिका के मूल में सूर्य का स्थान होने के कारण यह सूर्य की उंगली है | सूर्य से हमे जीवनीशक्ति, तेज और यश प्राप्त होता है | दूसरा कारण इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकना भी है | कर्मकांड के दौरान यदि भूलवश हाथ भूमि पर लग जाये, हो बीच में कुश का भी स्पर्श होगा | इसलिए कुश को हाथ में भी धारण किया जाता है | इसके पीछे मान्यता या भी है कि हाथ की ऊर्जा की रक्षा न की जाये, तो इसका दुष्परिणाम हमारे मस्तिष्क और हर्दय पर पड़ता है |

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