कर्मफल की मान्यता क्यों…?

Share your love

भारतीय-संस्कृति में कर्मफल के सिद्धांत को विश्वासपूर्वक मान्यता प्रदान की गई है | मनुष्य को जो कुछ भी उसके जीवन में प्राप्त होता है, वह सब उसके कर्मो का ही फल है | मनुष्यके सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीत-हारके पीछे उसके कर्मो को आधार मन गया है |

कर्मफल भोगने की अनिवार्यता पर कहा गया है–

नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि |

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं शुभाशुभम ||

अर्थात् करोडो कल्प बीत जाने पर भी कर्मफल भोगे बिना, मनुष्य को कर्म से छुटकारा नहीं मिल सकता | वह शुभ या अशुभ जैसे भी कर्म करता है, उसका उसका फल अवश्य भोगना पड़ता है |

यही बात शिवमहापुरण और महाभारत के वनपर्व में भी कही गयी है–

ऐहिकं प्राक्तनं वापि कर्म यद्चितं स्फुरत |

पौरुषोSसौ परो यत्नो न कदाचन निष्फल: ||

अर्थात् पूर्वजन्म और इस जन्म के लिए हुए कर्म, फलरूप में अवश्य प्रकट होते है | मनुष्य का किया हुआ यत्न फल लाए बिना नहीं रहता है |

रामचरित मानस के अयोद्धयाकांड में देवगुरु ब्रहस्पति देवराज इंद्र को भगवान् कर्म-मर्यादा का बोध कराते हुए है–

कर्म प्रधान बिश्व करि राखा |

जो जस करै सौ तस फल चाखा ||

काहु न कोउ सुख-दुख कर दाता |

निज कृत करम भोग सब भ्राता ||

अर्थात् विश्व में कर्म ही प्रधान है | जो जैसा करता है, उसे वैसा फल भोगना पड़ता है | दुनिया में कोई किसी को न दुख देने में समर्थ है और न ही सुख देने में | सभी व्यक्ति अपने किये हुए कर्मो का ही फल भोगते है |

कहते है की कर्मो का फल हर किसी को भोगना ही पड़ता है चाहे वो कितना भी बड़ा क्यों न हो, क्योकि कोई इन्हें बिना भोगे नहीं रहा, स्वयं भगवान भी नहीं |

Share your love
Default image
Anurag Pathak
इनका नाम अनुराग पाठक है| इन्होने बीकॉम और फाइनेंस में एमबीए किया हुआ है| वर्तमान में शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं| अपने मूल विषय के अलावा धर्म, राजनीती, इतिहास और अन्य विषयों में रूचि है| इसी तरह के विषयों पर लिखने के लिए viralfactsindia.com की शुरुआत की और यह प्रयास लगातार जारी है और हिंदी पाठकों के लिए सटीक और विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराते रहेंगे
Articles: 369

Leave a Reply