अनेक देवी-देवताओं की मान्यता क्यों…?

गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्ट, दिव्यस्वरूप और इच्छित फल देने की सामर्थ्य जिसके पास है, उसे देवता कहते है | कहा जाता है की हिंदूधर्म में अनगिनत देवी-देवता हैं | ब्रहदारण्यक उपनिषद के तीसरे अद्ध्याय में याज्ञवल्क्य ने कहा है कि वास्तव में तो देव 33 ही है जिसमे 8 वसु, 11रुद्र, 12 आदित्य, 1 देवराज इंद्र और 1 प्रजापति सम्मिलित है | अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, घौ, चन्द्रमा और नक्षत्र ये 8 वसु है, जिन पर सारी दुनिया सृष्टी टिकी हुई है | पांच ज्ञानेंद्रिया, पांच कर्मेंद्रिया और मन ( आत्मा ) ये 11 रूद्र है | संवत्सर के बारह माहो में सूर्यो को आदित्य कहा जाता है | मेघ इंद्र है और प्रकतिरूप यज्ञमय सारा जीवन प्रजापति है |

वैसे अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य और घौ इन 6 देवों में ही सारा विश्व समा जाता है किन्तु आमलोगो में धारणा है कि 33 कोटि ( करोड ) देवता होते है | कोटि शब्द के दो अर्थ श्रेणी और करोड़ लगाए जाते है | इसी वजह से 33 करोड़ की धरना बनी होगी |

ऋग्वेद में ऋषि कहते है कि–

अर्थात् एक सत्स्वरूप परमेश्वर को बुद्धिमान ज्ञानीलोग अनेक प्रकारों से अनेक नामो से पुकारते है | उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा, इंद्र, मित्र, वरुण दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान इत्यादि नामो से याद करते है | सारा वैदिक वाडमय इसी प्रकार की घोषणाओ से भरा है, जिसमें एक ही तत्व को मूलत: स्वीकार करके उसी के अनेक रूपों में ईश्वर को मान्यता दी गई है |

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